मांझी के बोलः महत्वाकांक्षा या रणनीति?

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जीतन राम मांझी के बयानों को समझने से पहले जदयू की राजनीतिक गणित को समझना होगा. भाजपा से अलगाव के बाद जदयू की राजनीति बहुत साफ है. भाजपा पर बिहार में सवर्णों की पार्टी होने का ठप्पा लग चुका है. एक तथ्य यह भी है कि नीतीश कुमार का जो कोईरी-कुरमी का मजबूत गठजोड़ था, उसमें भाजपा ने उपेंद्र कुशवाहा के जरिए सेंध लगा दी है इसलिए कोईरी अब नीतीश के साथ उस तरह से नहीं रह गये हैं. वैश्य जातियां परंपरागत तौर पर भाजपा के साथ ही रहती आई हैं. पिछले लोकसभा में जिस तरह से महादलितों और अतिपिछड़ों ने भी नरेंद्र मोदी की ओर रूझान दिखाया, वह भी नीतीश के लिए खतरे की घंटी है. यादवों के युवा मतदाता भी भाजपा की ओर गए. ऐसी हालात में लालू से मेल-मिलाप के बाद नीतीश कुमार को बिहार में अपनी राजनीति बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि वे कुछ खास समूहों को अपने साथ मजबूती से जोड़ें, तभी नवंबर 2015 में वे भाजपा को पछाड़ सकेंगे और लोकसभा चुनाव में अपनी खोई हुई साख को बहाल कर सकेंगे.

फिलहाल लालू प्रसाद यादव से मेल के बाद यादवों का एक बड़ा समूह जदयू-राजद गठबंधन के पास है. मुस्लिम मतदाता स्वाभाविक तौर पर इस गठबंधन के पाले में रहेंगे, क्योंकि बिहार में कांग्रेस खस्ताहाली में पहुंच चुकी पार्टी है. नीतीश कुमार जिस जाति से आते हैं यानी कुरमी, वह भी नीतीश कुमार के साथ स्वाभाविक तौर पर रहेगा. इस तरह यादवों का करीब 14 प्रतिशत, कुरमी का करीब तीन प्रतिशत, मुस्लिमों का करीब 16 प्रतिशत एक मजबूत सियासी समीकरण बनाता है. यह ऐसा ब्लॉक है जिसमें भाजपा के लिए सेंधमारी आसान नहीं है. लेकिन यह समीकरण मजबूत होते हुए भी इतना आश्वस्तकारी नहीं है कि भाजपा के विजयी अभियान को रोक सके. इसके लिए नीतीश कुमार को खुद के द्वारा सृजित अतिपिछड़ा समूह और महादलितों को मजबूती से अपने साथ जोड़ना होगा. ये दोनों समूह मिलकर बिहार में एक बड़े मतदाता समूह का निर्माण करते हैं और मतदान भी जमकर करते हैं. अतिपिछड़ा एक राजनीतिक समूह के रूप में अभी ठीक से बन नहीं सका है, क्योंकि उसके किसी सर्वमान्य नेता का उभार बिहार में अभी तक नहीं हो सका है. इसके अलावा इसमें अलग-अलग तमाम जातियों का मिश्रण भी इसके एक समूह बन जाने की राह का रोड़ा है. जबकि महादलितों में मांझी को मुख्यमंत्री बनाये जाने के बाद एक ऐसा नेता मिला है, जो पद की वजह से ही सही, पूरे राज्य में अपील रखता है और जब वे अपनी बात रखते हैं तो पूरे बिहार में बातें जाती हंै.

राजनीतिक विश्लेषक जिस दिशा में जा रहे हैं, बिहार के गांव-जवार मांझी के बयानों के बाद उसकी दूसरी दिशा में बढ़ रहे हैं. वे जितनी बार सवर्णों के खिलाफ या दलितों-महादलितों के पक्ष में बयान दे रहे हैं, उससे एक दूसरे किस्म का माहौल बन रहा है. जमीनी स्तर पर सवर्ण मांझी की खिल्ली उड़ा रहे हैं, उनके लिए अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहे हैं और इसके परिणामस्वरूप महादलित और दलित खामोशी से गोलबंद हो रहे हैं. इसका फायदा जीतन राम मांझी को मिल रहा है.

वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक मणिकांत ठाकुर कहते हैं, ‘मांझी के मन की बातों को दो-तीन तरीके से समझना होगा. एक तो जब वे मुख्यमंत्री बने तो उनको अधिकारी तवज्जो ही नहीं देते थे, वे सीधे नीतीश कुमार से ही संचालित होते थे, इसलिए मांझी ने अपनी उपस्थिति और ताकत का अहसास कराने के लिए इस तरह के बयानों का रास्ता चुना. दूसरा यह कि मांझी जिस समुदाय से आते हैं, वह समुदाय सहज होता है, इसलिए वे सहजता में ऐसे बयान दे देते हैं. तीसरा, वे जातीय राजनीति के इस दौर में खुद की पहचान को भी मजबूत करना चाहते हैं.’ इसके अलावा जिस तरह से वे लगातार बयान दे रहे हैं और उनके बयान पर भूचाल मचने के बावजूद जिस तरह से लालू प्रसाद या नीतीश कुमार रहस्यमय चुप्पी साधे हुए हैं, उससे साफ लगता है कि यह एक रणनीति का हिस्सा है.

अंजाम क्या होगा, यह भविष्य की बातें हैं. भाजपा इसकी क्या काट निकालेगी, यह भी देखा जाना बाकी है. मांझी, नीतीश कुमार और लालू प्रसाद के साथ बने रहकर भविष्य में नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने के लिए अपनी उम्मीदों की कुरबानी आसानी से दे देंगे या नहीं, इस पर भी अभी कोई राय बनाना जल्दबाजी होगी.

और अंत में मांझी को समझने के लिए उनके राजनीतिक इतिहास को भी समझना जरूरी है. मांझी पिछले तीन दशक से बिहार के सक्रिय नेता हैं. कांग्रेस, राजद और जदयू के साथ रह चुके हैं, मंत्री भी रह चुके हैं. जगन्नाथ मिश्र जैसे नेता के अनुयायी माने जाते हैं और लालू के साथ रहने का लंबा अनुभव रहा है. नीतीश कुमार के भरोसेमंद भी रहे, इसीलिए उन्हें मुख्यमंत्री भी बनाया गया. मांझी अपनी राजनीति करना जानते हैं. वे जानते हैं कि लालू प्रसाद कैसे बयानों के जरिये राजनीति को साधकर 15 सालों तक बिहार में राजनीतिक फसल काटते रहे हैं. और नीतीश कुमार से वे यह भी जानते हैं कि कैसे जातियों का बंटवारा कर अपने राजनीतिक आधार का विस्तार किया जाता है. संक्षेप में मांझी न तो नौसिखुवा नेता हैं न ही नासमझ.

1 COMMENT

  1. सत्ता में आज दलित है |तमाम सरकारें दलितों का उद्दार चाहती है |आज एक दलित को भग्यवश सत्ता हाथ लगी है तो किसी को दर्द क्यों हो रहा है |यदि ये व्यक्ति अपने वर्ग के लोगों को मतदान केंद्र तक पहुचने का कर करता है तो किसी की कष्ट क्यों है ?नितीश जिस जूतें से बिहार के लोगो को हाक रहे थे वही जूता उनके ओर क्यों नहीं दौड़े ?महागठबंधन सकल ले उसके पहले ही उसका महापतन भी तय हो गया है इसे गर्भ में ही सर्प देश गया है |और यदि कुछ और कहें तो सत्ता की बागडोर अब कुछ नए समीकरण से ही बनेंगे बिहार में |

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