चिंताकारी चाय

हालांकि कुछ कंपनियों ने इस रिपोर्ट पर अपनी स्थिति साफ कर दी है. हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड ने एक प्रेस वक्तव्य जारी किया है जिसमें कहा गया है, ‘हमारे सभी चाय उत्पाद पूरी तरह से सुरक्षित हैं. लोग बिना किसी भय के अपने पसंदीदा पेय का इस्तेेमाल कर सकते हैं. हम फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआई) के मानकों का कड़ाई से पालन करते हैं… एचयूएल के पास किसी चाय बागान का मालिकाना हक नहीं है. हम चाय उगाते नहीं हैं. हम चाय दूसरे बागानों से नीलामी के माध्यम से खरीदते हैं.’ ग्रीनपीस के नतीजे बताते हैं कि एचयूएल के दो ब्रांडों लिप्टन और ब्रुक बॉन्ड में बड़ी संख्या में कीटनाशक मिले हैं.

एचयूएल की तर्ज पर ही टाटा ग्लोबल बेवरिजेस और गिरनार टी ने भी अपनी सफाई दी है. टाटा बेवरिजेस का कहना है, ‘टाटा ग्लोबल बेवरिजेस चाय खेती में इस्तेमाल होने वाले सुरक्षा उपायों (कीटनाशक) से उत्पन्न किसी भी समस्या को न्यूनतम रखने के लिए प्रतिबद्ध है… हमारा लक्ष्य है कि चाय उत्पादन और संरक्षण की प्रक्रिया में रसायनों का इस्तेमाल न्यूनतम रखा जाए.’ इन दोनों अगुआ कंपनियों के उलट गिरनार टी ने अपनी सफाई बेहद साफ शब्दों में दी है. कंपनी के शब्दों में ‘गिरनार चाय उत्पादन के क्षेत्र में नान पेस्टिसाइड मैनेजमेंट (एनपीएम) का समर्थन करने की घोषणा करती है. इससे कीटनाशकों को चाय उत्पादन की प्रक्रिया से हटाने में मदद मिलेगी.’

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एक स्थिति तो यह है कि देश के चाय बगानों में इस्तेमाल हो रहे ज्यादातर कीटनाशक अनावश्यक रूप से इस्तेमाल हो रहे हैं. दूसरा पक्ष यह है कि चाय कंपनियां तमाम ऐसे कीटनाशक भी इस्तेमाल कर रही हैं जिनका उपयोग सालों पहले देश में प्रतिबंधित किया जा चुका है. इनमें से कुछ तो दुनिया के सबसे जहरीले कीटनाशकों में शुमार होते हैं. यह और भी ज्यादा चिंता की बात है. उदाहरण के तौर पर डीडीटी जिसे भारत में कृषि क्षेत्र के लिहाज से 1989 में ही प्रतिबंधित किया जा चुका है, वह चाय बागानों में आज भी इस्तेमाल हो रहा है. यह घातक कीटनाशक 49 में से 33 नमूनों में पाया गया है. मोनोक्रोटोफॉस भी ऐसा ही एक कीटनाशक है जिसके चाय की खेती में इस्तेमाल की मनाही है. यह कीटनाशक विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा सर्वाधिक जहरीले कीटनाशकों की श्रेणी में रखा गया है. 2013 में जब बिहार के सारण में 23 स्कूली बच्चों की मौत मिड डे मील में मोनोक्रोटोफॉस की मिलावट से हुई थी तो फूड एवं एग्रीकल्चर आर्गनाइजेशन (एफएओ) ने ऐसे कीटनाशकों का इस्तेमाल धीरे-धीरे बंद करने की अपील की थी. ट्राइजोफॉस भी इसी श्रेणी का एक अन्य कीटनाशक है जो कुल पांच नमूनों में पाया गया है. एक नाम टेब्युफेनपाइराड का है. यह कीटनाशक भारत में रजिस्टर्ड ही नहीं है, लेकिन चाय के नमूनों में यह मौजूद है. एक और कीटनाशक एंडोसल्फान को तो उच्चतम न्यायालय ने 2011 में देश में बनने से ही प्रतिबंधित कर दिया था. पर कुछ बागान आज भी अवैध रूप से एंडोसल्फान का इस्तेमाल कर रहे हैं. जांच के आठ फीसदी नमूनों में एंडोसल्फान पाया गया है.

इन कीटनाशकों के इस्तेमाल का प्रभाव दो रूपों में सामने आता है. पहला तो इसके पर्यावरणीय प्रभाव जो बेहद घातक हैं और दूसरा मानव शरीर पर पड़नेवाला असर. पर्यावरणीय प्रभाव तो इसके कमोबेश वही हैं जो सामान्य खेती में इस्तेमाल हो रहे कीटनाशकों के होते हैं. मिट्टी, पानी और हवा तीनों ही इसकी चपेट में हैं. इस देश में चाय की पहुंच जितनी व्यापक है उसे देखते हुए मानव शरीर पर पड़ने वाले इसके असर को भी नजरअंदाज करना नामुमकिन है. मानव शरीर दो तरीकों से इसकी चपेट में आ रहा है. ग्रीनपीस के मुताबिक एक बड़ा हिस्सा तो वह है जो चाय पीता है. यह वह हिस्सा है जो कीटनाशक की थोड़ी मात्रा के संपर्क में आता है. इससे होने वाला असर लंबे समय में दिखता है. संयुक्त राष्ट्र की संस्था फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक लंबे समय तक इसका उपयोग करने वालों में पेट की तकलीफें, जननांगों में विकार, तंत्रिका संबंधी समस्याएं और कैंसर जनित दिक्कतें पैदा हो जाती हैं.

दूसरा हिस्सा उन लोगों का है जो चाय बगानों में काम करते हैं और सीधे-सीधे कीटनाशकों के संपर्क में रहते हैं. अलग-अलग समय पर चाय बागानों में काम करने वालों पर किए गए परीक्षण से पता चला है कि यहां के कामगार सांस, मुंह या त्वचा के माध्यम से बड़ी मात्रा में कीटनाशकों के संपर्क में आ रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र के एक आंकड़े के मुताबिक प्रतिवर्ष कीटनाशकों के इस्तेमाल से होने वाली मौतों में लगभग 20 हजार खेती से जुड़े लोगों की होती है. इनमें चाय बागान के कामगारों की भी एक बड़ी संख्या है.

चाय की पहुंच और उसकी लोकप्रियता का दायरा देखते हुए ग्रीनपीस के नतीजे बेहद चिंताजनक हैं. लेकिन इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि जिस सरकारी मशीनरी (टी बोर्ड ऑफ इंडिया) के ऊपर चाय कंपनियों की गतिविधियों पर नजर रखने की जिम्मेदारी है उसका रवैया इस रिपोर्ट के प्रति नकारात्मक दिख रहा है.

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