इजराइल-फिलिस्तीन फ़िलवक़्त शान्त

इजराइल व हमास में संघर्ष थमा, लेकिन दुश्मनी बरक़रार
भारतीय बयान बेहद सधा हुआ और देशहित में
निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर काम करें ओआईसी के सदस्य देश

यरुशलम स्थित अल-अक्सा मस्जिद से शुरू हुई मामूली झड़प से शुरू हुआ इजराइल और फिलिस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास के बीच 11 दिन का ख़ूनी संघर्ष अंतत: थम गया है। इस भीषण युद्ध में अब तक क़रीब 250 लोगों के मारे जाने की ख़बर है, जिसमेंज़्यादातर जानें गाजा शहर में गयी हैं। ऐसा माना जा रहा है कि दोनों पक्षों ने भारी अंतर्राष्ट्रीय दबाव में संघर्षविराम का $फैसला लिया है। इस भयंकर संघर्ष के दौरान जिस तरह से अति उत्साह में कुछ इस्लामिक देशों के बयान आ रहे थे और वो इस मुद्दे पर गोलबंद होते दिख रहे थे, उससे लग रहा था कि यह ख़तरनाक संघर्ष अभी और चलेगा।
संघर्षविराम के बाद जहाँ हमास इसे अपनी जीत बता रहा है, वहीं इजराइल को अपने ही देश के विपक्षी राजनीतिक पार्टियों द्वारा सीजफायर के लिए आलोचना की जा रही है। इस ख़ूनी संघर्ष में नुक़सान दोनों तरफ़हुआ है। लेकिन फिलिस्तीन के गाजा में जिस तरह तबाही हुई है, इसके पुनर्निर्माण में लम्बा वक़्त लगेगा। हमास ने जिस तरह से इजराइल पर हज़ारों रॉकेट हमले किये हैं, अगर इजराइल के पास अत्याधुनिक सुरक्षा प्रणाली ‘आयरन डोम’ नहीं होता, तो इजराइल में भयंकर तबाही मचती। इस भीषण संघर्ष में तबाही का वास्तविक आकलन कुछ समय बाद ही सम्भव है। युद्धविराम से वर्तमान माहौल भले ही बदलने लगा हो। लेकिन इस जगह पर कब छोटी झड़प आगे इस सम्पूर्ण क्षेत्र को आग में झोंक दें, कुछ कहा नहीं जा सकता। संघर्षविराम के बाद इजराइल ने स्पष्ट संकेत दिये हैं कि अगर हमास ने फिर से रॉकेट से हमले किये, तो उसका जवाब बहुत सख़्ती से दिया जाएगा। यह दु:खद है कि जब दुनिया के अधिकतर देश कोरोना वायरस से ज़िन्दगियाँ बचाने में जुटे हैं, ऐसे में मध्य-पूर्व क्षेत्र दूसरे ही मामलों में फँसकर जान गवाँ रहा है। ध्यातव्य रहे कि मध्य पूर्व क्षेत्र लम्बे समय से विभिन्न कारणों से तनाव से गुज़र रहा है, वर्तमान परिदृश्य को देखकर इस क्षेत्र में अभी शान्ति की उम्मीद नहीं की जा सकती।

इजराइल और हमास में जारी भीषण संघर्ष के बीच 16 मई को संयुक्त राष्ट्र में स्थायी भारतीय प्रतिनिधि टी.एस. तिरूमूर्ति द्वारा जारी बयान के बाद कई अंतर्राष्ट्रीय नीति विश्लेषक और पत्रकार इस बयान को अलग अलग तरीक़े से देख रहे हैं। अगर हम भारतीय प्रतिनिधि के बयान को भारतीय हित से देखें, तो यह बयान बेहद सटीक मालूम पड़ता है। इस बयान में जहाँ एक तरफ़भारत ने हमास द्वारा जारी रॉकेट हमले का विरोध किया, वहीं इसने फिलिस्तीनी कारण का समर्थन करते हुए दो राष्ट्र की बात कही। भारत ने यह भी कहा कि दोनों देशों को आपसी बातचीत के ज़रिये इस मामले को सुलझाने चाहिए। भारतीय प्रतिनिधि के सम्पूर्ण बयान का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि यह बयान इजराइल की तरफ़कम और फिलिस्तीन की तरफ़ ज्यादा झुका हुआ था, जो भारतीय नज़रिये से सही भी है। हालाँकि भारत ने अपने बयान से इजराइल को भी नाराज़ नहीं किया है, बल्कि इसने अपने बयान से दोनों पक्षों को साधने को कोशिश की है।

क्योंकि भारत का बयान एक तरफ़ा नहीं है। जो भी मध्य-पूर्व की राजनीति अच्छे से समझते हैं, उन्हें भारत का बयान बहुत सधा हुआ मालूम पड़ेगा। व्हाट्स ऐप विश्वविद्यालय से ज्ञान प्राप्त कर रातोंरात विदेश नीति के जानकार बना देश का एक समूह भारत के बयान को इजराइल के ख़िलाफ़मान रहा है। ऐसे लोग उतावले होकर इजराइल के प्रधानमंत्री के ट्विटर अकाउंट पर जाकर यह भी लिख रहे हैं कि पूरा देश उनके साथ हैं। ऐसे लोगों को यह स्पष्ट समझना चाहिए कि विदेश नीति में कोई भी देश अपना और देशवासियों का हित सबसे पहले देखता है, जो बिल्कुल सही भी है। इसमें कोई शक नहीं कि भारत की इजराइल के साथ हाल के दिनों में घनिष्ठता बढ़ी है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऐतिहासिक इजराइल यात्रा और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की भारत यात्रा इसकी सबसे बड़ी गवाह हैं। वर्तमान में कोरोना वायरस के दूसरी लहर से बुरी तरह प्रभावित भारत को यह देश मेडिकल सहायता भी उपलब्ध करा रहा है। लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना है कि भारत के अरब देशों से भी अच्छे सम्बन्ध हैं। मध्य-पूर्व वह क्षेत्र है, जहाँ भारत की एक बड़ी आबादी को काम मिला हुआ है और वे वहाँ से बड़ी मात्रा में भारत में पैसे भेजते हैं और यहाँ की अर्थ-व्यवस्था को मज़बूत करते हैं। भारत का इन देशों के साथ आर्थिक कारोबार भी इजराइल की तुलना में कई गुनाज़्यादा है तथा भारत की पेट्रोल तथा डीजल जैसी ऊर्जा ज़रूरतों की भी पूर्ति इन्हीं देशों से होती है।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी अंतर्राष्ट्रीय प्रवास-2020 की रिपोर्ट के अनुसार, 1.8 करोड़ भारतीय दूसरे देशों में रहते हैं और यह संख्या दुनिया में किसी भी देश के प्रवासियों कि तुलना में सबसेज़्यादा है। मध्य पूर्व के केवल तीन देशों संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब तथा क़ुवैत में ही 70 लाख सेज़्यादा भारतीय रहते हैं। ओमान और क़तर में भी इनकी संख्या अच्छी ख़ासी है। अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में कोई भी देश अपनी विदेश नीति में अपने देश का हित सबसे पहले देखता है। ज़ाहिर है कि भारत भी अपनी विदेश नीति में भारतीय हितों को ध्यान में रखते हुए अरब देशों से सम्बन्ध बेहतर रखने की कोशिश करेगा।

ओआईसी का नज़रिया
भारत को यह भी अच्छे से पता है कि पाकिस्तान इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) का सदस्य देश है और इसे जब भी मौक़ा मिलता है, यह अक्सर ऐसा बयान देता है कि भारत में मुस्लिमों के साथ अत्याचार हो रहा है और इनके साथ दोयम दर्जे के नागरिकों जैसा व्यवहार किया जाता है। हाल के वर्षों में कई बार पाकिस्तान अपने निजी स्वार्थों के लिए इसके सदस्य देशों को भारत के ख़िलाफ़लामबंद करने की कोशिश करता रहा है और यह चाह रखता रहा है कि यह संगठन भारत पर ठोस बयान दें या कार्रवाई करें। लेकिन यह अलग बात है कि सऊदी अरब के दबदबे वाले इस संगठन ने पाकिस्तान के आरोपों को कभी भीज़्यादा महत्त्व नहीं दिया। हालाँकि भारत में दक्षिणपंथ से जुड़ा एक बड़ा समूह इजराइल का पक्ष करता दिख रहा है। ऐसे लोग इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के ट्विटर अकाउंट पर भी जाकर लिख रहे हैं कि भारत इजराइल के साथ है। वहीं इजराइल की भीषण कार्रवाई के ख़िलाफ़कई देशों में धरने देखने को मिले हैं।

भारत में भी अच्छी संख्या में लोग फिलिस्तीन के पक्ष में दिखे। हमें ऐतिहासिक सन्दर्भ यही बताते हैं कि इजराइल-फिलिस्तीन के मुद्दे पर भारतज़्यादातर फिलिस्तीनियों के ही पक्ष में रहा है और यह अलग-अलग मंचों से कई बार इजराइल द्वारा फिलिस्तीन की ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने के मामले में उसकी निंदा भी कर चुका है। इसके पीछे भारत की अपनी सोच है कि भारत पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर को वापस हासिल करना चाहता है। इसके लिए वह इजराइल के अवैध क़ब्ज़े की नीति को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है। भारत की नीति इस मामले में बेहद स्पष्ट है कि वह इजराइल के लिए अरब के महत्त्वपूर्ण देशों से अपना सम्बन्ध कभी ख़राब नहीं करना चाहता और यही नीति देशहित में भी है। अभी हाल ही में कुछ साल पहले जब इजराइल ने अमेरिकी दूतावास को तेल अवीव शहर से हटाकर यरुशलम में स्थानांतरित किया था, तो भारत ने अमेरिका के दबाव के बावजूद अपना रुख़ स्पष्ट कर दिया था कि वह इसके पक्ष में नहीं है।

ओआईसी का ज़िम्मेदार बनना वर्तमान समय की माँग
ओआईसी कहने को तो संयुक्त राष्ट्र संघ के बाद सदस्य देशों की संख्या के लिहाज़ से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा संगठन है। लेकिन इसके सदस्य देश ख़ुद के स्वार्थों से कभी ऊपर नहीं उठ सके। 57 देशों वाले इस संगठन को मुस्लिम दुनिया की सामूहिक आवाज़ माना जाता है; लेकिन सच्चाई यही है कि इसके सदस्य देशों के बीच अक्सर आपसी दबदबे को लेकर तनाव देखने को मिलता है। मध्य-पूर्व क्षेत्र में आपसी वर्चस्व के लिए सऊदी अरब और ईरान के बीच तनाव लम्बे समय से जारी है। अपनी स्थापना के समय से ही ओआईसी का प्रमुख लक्ष्य फिलिस्तीन को उसका वाजिब हक़ दिलाना था। लेकिन इस संगठन के सामने फिलिस्तीनियों की ज़मीन सिकुड़ती चली गयी और यह संगठन तमाशबीन बना रहा। इजराइल और यरुशलम के बँटवारे के बाद आज फिलिस्तीनी 48 फ़ीसदी ज़मीन से महज़ 12 फ़ीसदी ज़मीन पर सिमट गये हैं। इनके पास गाजा और वेस्ट बैंक के ही कुछ इलाक़े बचे हैं, बाक़ी इनके हिस्से के 36 फ़ीसदी ज़मीन पर इजराइलियों का क़ब्ज़ा है। वर्तमान में इजराइल इस क्षेत्र के 80 फ़ीसदी हिस्से पर क़ाबिज़ है, फिलिस्तीनी केवल 12 फ़ीसदी टुकड़ों पर सिमट गये है तथा बाक़ी के 8 फ़ीसदी हिस्सा यानी यरुशलम संयुक्त राष्ट्र संघ के नियंत्रण में है। स्मरण रहे कि यरुशलम इस्लाम, यहूदी तथा इसाई यानी तीनों धर्मों के लिए एक पवित्र स्थल है और विशेष जगह मानी जाती है। ऐसे में यह स्थान संयुक्त राष्ट्र संघ को अपने अधीन लेना पड़ा, ताकि यहाँ इसके लिए संघर्ष न हो।

मुस्लिम दुनिया में जो धनी और प्रभावाशाली देश है, उनके रिश्ते पश्चिमी दुनिया से बेहतर है। वे अपने विकास में काम आने वाले ज़रूरी तकनीकों के लिएज़्यादातर पश्चिमी देशों पर निर्भर है। इजराइल काज़्यादातर पश्चिमी दुनिया के प्रभावशाली देशों से न केवल बेहतर सम्बन्ध है, बल्कि इसके शुरुआती समय से ही वे इजराइल की मदद करते रहे हैं। ओआईसी के प्रमुख देशों को भी ये पता है कि वे इजराइल काज़्यादा कुछ बिगाड़ नहीं पाएँगे। इसलिए इजराइल और फिलिस्तीनियों के बीच संघर्ष में वे इजराइल की निंदा करके रस्म अदायगी कर देते हैं। तुर्की अभी भले ही इजराइल को लेकर काफ़ी विरोध कर रहा हो, लेकिन सच यही है कि इस देश का सन् 1949 से ही इजराइल से सम्बन्ध है।

सऊदी अरब वर्तमान में भले ही संयुक्त राष्ट्र संघ में इजराइल के हवाई हमलों को लेकर खुलकर विरोध करे। लेकिन इसे भी यह बात पता है कि इजराइल को अमेरिका और पश्चिमी देशों का भरपूर सपोर्ट है और ऐसे में सऊदी अरब के विरोध की एक सीमा है, जो वह कभी पार नहीं करेगा। ईरान की आलोचना से इजराइल को ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता। क्योंकि ईरान अपने हितों के लिए लम्बे समय से इजराइल का विरोध करता रहा है। मिस्र और जॉर्डन ने पहले ही इजराइल से शान्ति समझौता किया हुआ है। संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और मोरक्को पहले ही ‘अब्राहम समझौते’ के ज़रिये इजराइल को मान्यता दे चुके हैं। लेकिन इजराइल और फिलिस्तीन के बीच वर्तमान संघर्ष ने यह साबित कर दिया कि तमाम शान्ति समझौतों के बाद भी यह क्षेत्र अभी अशान्त ही रहने वाला है। संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद् में इजराइल के ख़िलाफ़लाये गये प्रस्ताव को अमेरिका ने वीटो करके यह स्पष्ट कर दिया है कि वह पूरी तरह इजराइल के पक्ष में है। हमें यह भी अच्छे से पता है कि पश्चिमी दुनिया अमेरिका के ही नेतृत्व मेंज़्यादातर फै़सले लेती है। अभी इजराइल और फिलिस्तीन के बीच जो संघर्ष विराम हुआ है, यह भी अमेरिका और मिस्र के सहयोग से हो पाया है; ओआईसी की वजह से नहीं।