आर्थिक सलाहकार परिषद फिर बनी आर्थिक सुझावों पर अब और ध्यान

यह फैसला तब लिया गया जब वित्तीय वर्ष 2017-18 की पहली तिमाही में विकास दर 5.7 फीसद पर ठहर गई। यह दर पिछले साल में सबसे कम है। देश में चालू खाते का घाटा बढ़ कर चार साल ऊँचा यानी 2017 की पहली तिमाही में पिछले साल की तुलना में 0.6 फीसद से बढ़ कर 2.4 फीसद कुल सकल उत्पाद की दर पर था। सरकार इस कोशिश में है कि किसी तरह अर्थव्यवस्था की गति तेज की जाए जिससे नौकरियों की तादाद बढ़े। क्योंकि केंद्र का वित्तीय घाटा वित्तीय वर्ष 2018 के बजट अनुमानों से पहले ही 92 फीसद पर पहुंच गया है।

ऐसा माना जा रहा है कि देबरॉय की टीम प्रधानमंत्री को अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने में विभिन्न नए इरादे दे सकती है। देबरॉय का प्रधानमंत्री से सीधा संपर्क होगा। नीति आयोग का सदस्य रहते हुए उन्होंने ही प्रधानमंत्री को भारतीय रेल में आमूलचूल बदलाव की सलाह दी थी। उनकी ही सलाह पर रेल के बजट को देश के आम बजट का हिस्सा बनाया गया था। यह उनकी ही सलाह थी कि वित्तीय वर्ष अप्रैल-मार्च की बजाए जनवरी-दिसंबर रखा जाए।

बेहतर समन्वय,सुशासन और चुस्ती के लिहाज से देबरॉय यह चाहते रहे हैं कि सरकारी विभागों की तादाद कम की जाए। लेकिन अब आर्थिक सलाहकार परिषद के गठन से आसार हैं कि हालात में सुधार हो। यह उम्मीद है कि आर्थिक सलाहकार परिषद विकास को बढ़ावा देने के लिए ढ़ांचागत सुधारों के लिए खर्च की गुणात्मकता में भी सुझाव देगी।