उदारता के आकांक्षी

सवाल है, मनमोहन सिंह इन सबके मूकदर्शक क्यों बने रहे? वे इन स्थितियों को संभाल क्यों नहीं पाए? जवाब है- क्योंकि मनमोहन सिंह मूलतः एक प्रशासक रहे जिन्हें सरकारी फाइलों को पढ़ना तो आता था, माहौल को पढ़ना और बदलना उनके बूते में नहीं था. सोनिया गांधी को दरअसल ऐसा ही आदमी चाहिए था जो उनकी या कांग्रेस की योजनाओं को मूर्त रूप दे सके. जब तक यह काम होता रहा, सरकार ठीक से चलती रही, लेकिन जहां दूरंदेशी के मोड़ आए, वहां मनमोहन बुरी तरह फिसलते दिखे. सोनिया गांधी और मनमोहन के बीच पहली बड़ी दरार ऐटमी करार के वक्त दिखाई पड़ती है जब लेफ्ट के विरोध के बीच यूपीए एक तरह से इस करार से पीछे हटने का मन बना चुका था, लेकिन मनमोहन ने इसे बिल्कुल निजी जिद का मसला बना लिया. वाम के अलग होने, समाजवादी पार्टी के समर्थन देने और संसद में नोट उछाले जाने की शर्मनाक कहानी इसी के बाद शुरू होती है जिसके कुछ दाग सीधे-सीधे मनमोहन सिंह तक भी पहुंचते हैं.

दरअसल पहले दौर में मनमोहन सिंह की कामयाबी या स्वीकृति एक ऐसे व्यक्ति को बाजार की तरफ से मिली स्वीकृति थी जो बिल्कुल पश्चिम की पढ़ाई किताबों के हिसाब से सोचता और चलता था. मनमोहन सिंह जैसा ही कोई प्रधानमंत्री हो सकता था जो 2005 में ऑक्सफोर्ड जाकर बोल आए कि भारत को इंग्लैंड ने ही आधुनिकता और नए जमाने की तालीम दी और 2008 में अमेरिका जाकर जॉर्ज बुश को बता आए कि भारतीय उससे कितना प्यार करते हैं. ऐसा ही प्रधानमंत्री शर्म अल शेख में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के साथ ऐसा साझा वक्तव्य जारी कर सकता था जिसके बचाव में कांग्रेस तक नहीं आई.

बहरहाल, मनमोहन सिंह की इन विफलताओं या सीमाओं के बावजूद 10 साल की यूपीए सरकार ऐसी निकम्मी या बेमानी सरकार नहीं थी जो बताई जा रही है. इन दस सालों की औसत विकास दर 8.5 फीसदी के आसपास रही जो शायद पहले कभी नहीं रही. इन्हीं वर्षों में सूचना, रोजगार, रोटी और शिक्षा के हक के साथ दूसरे मानवाधिकारों पर ढेर सारे फैसले हुए जिनकी वजह से सरकार भी पारदर्शी हुई और जनता भी अधिकारसंपन्न. बेशक, इस दौर में महंगाई बढ़ी, लेकिन साथ-साथ कमाई भी बढ़ी.

सवाल है, फिर मनमोहन विफल कहां रहे? उस हिंदुस्तान को समझने में जिसे पहले अटल-आडवाणी भी नहीं समझ पाए थे. 2004 में फील गुड और शाइनिंग इंडिया के नारों के बावजूद अगर एनडीए हारा तो इसलिए कि उसने उस गरीब हिंदुस्तान की परवाह नहीं की जो सबसे ज्यादा वोट देता है. मनमोहन सिंह आंकड़े पेश करते हैं- और शायद वे ठीक भी हों- कि उनके दौर में गरीबी बड़े पैमाने पर कम हुई है, लेकिन ज्यादा बड़ी सच्चाई यह है कि इस दौर में गरीबों के साथ छल भी बहुत हुए. उनकी जमीन छीनी गई, उनके स्कूल-अस्पताल छीने गए, शिक्षा और सेहत का बजट वैसे नहीं बढ़ा जैसे बढ़ना चाहिए था. इस दौर में बड़े हुए नक्सलवाद को मनमोहन देश का सबसे बड़ा खतरा भर बताते रहे, यह नहीं समझ पाए कि यह नक्सल गलियारा वैसे-वैसे बड़ा हो रहा है जैसे-जैसे विशेष आर्थिक क्षेत्रों की सरहदें बड़ी हो रही हैं.

लेकिन मनमोहन को सिर्फ इसकी सजा नहीं मिली. उन्हें उस कॉरपोरेट इंडिया का एजेंडा आगे न बढ़ा पाने की भी सजा मिली जिसने एक दौर में उन पर बहुत भरोसा किया. यह कारपोरेट इंडिया आज नरेंद्र मोदी के पीछे खड़ा है. वही मनमोहन सिंह का मूल्यांकन कर और करवा रहा है. विकास के नए मिथक इसी कारपोरेट इंडिया में गढ़े जा रहे हैं- शायद यह हिंदुस्तान के गरीबों पर नए सिरे से भारी गुजरे.

बहरहाल, मनमोहन संतोष कर सकते हैं कि इत्तिफाक ने उन्हें जो जिम्मेदारी सौंपी, उसे उन्होंने पूरा किया. वे नेहरू और इंदिरा के बाद सबसे ज्यादा समय तक प्रधानमंत्री रहे. वे राजनीति के एक ऐसे दौर में प्रधानमंत्री रहे जब क्षेत्रीय महत्त्वाकांक्षाएं और ग्लोबल हसरतें साथ-साथ चल भी रही थीं और टकरा भी रही थीं- वे एक तरह से मंडल-कमंडल के बाद की भूमंडलीकृत राजनीति के पहले प्रधानमंत्री रहे. वे जब तक दोनों के बीच संतुलन साध पाए, तब तक चले, जब यह संतुलन बिगड़ा तो गिर पड़े. अब नया दौर राष्ट्रवादी सपनों और ग्लोबल हसरतों की जुगलबंदी का है. इस जुगलबंदी का  हश्र  वह वास्तविक परिप्रेक्ष्य देगा जिसमें हम मनमोहन सिंह का कायदे से मूल्यांकन कर सकेंगे. तब तक मनमोहन सिंह को यह उम्मीद करने का हक है कि इतिहास उनके साथ नरमी बरतेगा.

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