चुनौती और चुप्पी

जदयू के विधानपार्षद देवेशचंद्र ठाकुर कहते हैं, ‘नीतीश कुमार धर्मासती कांड से बेहद दुखी थे और परेशान भी लेकिन वे जांच रिपोर्ट आने के पहले कुछ नहीं बोलना चाहते थे, इसलिए चुप रहे.’ नीतीश कुमार या उनकी जगह कोई भी मुख्यमंत्री होता तो इतने बड़े हादसे से दुखी तो जरूर होता, लेकिन जानकारों के मुताबिक इसके पीछे एक दूसरी बात भी है. मुख्यमंत्री के सामने हाल में इतनी तेजी से एक के बाद एक लगातार चुनौतियां पैदा हो रही हैं कि उन्हें समझ में नहीं आ रहा कि इस पर कैसे प्रतिक्रिया की जाए. बीते जून के पहले पखवाड़े जब भाजपा और जदयू के बीच अलगाव की प्रक्रिया चल रही थी तो बिहार के जमुई इलाके में नक्सलियों ने दिन-दहाड़े एक ट्रेन को घेरकर अंधाधुंध फायरिंग की और तीन लोगों की हत्या करने के साथ-साथ रेलवे पुलिस बल के जवानों से हथियार लूट लिए. उसके कुछ दिनों बाद ही पश्चिम चंपारण के बगहा में पुलिस फायरिंग हुई, जिसमें छह थारू आदिवासियों की मौत हो गई. भाजपा ताजा-ताजा विपक्ष में गई थी, लालू प्रसाद सक्रिय थे ही, यह गोलीकांड भी नीतीश के लिए परेशानी का सबब बना. उन्होंने जांच का आदेश देकर मौन साध लिया. कुछ ही दिन बीते थे कि बोधगया बम ब्लास्ट की घटना हो गई.

इस पर चाहकर भी नीतीश न तो मौन साध सकते थे, न टालू रवैया अपना सकते थे. उन्हें आनन-फानन में सुबह ही बोधगया निकलना पड़ा. लेकिन मामला शांत नहीं हुआ. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, केंद्रीय गृह मंत्री सुशील शिंदे, भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह और पार्टी के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली बोधगया पहुंचकर मुद्दे की गरमी बढ़ाते रहे. कुछ दिनों पहले तक जो शिंदे नीतीश कुमार के लिए कसीदे पढ़कर गए थे वे बोधगया से राज्य सरकार को निकम्मा बता कर निकल लिए. ये सब परेशानियां एक-एक कर इतनी तेजी से आती रहीं कि नीतीश को सोचने का वक्त तक नहीं मिला. और ऊपर से मिड डे मील हादसे ने तो बिहार की पूरे देश में किरकिरी कर दी. राज्य सरकार बैकफुट पर आ गई. उसी दरमियान औरंगाबाद में माओवादियों ने पांच हत्याएं करके अलग परेशानी खड़ी कर दी. जदयू के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘किस-किस मामले को संभालते नीतीश कुमार. किस-किस पर बोलते!’

बात सही है. पिछले साढ़े सात साल के राज-काज चलाने के अनुभव में एक साथ नीतीश कुमार इतनी परेशानियों से कभी घिरे भी नहीं थे. और बात इतने पर खत्म भी तो नहीं होती. इन सभी घटनाओं के बीच ही कांग्रेस ने पड़ोसी राज्य झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ सरकार बनाने के लिए बने गठबंधन में लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद को खासी तवज्जो देकर नीतीश को अलग से मायूसी का संदेश दे दिया.

तिस पर परेशानियां घर के भीतर भी हैं. आम तौर पर नीतीश के संकटमोचक बनकर उभरने वाले और भाजपा से अलगाव करवाने में दिन-रात बोल-बोलकर माहौल तैयार करवाने वाले राज्यसभा सांसद शिवानंद तिवारी भी इस पूरे मामले में अलग रहकर लगभग चुप्पी ही साधे रहे. दूसरों की बात कौन कहे, जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव भी मिड डे मील मसले पर या समानांतर रूप से हुई कई घटनाओं पर नीतीश के बचाव में बयान देते नजर नहीं आए. सूत्र बता रहे हैं कि जदयू में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा. यही वजह है कि भाजपा से अलगाव के बाद डेढ़ माह से भी ज्यादा वक्त गुजर जाने के बाद नीतीश कुमार चाहकर भी मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं कर पा रहे. पार्टी के अंदर एक चिंगारी है जो कभी भी आग का रूप ले सकती है. सूत्र बताते हैं कि जदयू के 20 में से करीब एक दर्जन सांसद ऐसे हैं जो भाजपा से अलगाव की वजह से नाखुश हैं. वे अपनी सीट भाजपा के सहयोग के बगैर निकाल पाएंगे इसे लेकर आश्वस्त नहीं. उधर, बताया जा रहा है कि भाजपा से अलगाव के बाद शरद यादव अलग नाराज चल रहे हैं, क्योंकि अब राष्ट्रीय अध्यक्ष होते हुए भी पार्टी में उनकी हैसियत शो-पीस की हो गई है. जब तक राजग के संयोजक थे तब तक सक्रियता और कुछ बोलने की वजह भी बनी रहती थी. अब वे जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष भर हैं और पार्टी के विधायक और सांसद नीतीश कुमार का कहा मानते हैं. शरद को सुनने वालों की संख्या कम है. आगे क्या होगा, अभी से कहना जल्दबाजी है लेकिन फिलहाल यह साफ दिख रहा है कि मुश्किल में चल रहे नीतीश कुमार बाहरी और आंतरिक, दोनों किस्म की परेशानियों में घिरकर अकेले-से पड़ गए हैं.
लेकिन जानकारों के मुताबिक नीतीश के घिरते जाने या अकेले और अलग-थलग पड़ जाने का मतलब यह भी नहीं कि इसमें लालू प्रसाद को संजीवनी मिलने या भाजपा के मजबूत होने के संकेत हैं. प्रदेश में भाजपा खुद बगावत का दंश झेल रही है और डेढ़ माह में सरकार के राज-काज और उपलब्धियों पर सवाल उठाकर खुद को हास्यास्पद बनाने में लगी हुई है. और रही बात लालू प्रसाद की तो वे चारा घोटाले के आखिरी फैसले में जेल जाने से बचने के लिए आरजू-मिन्नत और भक्ति-भाव के साथ बिहार छोड़कर उत्तर प्रदेश में विंध्याचल के आस-पास बाबाओं से आशीर्वाद लेने में मशगूल हैं.    l

साफ दिख रहा है कि मुश्किल में चल रहे नीतीश कुमार बाहरी और आंतरिक, दोनों किस्म की परेशानियों में घिरकर अकेले-से पड़ गए हैं

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here