इम्युनिटी या इम्प्युनिटी? सीईसी एक्ट की धारा 16 पर सुप्रीम कोर्ट की सख़्त नज़र

संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी निभाने वाला आयोग चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता का संरक्षक है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट बार-बार यह स्पष्ट कर चुका है कि स्वतंत्रता का अर्थ निरंकुश अधिकार नहीं होता।

मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम की धारा 16 को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किया जाना भारतीय लोकतंत्र के लिए एक अहम क्षण है। यह प्रावधान मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए कार्यों के लिए व्यापक कानूनी संरक्षण देता है, जिससे संवैधानिक शासन में स्वतंत्रता और जवाबदेही के संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

याचिका के केंद्र में यह तर्क है कि धारा 16 चुनाव अधिकारियों को अभूतपूर्व और आजीवन प्रतिरक्षा प्रदान करती है।ऐसी सुरक्षा जो देश के राष्ट्रपति, राज्यपालों और यहां तक कि न्यायाधीशों को भी प्राप्त नहीं है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह प्रावधान चुनाव आयोग को “अपने आप में एक कानून” बना देता है और उसके शीर्ष अधिकारियों को किसी भी संभावित पद के दुरुपयोग के बावजूद दीवानी और आपराधिक जांच से पूरी तरह बचा लेता है।

यह विवाद केवल सैद्धांतिक बहस तक सीमित नहीं है। भारतीय लोकतंत्र में चुनाव आयोग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी निभाने वाला आयोग चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता का संरक्षक है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट बार-बार यह स्पष्ट कर चुका है कि स्वतंत्रता का अर्थ निरंकुश अधिकार नहीं होता। मोहन सिंह गिल बनाम मुख्य चुनाव आयुक्त सहित कई ऐतिहासिक फैसलों और पूर्व सीईसी एम.एस. गिल से जुड़े मामलों में अदालत ने माना है कि चुनाव आयोग को स्वायत्तता प्राप्त है, लेकिन वह संवैधानिक सीमाओं और न्यायिक निगरानी से ऊपर नहीं है।

कानून निर्माण की प्रक्रिया के अंतिम चरण में इस प्रावधान को जोड़े जाने से भी आलोचनाएं तेज हुई हैं। सरकार ने इसे अनुच्छेद 324(2) के तहत उचित ठहराया, जो मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित है। लेकिन व्यापक और सर्वव्यापी प्रतिरक्षा प्रदान करना स्पष्ट रूप से इस अनुच्छेद की सीमा से परे प्रतीत होता है। कार्यकाल के दौरान ही नहीं, बल्कि उसके बाद भी सभी प्रकार की कानूनी कार्यवाही से चुनाव अधिकारियों को सुरक्षित कर देना ऐसे समय में सार्वजनिक विश्वास को कमजोर कर सकता है, जब राजनीतिक ध्रुवीकरण अपने चरम पर है।

जवाबदेही के बिना स्वतंत्रता एक कमजोर स्वतंत्रता होती है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान की मूल संरचना का हिस्सा हैं, और उन्हें कमजोर करने वाला कोई भी कानून गहन न्यायिक समीक्षा का पात्र है। मौजूदा स्वरूप में धारा 16 सत्ता के असंतुलित केंद्रीकरण की ओर झुकती दिखाई देती है, जिससे कथित दुराचार के खिलाफ़ प्रतिकार के रास्ते सीमित हो जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट का नोटिस इस बात का संकेत है कि शीर्ष अदालत इस मुद्दे की गंभीरता को समझती है और यह परखेगी कि क्या संसद ने अपने संवैधानिक अधिकारों की सीमा लांघी है।

अदालत का अंतिम फैसला न केवल चुनाव आयोग के भविष्य को प्रभावित करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि संवैधानिक पदाधिकारियों को प्रतिरक्षा देने में विधायिका कितनी दूर तक जा सकती है। तब तक यह बहस हमें एक बुनियादी लोकतांत्रिक सच्चाई की याद दिलाती है।लोकतंत्र में चुनावी प्रक्रिया के सबसे शक्तिशाली संरक्षक भी कानून के प्रति जवाबदेह होते हैं।

इसी बीच, अपनी जांच को आगे बढ़ाते हुए, इस मुद्दे पर तहलका की विशेष जांच टीम ने यह उजागर किया है कि पूजा-पाठ, प्रार्थनाएं, पवित्र जल और तथाकथित चमत्कारी उपचार देने वाले हीलर्स के जरिए इलाज जैसे धार्मिक तौर-तरीके चिकित्सा विज्ञान के लिए एक गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं, क्योंकि इनमें “नकली इलाज” के दावे किए जा रहे हैं।