नये राजनीतिक मोर्चे की तैयारी

गै़र-भाजपा, गै़र-कांग्रेस गठबन्धन बनाने में जुटे शरद पवार

चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद देश में नया राजनीतिक फ्रंट बनाने की तैयारी हो रही है। संकेत यही हैं। शरद पवार के नेतृत्व में यह फ्रंट बन सकता है। नतीजे कांग्रेस के अनुकूल नहीं रहते हैं, तो पार्टी के कुछ बाग़ी (जी-23) नेता अपना अलग ग्रुप बनाकर इस फ्रंट से जुड़ सकते हैं, जिसका नाम डेमोक्रेटिक कांग्रेस पार्टी जैसा कुछ हो सकता है। शरद पवार, जो गै़र-भाजपा, गै़र-कांग्रेस गठबन्धन बनाना चाहते हैं, पिछले चार महीनों में इस दिशा में कई राजनीतिक दलों के नेताओं से सम्पर्क कर चुके हैं।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अलावा पवार की इस मसले पर मुख्यमंत्री नेता सीताराम येचुरी, कांग्रेस के बाग़ियों, आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं, राज्य स्तर पर पैठ रखने वाले क्षेत्रीय दलों के नेताओं के अलावा उत्तर प्रदेश के दलों के नेताओं से भी बात हो रही है। यहाँ तक कि शिव सेना भी इसका हिस्सा हो सकती है। जानकारी के मुताबिक, कांग्रेस में आलाकमान को लेकर कथित ब़ागी नये गठबन्धन के विचार के बाद ही सक्रिय हुए। कांग्रेस के इन ब़ागी नेताओं को लगता है कि प्रस्तावित गठबन्धन देशव्यापी होगा और यह कांग्रेस को अप्रसांगिक कर सकता है जिससे इसे भाजपा के मुकाबले मुख्य गठबन्धन के रूप में सामने आने में मदद मिलेगी।

केरल में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पीसी चाको ने जब मार्च के पहले हमें कांग्रेस छोड़ी, तो यह कयास लगने लगे कि वह भाजपा में जा सकते हैं। लेकिन चाको कुछ दिन बाद ही शरद पवार की एनसीपी में चले गये। चाको का कांग्रेस छोड़ कर एनसीपी में जाना नये मोर्चे या गठबन्धन के गठन से जोड़कर देखा जा सकता है। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता के मुताबिक, आने वाले समय में हो सकता है कुछ और इक्का-दुक्का नेता कांग्रेस से एनसीपी जैसे दलों में जाएँ। कांग्रेस संस्कृति से जुड़े नेता एनसीपी को भाजपा के मुकाबले बेहतर विकल्प मानते हों; क्योंकि वे वहाँ ज्यादा सहज महसूस करते हैं। कहा जाता है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे बड़े नेता एक साल बाद भी भाजपा में जाकर बहुत सहज महसूस नहीं कर रहे।

कांग्रेस में अचानक प्रियंका गाँधी को सक्रिय करने की रणनीति इस प्रस्तावित गठबन्धन की भनक आलाकमान को मिलने के बाद ही बुनी गयी है। इस गठबन्धन के सम्भावित दल के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर ‘तहलका’ से बातचीत में कहा- ‘इसमें कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस का आज भी बड़ा आधार है और राहुल और प्रियंका गाँधी जनता में लोकप्रियता रखते हैं। लेकिन साफ नेतृत्व के अभाव में और लगातार चुनाव हारने से कांग्रेस के भीतर निराशा का माहौल है। यदि यह मोर्चा बनता है, तो इसे सफलता मिल सकती है। इसमें कोई दो-राय नहीं कि कांग्रेस के पास अभी भी कई बड़े नेता हैं। इनमें से बहुत ज़मीनी नेता हैं और जनता पर उनकी मज़बूत पकड़ है। नहीं भूलना चाहिए कि सन् 2017 में राहुल गाँधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के एक साल के भीतर ही पार्टी ने तीन बड़े राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा को चुनाव में हराकर सरकार बना ली थी। सन् 1999 में जब शरद पवार ने सोनिया गाँधी के खिलाफ बगावत करते हुए कांग्रेस छोड़ी थी, तो उनकी उम्मीद के विपरीत गिने चुने बड़े नेता ही उनके साथ गये थे। इनमें से तारिक अनवर अब कांग्रेस में हैं; जबकि एक और बड़े नेता पीए संगमा अब इस दुनिया में नहीं हैं। तीसरे मोर्चे की बात हवा-हवाई नहीं है। यह बहुत अहम है कि मार्च के तीसरे ह$फ्ते $खुद एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने देश में तीसरे मोर्चे की वकालत करते हुये इसकी जरूरत जतायी है। पवार ने कहा कि अभी तक कोई आकार नहीं दिया गया है। हम विभिन्न पक्षों से बात कर रहे हैं। निश्चित ही देश को तीसरे मोर्चे की जरूरत है। पवार ने यह बात तब कही, जब पीसी चाको उनकी पार्टी में शामिल हुए।