इस बार दिल्ली में हिंसा की आशंका इसलिए पिछले आंदोलनों से 2.4 गुना ज्यादा सेंट्रल फोर्स

खुफिया इनपुट के बाद राजधानी में अलर्टः जम्मू-कश्मीर और नक्सल प्रभावित इलाकों से मंगाई टुकड़ियां, जो हर आपात स्थिति से निपटने में सक्षम; किसान आंदोलन की तुलना में इस बार 128 कंपनियां ज्यादा, और सीजेपी के जुलाई वाले प्रदर्शन की तुलना में 71 कंपनियां ज्यादा; गृह मंत्रालय के बड़े अफसर लगातार खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के संपर्क में, आपात स्थिति से निपटने के प्लान पर मंथन

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एम. रियाज़ हाशमी | नई दिल्ली
10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रस्तावित जेन-जी प्रदर्शन को लेकर सुरक्षा एजेंसियों की चिंता अब सिर्फ भीड़ के आकार तक सीमित नहीं रह गई है। खुफिया आकलन में प्रदर्शन के दौरान राजधानी में हिंसा भड़कने और स्थिति के अचानक बिगड़ने की आशंका जताई गई है। इसके बाद सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ा दिया गया है और किसी भी आपात स्थिति में तत्काल लागू किए जाने वाले आकस्मिक कार्रवाई प्लान पर गंभीर मंथन चल रहा है।

सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह लगातार खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के साथ तालमेल बनाए हुए हैं। गृह मंत्रालय से जुड़े बड़े अफसरों के स्तर पर संभावित परिस्थितियों की समीक्षा की जा रही है। खास तौर पर यह देखा जा रहा है कि यदि प्रदर्शन सामान्य कानून-व्यवस्था की स्थिति से आगे बढ़ता है तो दिल्ली पुलिस, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के बीच कार्रवाई का क्रम क्या होगा। सूत्रों का कहना है कि चर्चा केवल प्रदर्शन स्थल तक सीमित नहीं है। आपात स्थिति में भीड़ को अलग-अलग हिस्सों में नियंत्रित करने, संवेदनशील इलाकों तक उसके फैलाव को रोकने और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त केंद्रीय बलों को तत्काल सक्रिय करने की व्यवस्था पर भी विचार किया जा रहा है।

हिंसा का खतरा किस स्थिति में बढ़ सकता है?

सुरक्षा एजेंसियों के आकलन में सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी दिल्ली पहुंचते हैं और उन्हें निर्धारित प्रदर्शन स्थल तक जाने से रोका जाता है तो भीड़ का व्यवहार अचानक बदल सकता है। एजेंसियों ने 50 हजार से अधिक लोगों के जुटने का अनुमान जताया है। सूत्रों के मुताबिक तीन परिस्थितियों पर खास नजर रखी जा रही है- प्रदर्शनकारियों का प्रतिबंधित क्षेत्र की ओर बढ़ना, पुलिस बैरिकेड का सामूहिक विरोध और भीड़ का छोटे-छोटे समूहों में बंटकर अलग-अलग इलाकों की ओर बढ़ना। ऐसी स्थिति में एक स्थान पर शुरू हुआ टकराव दूसरे इलाकों तक फैल सकता है। सुरक्षा एजेंसियों की चिंता इसी संभावित स्थिति को लेकर है। इसी वजह से वैकल्पिक तैनाती और त्वरित प्रतिक्रिया प्लान पर लगातार चर्चा हो रही है, ताकि किसी एक स्थान पर स्थिति बिगड़ने पर दूसरे संवेदनशील इलाकों की सुरक्षा तत्काल मजबूत की जा सके।

शाह की निगरानी में एजेंसियों के बीच तालमेल

सूत्रों के मुताबिक गृह मंत्रालय ने सुरक्षा एजेंसियों के बीच रीयल टाइम समन्वय पर विशेष जोर दिया है। मकसद यह है कि दिल्ली में किसी एक स्थान पर भीड़ की स्थिति बदलने की सूचना दूसरे सुरक्षा तंत्र तक तत्काल पहुंचे और संबंधित एजेंसियां अपने स्तर पर कार्रवाई शुरू कर सकें। सूत्रों के अनुसार संभावित आपात स्थिति में कौन-सी एजेंसी किस स्तर पर कमान संभालेगी, अतिरिक्त बल कहां से और कितनी तेजी से भेजे जाएंगे तथा संवेदनशील सरकारी प्रतिष्ठानों की सुरक्षा किस तरह मजबूत की जाएगी- इन मुद्दों पर भी चर्चा हुई है।

दिल्ली के होटल-गेस्ट हाउस तक सुरक्षा निगरानी

सुरक्षा एजेंसियों की तैयारी अब सड़कों और प्रदर्शन स्थल तक सीमित नहीं है। दिल्ली पुलिस की टीमें होटल, गेस्ट हाउस और अन्य ठहरने के स्थानों पर पहुंचकर वहां ठहरे लोगों और बड़े समूहों के बारे में जानकारी जुटा रही हैं। विशेष रूप से बड़ी संख्या में आने वाले समूहों पर नजर रखी जा रही है।

रेलवे स्टेशनों और दूसरे ट्रांजिट प्वाइंट्स पर भी निगरानी बढ़ाई गई है। पुलिस ऐसे समूहों की गतिविधियों पर नजर रख रही है जो प्रदर्शन के सिलसिले में दिल्ली पहुंचते दिखाई दे रहे हैं। यानी सुरक्षा रणनीति का एक हिस्सा भीड़ के जमा होने के बाद उसे नियंत्रित करना नहीं, बल्कि उसके दिल्ली पहुंचने, ठहरने और आवाजाही के पैटर्न को पहले से समझना भी है।

सोशल मीडिया पर निगाह, एआई कंटेंट नया खतरा

सुरक्षा एजेंसियों के सामने इस बार सोशल मीडिया के जरिए तेजी से फैलने वाली भ्रामक या कृत्रिम रूप से तैयार सामग्री की चुनौती भी है। दिल्ली पुलिस के सूत्रों के अनुसार करीब 10 से 15 सोशल मीडिया चैनलों की निगरानी की जा रही है, जिन पर कथित रूप से एआई से तैयार सामग्री साझा की जा रही है। चिंता यह है कि तनावपूर्ण स्थिति में फर्जी वीडियो, पुरानी घटनाओं के वीडियो या एआई से तैयार सामग्री भीड़ को भड़का सकती है। ऐसे में वास्तविक घटना और सोशल मीडिया पर प्रसारित दावे के बीच अंतर करना सुरक्षा तंत्र के लिए चुनौती बन सकता है।

दिल्ली पुलिस को खास संदेश- बल से ज्यादा संयम

दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने भीड़ नियंत्रण के दौरान संयम बरतने का निर्देश दिया है। शुक्रवार को दिल्ली पुलिस के संयुक्त पुलिस आयुक्त मधुर वर्मा ने पुलिसकर्मियों से बल प्रयोग को न्यूनतम रखने और हर स्थिति में संयम बरतने की अपील की। यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सुरक्षा तैयारी का एक हिस्सा भारी संख्या में केंद्रीय बलों की उपलब्धता है, जबकि दूसरा हिस्सा उनके इस्तेमाल की सीमा तय करना है। पुलिस नेतृत्व का संदेश स्पष्ट है कि भीड़ को नियंत्रित करना जरूरी है, लेकिन कार्रवाई के दौरान अनुशासन और संयम बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

एक प्रदर्शन, लेकिन तैयारी आपात स्थिति जैसी क्यों?

यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। दिल्ली में पहले से बड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद अब तैयारी का अगला स्तर सामने आ रहा है- होटल और गेस्ट हाउस की निगरानी, ट्रांजिट प्वाइंट्स पर नजर, सोशल मीडिया चैनलों की निगरानी, एआई से तैयार सामग्री पर नजर और पुलिस को न्यूनतम बल प्रयोग के निर्देश। इसका अर्थ यह नहीं है कि हिंसा होना तय है। बड़े जमावड़े के दौरान सुरक्षा एजेंसियां सबसे खराब संभावित स्थिति के लिए भी तैयारी करती हैं। लेकिन इस बार तैयारी का दायरा भीड़ नियंत्रण से आगे जाता दिखाई दे रहा है। भीड़ का जुटना, उसकी आवाजाही, सूचनाओं का प्रसार और स्थिति के संभावित रूप से बिगड़ने—इन सभी स्तरों को सुरक्षा योजना में शामिल किया गया है।

सीईसी के घर से दफ्तर तक सुरक्षा घेरा और कड़ा

प्रदर्शन से पहले उन ठिकानों की सुरक्षा भी बढ़ाई गई है जिन्हें संवेदनशील माना जा रहा है। इनमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार का सरकारी आवास और निर्वाचन आयोग का मुख्यालय ‘निर्वाचन सदन’ प्रमुख हैं। सूत्रों के मुताबिक ज्ञानेश कुमार की पहले से मौजूद जेड-प्लस सुरक्षा का दायरा बढ़ाया गया है। उनके आवास के बाहर अतिरिक्त सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं। निर्वाचन सदन पर भी सुरक्षा की अतिरिक्त परत तैयार की गई है। केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) के अलावा रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ), केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) और दिल्ली पुलिस के अतिरिक्त जवानों की तैनाती की गई है।

आतंक और नक्सल प्रभावित इलाकों से आई फोर्स

केंद्रीय बलों की तैनाती की सबसे महत्वपूर्ण परत यह है कि अतिरिक्त कंपनियां सिर्फ आसपास के राज्यों से नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर और छत्तीसगढ़ जैसे संवेदनशील क्षेत्रों से भी दिल्ली लाई गई हैं। गृह मंत्रालय ने 8 से 12 अक्टूबर के लिए दिल्ली पुलिस को अतिरिक्त केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की 110 कंपनियां उपलब्ध कराई हैं। इनमें सीआरपीएफ की 85, सशस्त्र सीमा बल की 10, आरएएफ की 7, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस की 7 और सीआईएसएफ की 1 कंपनी शामिल है। सूत्रों के मुताबिक सीआरपीएफ की कंपनियां जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ से लाई गई हैं। जिन्हें हर समय आपात स्थिति से निपटने का भरपूर अनुभव है।

अब दिल्ली में 221 सुरक्षा बलों की 221 कंपनियां

सीआरपीएफ देश के उन इलाकों में भी लगातार तैनात रहती है जहां आंतरिक सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी अभियान, उग्रवाद और आकस्मिक कानून-व्यवस्था की स्थितियों से निपटने की जरूरत रहती है। ऐसे परिचालन क्षेत्रों से कंपनियों को अस्थायी रूप से दिल्ली भेजने का फैसला सुरक्षा बलों की उपलब्धता और प्राथमिकता निर्धारण का संकेत है। हालांकि इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि इन राज्यों की सुरक्षा व्यवस्था कमजोर की गई है। दिल्ली में पहले से मौजूद 111 केंद्रीय बल कंपनियों के अतिरिक्त 110 कंपनियां उपलब्ध कराई गई हैं। इस तरह कुल 221 कंपनियां उपलब्ध हैं।

पिछले आंदोलनों की तुलना में यह फोर्स बहुत ज्यादा

तुलना करें तो जुलाई के पिछले सीजेपी प्रदर्शन में करीब 150 सीएपीएफ कंपनियां तैनात थीं, जबकि किसान आंदोलन के दौरान करीब 93 कंपनियां तैनात की गई थीं। यानी इस बार जुलाई के प्रदर्शन से 71 कंपनियां, करीब 47 प्रतिशत ज्यादा, और किसान आंदोलन से 128 कंपनियां, करीब 138 प्रतिशत ज्यादा हैं। दूसरे शब्दों में, किसान आंदोलन के मुकाबले उपलब्ध केंद्रीय बल इस बार करीब 2.4 गुना हैं। यही आंकड़ा बताता है कि 10 अक्टूबर की सुरक्षा तैयारी को सिर्फ एक प्रदर्शन स्थल की सुरक्षा के तौर पर नहीं देखा जा रहा। केंद्रीय बलों की संख्या, उनके स्रोत क्षेत्रों, खुफिया निगरानी और आपात स्थिति के लिए तैयार किए जा रहे वैकल्पिक प्लान को एक साथ देखें तो सुरक्षा तंत्र राजधानी में किसी भी संभावित स्थिति के लिए कई स्तरों पर तैयारी कर रहा है।