क़ानून की कठपुतली

केंद्र के ब्रेक लगाने के बाद केजरीवाल सरकार ने कहा कि केंद्र सरकार को इस योजना के नाम पर आपत्ति थी। अगर यही आपत्ति है, तो हमने योजना का नाम हटाने का फै़सला करते हैं। क्योंकि हमें कोई श्रेय (क्रेडिट) नहीं चाहिए। केजरीवाल ने कहा कि उनकी सरकार ने कहा कि योजना का म$कसद लोगों को कष्ट से बचाना है। उनके मुताबिक, हम बोरी में पैक करके लोगों का जितना राशन बनता है, उतना सीधे उनके घर पहुँचा देते हैं, तो लोगों को लाइनों में नहीं लगना पड़ेगा। इसी मक़सद से मुख्यमंत्री घर-घर राशन योजना लायी गयी थी। अब इस योजना का कोई नाम नहीं होगा, हमें श्रेय नहीं चाहिए।

केजरीवाल ने कहा कि योजना पर रोक केंद्र ने इस आधार पर लगायी क्योंकि केंद्र सरकार ने कहा कि आप इस योजना का नाम मुख्यमंत्री के नाम पर नहीं रख सकते। उनको शायद मुख्यमंत्री शब्द से आपत्ति है। हम यह योजना अपना नाम चमकाने या श्रेय के लिए नहीं कर रहे हैं। मैंने अफसरों से योजना का नाम हटाने को कहा और अब इसका कोई नाम नहीं होगा। जैसे पहले केंद्र सरकार से राशन आता था और दुकानों के ज़रिये बाँटा जाता था, अब यह घर-घर पहुँचाया जाएगा। मुझे लगता है कि इस निर्णय के बाद केंद्र सरकार की आपत्तियाँ दूर हो गयी होंगी और अब वह इस पर रोक नहीं लगाएगी।

चतुर राजनीतिज्ञ केजरीवाल

कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा अरविंद केजरीवाल को भी निपटाना चाहती है। हाल के निकाय चुनावों में आम आदमी पार्टी ने जिस तरह उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब और कुछ अन्य राज्यों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवायी है, उससे भाजपा के रणनीतिकार चौकन्ने हुए हैं। उन्हें लगता है कि यदि केजरीवाल को अभी से राजनीतिक रूप से कमज़ोर नहीं किया गया, तो वह उसके लिए आने वाले समय में उनके राजनीतिक करियर के लिए ख़तरा बन सकते हैं। केजरीवाल जनता को अपने पक्ष में करने में माहिर माने जाते हैं साथ ही वो बहुत चतुर भी हैं। इसकी झलक शाहीन बाग़ में सीएए विरोधी आन्दोलन के दौरान मिली थी, जब भाजपा के बहुत उकसाने के बावजूद केजरीवाल एक समय तक तटस्थ बने रहे  थे।

पिछले विधानसभा चुनाव में उनका हनुमान चालीसा पढऩा और बाद में अपनी जीत का श्रेय हनुमान जी को देना भी एक राजनीतिक पैंतरा था। भाजपा के लिए सबसे बड़ी दिक़़्कते यह है कि वह बहुत कोशिश करके भी केजरीवाल की हिन्दू विरोधी छवि गढऩे में पूरी तरह नाकाम रही है। ऐसा कांग्रेस के बारे में नहीं कहा जा सकता। इसका एक कारण कांग्रेस और उसके बड़े नेताओं का मुद्दों पर खुले रूप से निर्णय लेना भी है। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस या राहुल गाँधी सच में हिन्दू विरोधी है। कांग्रेस और राहुल गाँधी के विपरीत केजरीवाल बहुत सँभलकर बोलते हैं। इसका कारण देश भर में भाजपा का हिन्दू उभार लाना या धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करना है। केजरीवाल जानते हैं कि भाजपा के जाल में फँसने का मतलब होगा- भाजपा को दिल्ली में अपने हिसाब से मुद्दे चलाने का रास्ता दे देना।

केजरीवाल भाजपा के बड़े नेताओं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह या उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तरह सार्वजनिक धार्मिक उत्सवों में हिस्सा लेते हैं। दीवाली हो या अन्य हिन्दू त्यौहार, केजरीवाल खुलकर दीपमाला करते और जनता को अपना सन्देश देते हैं। देशभक्ति दिखाने के मौके़ भी वह नहीं चूकते। एक तरह से केजरीवाल भाजपा की तरह की ही राजनीति कर रहे हैं, लेकिन फिर भी वह भाजपा से अलग दिखते हैं। भाजपा के विपरीत उनकी मुस्लिमों और अन्य समुदायों में बेहतर पैठ है। यहीं केजरीवाल के सामने भाजपा मजबूर है।

यह केजरीवाल की राजनीतिक चतुराई ही है कि जब भाजपा मध्य प्रदेश में कमलनाथ जैसे घाघ नेताओं के होते हुए भी या पुडुचेरी में ऐन चुनाव के समय कांग्रेस सरकारें गिरा लेती है, या मनमर्ज़ी से उसके दिग्गज नेताओं को अपने पाले में कर लेती है, दिल्ली में केंद्र शासित प्रदेश होने के बावजूद वह केजरीवाल के आगे पस्त नज़र आती है। अब भाजपा अपनी केंद्र सरकार के ज़रिये इस मोर्चे पर हारकर केजरीवाल के अधिकार सीमित करने का दाँव आजमा रही है। उसकी कोशिश केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी के सामने राजनीतिक अस्तित्व का संकट पैदा करना है।

दिल्ली में अब अगले साल स्थानीय नगर निगम के चुनाव होने हैं। हाल में पाँच सीटों पर हुए उप चुनाव में से चार सीटें जीतकर केजरीवाल की पार्टी भाजपा के लिए ख़तरे का घंटी बजा चुकी है, जिसे एक भी सीट नहीं मिली। जबकि कांग्रेस एक सीट जीतने में सफल रही। केजरीवाल बहुत खू़बसूरती से अपने खिल़ाफ अन्याय वाला कार्ड खेलते हैं और अब फिर वह ऐसा ही करेंगे। वह बार-बार कहते हैं कि केंद्र सरकार उन्हें काम नहीं करने दे रही। जनता में वह कमज़ोर न दिखें, इसके लिए वह हार हाल में जनता की लड़ाई मज़बूती से लडऩे की बात भी साथ ही कह देते हैं। केजरीवाल का मशहूर डायलॉग है- ‘वे (केंद्र में बैठे लोग) हमें परेशान कर रहे हैं और हम काम कर रहे हैं। क्योंकि आप (जनता) हमारे साथ हैं।’ इस तरह केजरीवाल केंद्र के ख़िलाफ अपनी लड़ाई को जनता की लड़ाई बना देते हैं। दिल्ली की अधिकतर जनता भी उनके काम से काफी खु़श है और उनके समर्थन में दिखती है। जब एक बड़े टीवी चैनल, जिसे लोग गोदी मीडिया की लिस्ट में शामिल करते रहे हैं; ने ‘दिल्ली का बॉस कौन? नाम से एक वोटिंग कैंपेन चलाया, तो 90 फीसदी मत केजरीवाल के पक्ष में पड़े, जबकि केवल 10 फ़ीसदी मत ही उप राज्यपाल के पक्ष में पड़े। इससे केजरीवाल की शोहरत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। यह पहली बार है कि किसी मुख्यमंत्री के लिए लोग ‘आई लव’ लिखने लगे हैं।

याद कीजिए किसान आन्दोलन के शुरुआती दिनों में केजरीवाल पूरे मंत्रिमंडल के साथ सिंघु बार्डर पहुँच गये थे। उन्हें पता है कि किसानों का आन्दोलन पंजाब और उत्तर प्रदेश में उन्हें लाभ दे सकता है। यह भी याद रखें कि बाराणसी में अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री मोदी के खिलाफ़ चुनाव लड़ गये थे। केजरीवाल मोदी के गुजरात पर नज़ारें गढ़ाये हैं। निकाय चुनाव में उनकी पार्टी ने गुजरात में जब 42 सीटें जीती, तो केजरीवाल खु़द जनता का आभार जताने वहाँ पहुँच गये।

अब शक्तियों वाले क़ानून को लेकर केजरीवाल फिर भाजपा और केंद्र के खिल़ाफ निशाना साध चुके हैं। इस मुद्दे पर वह राजनीतिक स्तर पर केंद्र और भाजपा पर हमले कर रहे हैं। यही उनकी रणनीति है। घर-घर राशन की योजना के लिए जब केंद्र ने इसमें मुख्यमंत्री शब्द जोडऩे पर ऐतराज जताया, तो वह तुरन्त यह शब्द हटाने के लिए मान गये। उन्हें पता है कि हर-घर राशन पहुँचाकर राजनीतिक $फायदा तो उन्हें ही मिलेगा। लेकिन उप राज्यपाल को सरकार से ज्यादा शक्तियाँ देने का क़ानून चूँकि राजनीतिक रूप से उन्हें कमज़ोर करता है, वो इसके  खिलाफ़ मज़बूती से खड़े हो गये हैं।

इस विधेयक (क़ानून) से केंद्र और दिल्ली सरकारों के बीच तालमेल बिठाना आसान हो जाएगा। इस संशोधित क़ानून का उद्देश्य उप राज्यपाल की शक्तियों को स्पष्ट करना है। सर्वोच्च न्यायालय के फै़सले के अनुरूप उप राज्यपाल और मंत्रिमंडल के बीच मेल-मिलाप के सम्बन्ध सुनिश्चित करने के लिए क़ानून में संशोधन किया गया है।

केंद्र सरकार (क़ानून बनने से पहले विधेयक पर बयान)

केंद्र और राज्यों में

टकराव के बिंदु

 आठ राज्यों पंजाब, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, झारखण्ड, महाराष्ट्र, केरल, छत्तीसगढ़ और मिजोरम ने अपने-अपने राज्य में मामलों की जाँच के सम्बन्ध में केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) से जाँच सम्बन्धी अपनी सामान्य सहमति वापस ले ली। यह क़दम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘सहकारी संघवाद के मंत्र के दावे के विपरीत केंद्र-राज्य सम्बन्धों में टकराव का संकेत है।

 कोविड-19 से लडऩे के लिए केंद्र सरकार की तरफ से तय कड़े नियमों को राज्यों ने मानने से इन्कार कर दिया।

 जीएसटी मुआवजे़ के अपने हिस्से की माँग तक गै़र-भाजपा राज्य केंद्र के साथ टकराव की मुद्रा में। केंद्र पर शक्तियों के दुरुपयोग की कोशिश का आरोप लग रहा है।

 जीएसटी में अपने हिस्से को लेकर राज्य केंद्र के खिलाफ़ लामबंद।

 सीएए क़ानूनों को लेकर गै़र-भाजपा सरकारें केंद्र के खिलाफ़ हैं।

 केंद्र के तीन कृषि क़ानून को गै़र-भाजपा राज्यों ने नहीं माना और कांग्रेस सरकारें तो अपने संशोधित विधेयक विधानसभाओं में लेकर आयी हैं।

 उप राज्यपाल को सरकार से ज़्यादा शक्तियों वाले विधेयक के खिलाफ़ है दिल्ली सरकार और दूसरे विपक्षी दल।

पहले भी हुआ है टकराव

दिल्ली में उप राज्यपाल और केजरीवाल सरकार के बीच पिछले क़रीब छ: साल में कई बार टकराव हुआ है। शुरुआत तब हुई, जब पहली अप्रैल, 2015 को एक आदेश जारी करके तत्कालीन उप राज्यपाल नजीब जंग ने अधिकारियों को मुख्यमंत्री केजरीवाल का वह आदेश नहीं मानने का फ़रमान जारी कर दिया, जिसमें पुलिस, सार्वजनिक आदेश और ज़मीन से जुड़े सभी मामलों की फाइलें उनके माध्यम से उप राज्यपाल को भेजने का निर्देश था। हालाँकि कुछ दिन चली तकरार के बाद 29 अप्रैल को मुख्यमंत्री केजरीवाल ने अधिकारियों को सभी फाइलें उप राज्यपाल के पास भेजने से मना कर दिया। एक महीने बाद ही 15 मई को केजरीवाल ने शकुंतला गैमलिन को केंद्र की तरफ़ से कार्यवाहक मुख्य सचिव बनाये जाने का विरोध किया। इसके पाँच दिन बाद ही 20 मई को उप राज्यपाल जंग ने यह कहकर कि यह उनका अधिकार है, दिल्ली सरकार की तमाम नियुक्तियों को रद्द करने का आदेश जारी कर दिया। इसके एक दिन बाद ही केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी करके सा$फ किया कि दिल्ली में सभी स्थानांतरण और नियुक्तियों का अधिकार सिर्फ़ उप राज्यपाल को है। यही नहीं भ्रष्टाचार निरोधक ब्रांच (एसीबी) को केंद्र सरकार के अधिकारियों के खिलाफ़ कोई भी कार्रवाई करने के अधिकार से बाहर कर दिया गया। आप सरकार ने 28 मई को केंद्रीय गृह मंत्रालय की अधिसूचना को दिल्ली उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) में चुनौती दी। उसी दिन केंद्र सरकार अधिसूचना को लेकर उच्च न्यायालय की टिप्पणियों के खिलाफ़ सर्वोच्च न्यायालय चली गयी। क़रीब 14 दिन बाद उच्च न्यायालय ने केंद्रीय गृह मंत्रालय की अधिसूचना रद्द कर दी। 4 अगस्त, 2016 को जब उच्च न्यायालय ने उप राज्यपाल को दिल्ली का प्रशासनिक मुखिया बताया, तो 31 अगस्त को इस आदेश को आप सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। सन् 2016 में ही दिल्ली के उप राज्यपाल ने केजरीवाल की तर$फ से डीआईआरसी चेयरमैन पद पर नियुक्त कृष्णा सैनी की नियुक्ति रद्द कर दी थी। 15 फरवरी, 2017 को सर्वोच्च न्यायालय ने राजनिवास और दिल्ली सरकार के बीच चल रही रस्साकशी को संवैधानिक पीठ को भेज दिया। 20 फरवरी, 2018 को मुख्य सचिव अंशु प्रकाश ने आप विधायकों और मुख्यमंत्री पर अभद्र व्यवहार का आरोप लगाया। सर्वोच्च न्यायालय की पाँच सदस्यीय पीठ ने उप राज्यपाल को चुनी हुई सरकार की सलाह मानने को कहा। आईएएस अधिकारियों की नियुक्ति को लेकर 2018 की गर्मियों में मुख्यमंत्री केजरीवाल ने अपने मंत्रिमंडल के प्रमुख मंत्रियों के साथ उप राज्यपाल के घर पर ही धरना दे दिया था। 14 फरवरी, 2019 को दो सदस्यीय संविधान पीठ ने शक्तियों के विभाजन का निर्णय दिया, लेकिन इस निर्णय को एक बड़ी पीठ के पास भेज दिया गया और यह मामला वहाँ लम्बित है। इसके आलावा दिल्ली मेट्रो का किराया बढ़ाने को लेकर भी केंद्र से केजरीवाल का विवाद हुआ। क्योंकि केजरीवाल किराया बढ़ाने के पक्ष में नहीं थे। गेस्ट टीचर की नौकरी पक्की करने पर भी उप राज्यपाल से केजरीवाल की तनातनी बढ़ी। केजरीवाल ने आरोप लगाया कि शिक्षकों से जुड़ी फाइल दबा ली गयी है। दिल्ली में सीलिंग विवाद में भी केजरीवाल और उप राज्यपाल आमने सामने आये।

जब कोरोना हुआ, तो केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली के अस्पतालों में पहले दिल्ली के लोगों का इलाज होगा, तो उप राज्यपाल ने इस फै़सले को बदल दिया कि दिल्ली में सबका इलाज होगा। दिल्ली सरकार ने जब पूर्व सैनिक रामकिशन ग्रेवाल के परिवार को एक करोड़ रुपये मुआवज़े का ऐलान किया, तो उप राज्यपाल ने वो फाइल ही सरकार को वापस भेज दी। ऐसा ही नौ सलाहकार नियुक्त करने के सरकार के फै़सले में हुआ।

दिल्ली में उप राज्यपाल मंत्रिपरिषद् की सलाह से काम करेंगे। उप राज्यपाल स्वतंत्र तौर पर काम नहीं करेंगे, अगर कोई अपवाद है, तो वह मामले को राष्ट्रपति को हस्तांतरित कर सकते हैं और जो फै़सला राष्ट्रपति लेंगे उस पर अमल करेंगे। अनुच्छेद-239(एए) के तहत मंत्रीपरिषद् के पास कार्यकारी शक्तियाँ हैं। मंत्रिपरिषद् राज्य और समवर्ती सूची में जो भी विषय हैं, उसमें तीन अपवाद को छोड़कर बाकी मामले में स्वतंत्र होकर काम कर सकेगी। सार्वजनिक आदेश, पुलिस और •ामीन को छोड़कर राज्य सूची में जो भी विषय हैं, उसमें राज्य सरकार $कानून बना सकती है। जो भी फै़सला सरकार लेगी उसके बारे में वह उप राज्यपाल को अवगत कराएगी; लेकिन उप राज्यपाल की सहमति ज़रूरी नहीं है। अपवाद के तौर पर उप राज्यपाल किसी मामले को राष्ट्रपति को हस्तांतरित कर सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ हर मामला नहीं है। उप राज्यपाल फै़सले में दिये गये सिद्धांत को ध्यान में रखकर मामले को उप राज्यपाल समझौता कर सकते हैं। दिल्ली में उप राज्यपाल की स्थिति दूसरे राज्यों के राज्यपालों जैसी नहीं है। वह एक प्रशासक हैं। इसमें निरंकुशता के लिए कोई जगह नहीं है। संतुलित संघीय व्यवस्था का मतलब है कि केंद्र तमाम अधिकार अपने पास न रखे, बल्कि राज्य अपनी परिधि में बिना द$खल के काम करें। अनुच्छेद-239(एए) में जो व्याख्या है, उसमें उप राज्यपाल को मंत्रिपरिषद् की सलाह मानना अनिवार्य है। यह अनिवार्यता तब तक होगी, जब तक कि वह क्लॉज-4 के तहत मामले को राष्ट्रपति को हस्तांतरित न कर दें। उप राज्यपाल को $खुद स्वतंत्र तौर पर फै़सला नहीं लेना है।

(न्यायाधीश दीपक ठाकुर की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ का 4 जुलाई, 2018 का आदेश।)