' किसी का भी नाम सिर्फ छोटू या लड़की कैसे हो सकता है '

 रोज की तरह उस दिन भी मैं दिल्ली मेट्रो के एक स्टेशन के नीचे खड़ी अपने दोस्तों का इंतजार कर रही थी. गर्मियों का वक्त था. कॉलेज में छुट्टियां पड़ी हुई थीं और पिछले कुछ समय से हम सबका इंटर्नशिप के लिए एक पत्रिका के दफ्तर आना-जाना हो रहा था. आम दिनों के उलट उस दिन मौसम मेहरबान था. झुलसाने वाली धूप नदारद थी और ठंडी-ठंडी हवा के साथ हल्की-हल्की बूंदाबांदी भी हो रही थी. यही वजह थी कि इंतजार का वक्त मौसम का आनंद लेते हुए कट रहा था.

 तभी मेरे पास दो छोटे-छोटे बच्चे  आए. हाफ पैंट, फटी कमीज पहने और धूल-मिट्टी से सने. एक लड़का और दूसरी लड़की. उम्र करीब तीन-चार साल रही होगी. धूप, धूल और दूसरे शब्दों में कहें तो अभावों की मार ने उन पर ऐसी चोट की थी कि उनकी शक्ल पर आंखों के अलावा कुछ नहीं दिख रहा था. सामने आते ही उन्होंने हाथ फैला दिए और भीख मांगना शुरू कर दिया.

  

पता नहीं मैंने ऐसा क्यों कहा. शायद मन में यह भाव रहा हो कि बच्चों को लगे कि पैसा उन्होंनेकुछ कोशिश करके हासिल किया है एक बार तो मन में ख्याल आया कि इन्हें यहां से भगा दूं. लेकिन दूसरे ही पल सोचा कि जब तक दोस्त नहीं आते क्यों न तब तक इनसे बात की जाए. ऐसा मैंने क्यों सोचा पता नहीं. चेहरे की मासूमियत को गंदगी में छिपाए दोनों बच्चे अब भी मेरे सामने खड़े थे. मैंने उनसे कहा, ‘हाथ नीचे करो और सीधे खड़े  हो जाओ.फिर मैंने उनका नाम पूछा.

 

लेकिन यह जानकर मुझे आश्चर्य हुआ कि उनमें से किसी का भी कोई नाम नहीं था. एक ने अपना नाम छोटू बताया और दूसरी ने लड़की. दोबारा पूछने पर भी वही नाम. छोटू और लड़की.

मैं हैरान थी. किसी का भी नाम सिर्फ छोटू या लड़की कैसे हो सकता है. ख्याल आए तो आते चले गए. बिना नाम के इनका जीवन कितना अजीब होता होगा? इन बच्चों से ऐसी कौन-सी भूल हुई है जो इन्हें इस तरह का जीवन मिला है? इनके माता-पिता ने इनको इतनी छोटी-सी उम्र में भीख मांगने में क्यों लगा दिया? नाम नहीं यानी कोई पहचान नहीं और जो उनकी हालत थी उसे देखते हुए लगता नहीं था कि उनके जीवन का कोई मकसद भी होगा.

 

दोनों बच्चे अब भी मेरे सामने हाथ फैलाए खड़े थे. मैंने उन्हें एक से दस तक गिनती सुनाने को कहा. हालांकि मुझे अंदाजा था कि वे नहीं सुना पाएंगे. ऐसा ही हुआ भी. उन्हें गिनती के बारे में कुछ पता ही नहीं था. मैंने उनसे कहा कि मैं बोलती हूं तुम मेरे साथ-साथ बोलना. शरमाते-सकुचाते हुए वे इसके लिए राजी हो गए. और काफी कोशिश के बाद उन्हें एक से पांच तक की गिनती याद भी हो गई.

तभी मेरे दोस्त पहुंच गए. जितनी हैरान मैं उन बच्चों को देखकर थी उतनी ही हैरानी के भाव उन बच्चों के साथ मुझे खड़ा देखकर मेरे दोस्तों के चेहरे पर भी आए. इस हैरानी में कुछ अंश उस घृणा का भी मिला हुआ था जिसके साथ हम लोग अक्सर ऐसे बच्चों को देखा करते हैं. मेरे एक दोस्त ने पूछा भी कि क्यों मैंने ऐसे मैले-कुचैले बच्चों को अपने पास खड़ा कर रखा है. उधर, वे दोनों इससे बेपरवाह अब भी टुकुर-टुकुर हम सभी को ताके जा रहे थे.

 

हम सभी जाने को हुए कि दोनों बच्चों ने एक बार फिर हाथ फैलाकर मांगना शुरू कर दिया. मेरे पास उनके लिए तरस और सद्भावना के अलावा कुछ नहीं था. तभी मेरे एक दोस्त ने जेब से पांच रु का नोट निकाला और उन्हें देने लगा. मैंने उसे रोका और बच्चों से कहा, ‘पहले पांच तक गिनती सुनाओ.

 

पता नहीं मैंने ऐसा क्यों कहा. शायद मन में यह भाव रहा हो कि बच्चों को लगे कि पैसा उन्होंने कुछ कोशिश करके हासिल किया है या दूसरे शब्दों में कहें तो अपने मानसिक श्रम से कमाया है. उन्होंने थोड़ी कोशिश की भी और टूटी-फूटी ही सही पर पांच तक गिनती सुना दी. हम लोग भी पांच का नोट उन्हें देकर चल दिए.

 

इस घटना को कुछ दिन हो गए हैं मगर उन बच्चों का चेहरा अब भी मेरे जेहन में है. सोचती हूं कि क्या उन बच्चों को जिंदगी में कभी कोई नाम या मकसद मिल पाएगा? क्या उनकी जिंदगी में कभी खुशी और रोशनी बिखरेगी? और सबसे अहम यह कि जब तक ऐसे लाखों बच्चों के जीवन को कोई अच्छी दिशा नहीं मिलती तब तक क्या हमें एक देश के रूप में खुद को महान कहने का वास्तव में हक है?