महामारी से पर्यटन ठप

पिछले साल कोरोना वायरस के कारण लगे तालाबंदी से भारत को क़रीब 1.25 ख़रब रुपये से अधिक का नुक़सान हुआ है और लाखों लोग बेरोजगार हुए हैं

पर्यटन स्थलों और दुनिया की सबसे पुरानी परम्परा व संस्कृति के लिए प्रसिद्ध भारत में आज पर्यटन और इससे जुड़े कारोबार बिल्कुल चौपट पड़े हैं। कोरोना महामारी ने भारतीय पर्यटन उद्योग को जिस तरह तबाह किया है, उसके जल्दी उबरने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही। पिछले साल मार्च से विदेशी पर्यटक बिल्कुल भी भारत का रुख़ नहीं कर रहे हैं, क्योंकि भारत सरकार ने पिछले साल 20 मार्च से पर्यटक वीजा पर रोक लगा रखी है। भारत में दूसरे साल भी पर्यटन चालू न होने से अनुमानित तौर पर 60 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का नुक़सान हो चुका है। इस नुक़सान के चलते भारत सरकार को टैक्स का बहुत बड़ा घाटा हुआ है।

इंडियन एसोसिएशन ऑफ टूर ऑपरेटर्स (आईएटीओ) के देश में क़रीब 1,600 ऑपरेटर सदस्य हैं। इसके अलावा दूसरी कम्पनियों के हजारों ऑपरेटर, पर्यटन से जुड़े दूसरे लोग, जैसे- गाइड, ड्राइवर, कंडक्टर, सेवादार आदि के अलावा होटल, रेस्त्रां और दूसरे व्यापारों से जुड़े लोग, छोटे-बड़े दुकानदार हैं, जिनकी संख्या पूरे देश में लाखों में है। पर्यटन एक ऐसा उद्योग है, जो मौसमी (सीजनली) है, लेकिन फिर भी मौसम के अलावा भी यह थोड़ा-बहुत चलता ही रहता है। मूल रूप से पर्यटन की बुकिंग अक्टूबर से अगले साल के मार्च महीने तक होती है और विदेशी पर्यटक फरवरी से जुलाई तक भारत में ख़ूब आन्नद करते हैं, जिससे यहाँ के लाखों लोगों के घरों का चूल्हा जलता है। पर्यटन से जुड़े नैनीताल निवासी एक गाइड कैलाश (बदला हुआ नाम) बताते हैं कि उनका यही एक सहारा है।

पिछले साल से ही उनका काम ठप पड़ा है, जिसके चलते न तो बच्चों की फीस जमा हो पा रही है और न ही घर ठीक से चल पा रहा है। अचानक आँख में आँसू भरकर कैलाश कहते हैं, 10-15 हजार महीना कमाने वाले का रोजगार छिन जाए, तो वह इस तालाबंदी (लॉकडाउन) में क्या करे? बाहर निकलो, तो पुलिस की मारे; घर में रहो, तो भूख की नौबत…; हम कहाँ जाएँ? क्या करें? कोई तो बताए। और फिर कैलाश के आँसू आ जाते हैं। देश में न जाने ऐसे कितने कैलाश हैं, जिन्होंने पर्यटन और उससे जुड़े धन्धों को अपनी आजीविका बनाया था, जो अब कोरोना महामारी के समय में धोखा दे गयी। भारत में कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर साल तक़रीबन पाँच करोड़ पर्यटक घूमने निकलते हैं, जिनमें विदेशियों की संख्या काफ़ी होती है। कोरोना वायरस के असर पर कंफेडरेशन ऑफ इंडस्ट्री (सीआईआई) के एक अध्ययन के अनुसार, भारत के पर्यटन उद्योग पर आने वाले कई महीने और भी भारी पडऩे वाले हैं। पर्यटन उद्योग से जुड़े लोगों की हालत दिन-ब-दिन दयनीय होती जा रही है, जिसमें सबसे बदतर हालत छोटे स्तर पर काम करने वालों की है।

एक अन्य अनुमान के अनुसार, देश में पर्यटन से अक्टूबर, 2019 से मार्च, 2020 तक 28 अरब डॉलर की मुद्रा एकत्रित होने का अनुमान था, लेकिन कोरोना महामारी के कारण यह संचय पहले 60 से 65 फ़ीसदी रह गया, जो बाद में यह बिल्कुल चौपट-सा हो गया। सीआईआई की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि विदेशों में बसे भारतीय प्रवासी भी हर साल अप्रैल से सितंबर के महीने में परिवार से मिलने यहाँ आते हैं, जो कि कोरोना महामारी की वजह से नहीं आ पा रहे हैं। अनेक भारतीय तो कोरोना महामारी और भारत में तेजी से हो रही मौतों से इतने डरे हुए हैं कि अपनी यात्रा रद्द करवा रहे हैं। पर्यटन की रिपोर्टों पर गौर करें, तो पता चलता है कि भारत में सन् 2017 में 1.4 करोड़ विदेशी पर्यटकों ने यात्रा की थी। साल 2018 में 1.56 करोड़ विदेशी पर्यटकों ने भारत का दौरा किया, जबकि साल 2019 में केवल 1.93 लाख विदेशी पर्यटकों ने ही भारत भ्रमण किया। 2020 आते-आते यह संख्या घटकर 30 लाख से कम रह गयी, जो कि अब शून्य हो चली है। वहीं कई भारतीय मूल के प्रवासी, जो कि साल 2020 में कोरोना महामारी के चलते स्वदेश वापस लौटकर आ गये थे; अब तक यहीं रुके हुए हैं। पिछले साल केंद्रीय पर्यटन राज्य मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल ने भी पर्यटन में हो रहे करोड़ों के घाटे पर राज्यसभा में चिन्ता व्यक्त की थी।

देश में कई पर्यटन व्यवसायी ऐसे हैं, जो हर साल इस उद्योग से करोड़ों रुपये की कमायी करते हैं। ऐसे व्यापारियों में हर एक कम-से-कम 40-50 लोगों को रोजगार देता है। ऐसे में इन व्यापारियों के साथ-साथ इनके यहाँ नौकरी करने वाले और ठेके पर काम करने वाले लोग भी बड़ी तादाद में बेरोजगार हुए हैं। बहेड़ी में एक टूर एंड ट्रैवल एजेंसी पर बस चलाने वाले संजय कहते हैं कि वह हर साल नैनीताल में विदेशी लोगों से भरकर बस लाते-ले जाते थे। लेकिन पिछले डेढ़ साल से उनका काम बन्द पड़ा है। दूसरा कोई काम उन्हें आता नहीं है। आता भी होता, तो करते क्या? सब कुछ तो बन्द पड़ा है। बाहर से लोग आ नहीं रहे हैं, तो दूसरा काम भी कैसे चलेगा?

90 फ़सदी लोगों की गयी नौकरी