हुसेन चले गए सरस्वती को बचा लें

इस सवाल का जवाब आसान नहीं है. कुछ अफसोस के साथ हमें यह मानना पड़ता है कि हाल के वर्षों और दशकों में भारतीय समाज की सांस्कृतिक-सामाजिक चेतना कुंद पड़ी है. इस दौर में पैदा हुई नई उपभोक्तावादी भूख ने उसकी प्राथमिकताएं जैसे बदल दी हैं. संगीत के लिए उसकी कॉलर ट्यून है, चित्रों के लिए उसके स्क्रीनसेवर हैं, नाटक की जगह वह कॉमेडी सर्कस और रियलिटी शो देखता है और मनोरंजन और संस्कृति की बची-खुची जरूरत फिल्मों से पूरी कर लेता है. इस सांस्कृतिक शून्य में सतही राजनीति उसे समझाती है कि साहित्य और धर्म का मतलब क्या होता है, कला और देश का मतलब क्या होता है. जब यह सतही राजनीति हमारे सांस्कृतिक मूल्य निर्धारित करने लगती है तो वह कलाकार का धर्म देखती है, कला के आवरणों को समझने की जगह निरावृत्त सरस्वती और भारतमाता को देखकर उत्तेजित होती है और कलाकार से पूछती है कि वह किसी दूसरे धर्मगुरु की तस्वीर क्यों नहीं बनाता.

कलाकार इस सवाल का जवाब कैसे दे? कैसे बताए कि कला की प्रेरणाओं के पीछे धर्म के ऐसे सुचिंतित आग्रह नहीं होते? किसे बताए कि उसने जो चित्र बनाए हैं, वे उस तरह अश्लील या नग्न नहीं, जिस तरह प्रचारित किए जा रहे हैं. वे बस चित्रकला की बहुत आम परंपरा के प्रयोग हैं जिसमें नग्नता कहीं से वर्जित नहीं है और न ही वह अश्लील नजर आती है.

अगर समाज इन प्रयोगों से परिचित होता तो वह शायद बहस कर पाता कि ये चित्र अच्छे हैं या नहीं. हुसेन के अपने कृतित्व में सीता, सरस्वती या भारत माता के जैसे चित्रों की जगह कितनी है. तब शायद उसे यह भी मालूम होता कि हुसेन ने सिर्फ ऐसे चित्र ही नहीं बनाए हैं, इनसे कई गुना ज्यादा ऐसे देवी-देवताओं को चित्रित किया है जो हमारी परंपरा का सुरुचिपूर्ण और कलात्मक विस्तार करते हैं. उन्होंने ऐसे गणेश बनाए हैं जो लुभाते हैं, ऐसी सरस्वती भी चित्रित की है जो श्रद्धा जगाती है, अपनी मां की तलाश करते-करते हुसेन मदर टेरेसा तक पहुंच गए हैं और नीली कोर वाली उजली साड़ी में उन्होंने करुणा की ऐसी मूरतें बनाई हैं जिनके सामने सिर झुकाने की इच्छा होती है.

जो व्यवस्था न्यूनतम मानवीय मूल्यों की कद्र नहीं करती, उससे हम कला और साहित्य से जुड़े मूल्यों के सम्मान की उम्मीद रखें तो इसमें हमारी नादानी झांकती है

यह सब मालूम होता तो समाज अपने कलाकार का ज्यादा सम्मान करता. जिन चित्रों को वह आपत्तिजनक मानता, उनके प्रति भी क्षमाशील होता. लेकिन कलाकार और उसका समाज एक-दूसरे से अजनबी हैं. दुर्भाग्य की बात यह है कि यह सिर्फ एक कलाकार की स्थिति नहीं, हमारे पूरे सांस्कृतिक संसार की नियति है.

यह स्थिति किसी मकबूल फिदा हुसेन को कतर जाने के लिए मजबूर करती है. राजनीतिक व्यवस्था बताती है कि हुसेन भारत लौटने के लिए स्वतंत्र हैं और उन्हें यहां पूरी सुरक्षा दी जाएगी. वह व्यवस्था यह नहीं समझती कि मामला किसी ख़ास नागरिक को सुरक्षा मुहैया कराने का नहीं, स्वतंत्रता का एक ऐसा माहौल बनाने का है जिसमें कोई आदमी आजादी से घूम-फिर सके, लिख-पढ़ सके, सोच-विचार सके. जहां उसे यह डर न हो कि उसकी किताबें जलाई जाएंगी, उसकी तस्वीरें नष्ट की जाएंगी, उसकी फिल्मों के प्रदर्शन रोके जाएंगे, उसके रंगमंच के दौरान हंगामा होगा. राज्य या समाज से यह न्यूनतम अपेक्षा है जो कोई लेखक या कलाकार कर सकता है, वरना राज्य के फर्ज कहीं ज्यादा दूर तक जाते हैं, उसे कला और साहित्य को संरक्षण देने की ज़िम्मेदारी उठानी पड़ती है.

लेकिन जो व्यवस्था न्यूनतम मानवीय मूल्यों की कद्र नहीं करती, उससे हम कला और साहित्य से जुड़े मूल्यों के सम्मान की उम्मीद रखें तो इसमें हमारी नादानी झांकती है. दुर्भाग्य से अभी जो कुछ हो रहा है, वह इन अपेक्षाओं का विलोम है. हमारी लोकतांत्रिक आजादी पर दबाव बढ़े हैं, हमारी अभिव्यक्ति पर पहरे कड़े हुए हैं. जो लोग हुसेन से यह शिकायत कर रहे हैं कि उन्होंने संघर्ष किए बिना कट्टरपंथियों से हार मान ली, उन्हें बताना चाहिए कि उन्होंने एक दूसरे बूढ़े, रंगकर्मी हबीब तनवीर के संघर्ष में कितना साथ दिया था. हबीब के नाटकों पर लगातार हमले हुए. उन्हें बचाने कौन आया? बांग्लादेश की एक लेखिका हमसे सम्मानजनक शरण्य मांग रही है, हम वह देने को तैयार नहीं हैं.

यह सिर्फ कला–संस्कृति का नहीं, पूरे समाज के प्रति सरोकार और संवेदनशीलता का मामला है. जिस व्यवस्था में यह संवेदनशीलता नहीं होती, उसमें फासीवादी ताकतों की गुंजाइश बढती जाती है. दुर्भाग्य से हमारी व्यवस्था इसी दिशा में बढ़ रही है.

कतर जाने का फैसला मकबूल फिदा हुसेन की मजबूरी हो या मंशा, इसमें जितनी उनकी दरारें दिखती हैं, उससे ज्यादा हमारे समाज की. 95 साल की उम्र में जिस बूढ़े को अपना घर छोड़ना पड़े, वह एक बदनसीब बूढ़ा होता है. लेकिन जिस मुल्क को उसके लेखक और कलाकार छोड़कर चले जाते हैं, वह कहीं ज्यादा बदनसीब होता है, और इस अर्थ में असुरक्षित भी कि वहां आततातियों और फासीवादियों का कब्जा बढ़ने का अंदेशा बड़ा होता जाता है. अब हुसेन नहीं हैं तो हमारी सरस्वती कहीं ज्यादा खतरे में है.

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