गति की अति!

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कानून के जानकारों ने कानून सचिव के समर्थन और सोमनाथ की अज्ञानता पर जमकर भड़ास निकाली. जैसे-तैसे यह मामला निपटा. लेकिन इसके निपटते ही भारती के पिटारे से एक नया विवाद निकल पड़ा. साल 2013 के अगस्त महीने में सीबीआई के स्पेशल जज ने एक मामले में सुनवाई के दौरान सबूतों से छेड़छाड़ करने को लेकर भारती को फटकार लगाई थी. जैसे ही यह मामला मीडिया की नजरों में आया भाजपा समेत तमाम विरोधियों ने इसे हाथों हाथ लपक लिया. उनकी पार्टी इस विवाद को सुलझाने की कोशिशों में लगी हुई थी. ऐसे कठिन समय में भारती ने विवादों की हैट्रिक लगाते हुए मामले को एक तरह से क्लाइमैक्स पर पहुंचा दिया. घटना सोमनाथ के विधानसभा क्षेत्र में आने वाले खिड़की एक्सटेंशन से जुड़ी थी.

इस विवाद को लेकर सोमनाथ का कहना यह था कि पिछले कई महीनों से खिड़की एक्सेंटशन के लोग वहां रह रहे अफ्रीकी नागरिकों की हरकतों से परेशान थे. क्षेत्रवासियों का कहना था कि इन विदेशी नागरिकों में से कई ऐसे हैं जो यहां ड्रग्स और सेक्स रैकेट चलाते हैं. इसकी शिकायत उन्होंने कई बार स्थानीय पुलिस थाने से लेकर पुलिस कमिश्नर तक से की थी, लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. 15 जनवरी की रात को खिड़की निवासियों ने भारती से एक शिकायत की कि एक घर में ड्रग्स और जिस्मफरोशी से जुडे लोग मौजूद हैं. उन्हें पुलिस के हाथों गिरफ्तार कराया जाना चाहिए. भारती के मुताबिक वे मुहल्लेवालों और अपने समर्थकों के साथ चिन्हित घर की तरफ चल पड़े. रास्ते में उन्होंने पुलिस को फोन किया तथा वहां रास्ते में मौजूद एक पीसीआर वैन को भी अपने साथ ले गए. उस घर के सामने पहुंचकर पुलिस के सामने ही भारती के समर्थकों ने एक व्यक्ति को फर्जी कस्टमर बनाकर उस घर में भेजा जहां जिस्मफरोशी करने वालों के होने की बात कही गई थी. वापस आकर उसने बताया कि हां, भीतर सेक्स रैकेट से जुड़े लोग हैं जो उससे पैसे की मांग कर रहे हैं. भारती का कहना है कि यह पूरी बात पुलिस को बताई गई और उनसे उस घर पर छापा मारकर उन लोगों को गिरफ्तार करने को कहा गया. लेकिन पुलिस ने किसी भी तरह की कार्रवाई करने से इंकार कर दिया. पुलिस का कहना था कि वह बिना वारंट के न तो उस घर को घेर सकती है और न ही किसी को गिरफ्तार कर सकती है. सोमनाथ के मुताबिक पुलिस के सामने ही ड्रग्स और देह व्यापार का प्रमाण मौजूद था लेकिन पुलिसवाले जानबूझकर कोई कार्रवाई नहीं कर रहे थे. थोड़ी देर बाद पुलिस वहां से निकल गई. इस घटना से जुड़ा एक वीडियो भी लोगों ने देखा जिसमें भारती पुलिस के एक अधिकारी को कार्रवाई करने के लिए कह रहे थे लेकिन वह उन्हें उनकी सीमा में रहने की नसीहत देता रहा.

भारती पर ये आरोप लगा कि सोमनाथ और उनके समर्थकों ने महिलाओं के साथ आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया. यह भी कि उन्होंने एक महिला को शौचालय तक नहीं जाने दिया और उसे सबके सामने पेशाब करने पर मजबूर किया. महिलाओं ने आरोप लगाया है कि मंत्री और उनके साथ मौजूद लोगों ने न केवल उनके साथियों के साथ मारपीट की बल्कि उन्हें घंटों गाड़ी में बंधक बनाए रखा. युगांडा की दो लड़कियों ने उनका जबरन मेडिकल करवाने और उन्हें प्रताड़ित करने की लिखित में शिकायत की. इस घटना ने दिल्ली पुलिस और पखवाड़े भर पहले ही सत्ता में आई आम आदमी पार्टी के बीच एक बड़ी लड़ाई का रास्ता तैयार कर दिया.

कुछ इसी तरह का मामला दिल्ली के सागरपुर इलाके में भी सामने आया. महिला एवं बाल विकास मंत्री राखी बिडलान का आरोप था कि एक दहेज पीड़िता को ससुराल वालों ने जलाकर मार डाला लेकिन पुलिस आरोपियों को गिरफ्तार करने की बजाय उन्हें बचाने का काम कर रही है. राखी का आरोप था कि वे उस महिला जिसे ससुराल वाले दहेज को लेकर बहुत पहले से प्रताड़ित कर रहे थे, की फरियाद लेकर कई बार पुलिस अधिकारियों से मिल चुकी थीं. लेकिन पुलिस ने ससुराल वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की और अंततः ससुराल वालों ने पीड़िता को जलाकर मार डाला.

पार्टी अपनी लगातार हो रही छीछालेदर से न सिर्फ त्रस्त थी बल्कि उसे इस बात का भी अहसास हो रहा था कि अगर ऐसे ही पुलिस वाले उनके मंत्रियों को अपमानित करेंगे तो वे किस मुंह और मनोबल के साथ काम करेंगे. जाहिर सी बात है पार्टी के भीतर इस पर राय बनने लगी कि कुछ करना जरूरी है. इसी बीच एक विदेशी महिला के साथ बलात्कार का मामला भी सामने आया. उसके साथ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास दिनदहाड़े सामूहिक बलात्कार हुआ.

आप ने तीनों विवादों को एक साथ जोड़ते हुए हमलावर मुद्रा अख्तियार कर ली. पार्टी की तरफ से कहा जाने लगा कि जब दिल्ली पुलिस का एसएचओ मंत्री की बात नहीं सुनता तो वह आम आदमी के साथ कैसा बर्ताव करता होगा. आप ने दिल्ली पुलिस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. पार्टी को वह सूत्र मिल गया था जिसके जरिए वह अब तक लगातार हो रही फजीहत से बचने और हमलावर होने का खतरा उठा सकती थी. आप ने तीनों मामलों से जुड़े कुल पांच पुलिस अधिकारियों को सस्पेंड करने या ट्रांसफर करने की मांग रखी. दिल्ली पुलिस को राज्य सरकार के अधीन लाने की बात पार्टी पहले ही पार्टी अपने चुनावी घोषणापत्र में कर चुकी थी. पार्टी को यह मुद्दा तो उठाना ही था लेकिन यह मौका इतना जल्दी आ जाएगा इसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी. पार्टी ने अपने अपमान को दिल्ली की आम जनता के अपमान से  जोड़ दिया.

पांच पुलिस वालों को सस्पेंड कराने का महाअभियान शुरु हो गया. पहले पार्टी नेता इसे लेकर दिल्ली के पुलिस कमिश्नर के पास गए. कमिश्नर ने जिम्मेदार पुलिस वालों पर जांच रिपोर्ट आने से पहले कार्रवाई करने से इंकार कर दिया. पार्टी नेता उसके बाद गृहमंत्री से जाकर मिले. वहां भी उन्हें निराशा हाथ लगी. दोनों जगहों से ना में जवाब मिलने के बाद अरविंद केजरीवाल भड़क गए. अब वे खुद को पहले से ज्यादा अपमानित महसूस कर रहे थे. मामला अब न्याय-अन्याय से ज्यादा आत्मसम्मान और अहं का बन गया था. ऐसी हालत में पार्टी ने अपने सबसे आजमाए हुए नुस्खे पर अमल किया.

आप के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘पुलिस व्यव्स्था को दुरुस्त करने से ज्यादा मामला आत्मसम्मान का था. लोग हमें देख रहे थे. कार्यकर्ता हमें देख रहे थे. वे देख रहे थे कि हम पुलिस के सामने कितने निरीह और लाचार हैं. कोई हमारी नहीं सुन रहा और एक सामान्य सा पुलिसकर्मी हमारे मंत्री को धमका रहा था. अगर मुख्यमंत्री तीन एचएचओ का ट्रांसफर नहीं करा सकता तो फिर ऐसे मुख्यमंत्री की हैसियत क्या रहेगी. आप बताइए ऐसी सरकार को कौन गंभीरता से लेगा?  आप ने इस सोच की रोशनी में अनशन को आखिरी विकल्प माना.’

हालांकि रेल भवन के सामने अरविंद और उनकी सरकार के धरने को लेकर एक वर्ग  मानता है कि अरविंद को अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए औपचारिक तरीके से अपनी बात रखनी चाहिए थी. पार्टी के कई नेता भी इस राय से सहमत थे लेकिन वे साथ में परिस्थिति का हवाला भी देते हैं. उनका मानना है कि अगर सामान्य परिस्थिति होती तो शायद उन्हीं औपचारिक तरीकों का प्रयोग किया जाता जिनकी बात आलोचक कर रहे हैं. लेकिन चूंकि मामला सरकार के अपमान और उसके इकबाल से जुड़ा था इसलिए मजबूरन पार्टी को आक्रामक होना पड़ा. राजनीतिक विश्लेषक पुष्पेश पंत भी इस विचार से समहत दिखते हैं. वे कहते हैं, ‘यह बेहद शर्मनाक है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री को एक एसएचओ अपमानित करे. मुझे यह बात बहुत अजीब लगती है जब लोग कहते हैं कि सरकार चलाने का यह कोई तरीका नहीं है. क्या सरकार चलाने का तरीका वो है जैसे लालू ने बिहार में सरकार चलाई या अब मुलायम यूपी और ममता बंगाल में चला रही हैं?’

पार्टी में मतभेद
सरकार बनने के बाद से ही एक तरफ जहां पार्टी और सरकार अलग-अलग विवादों, समस्याओं और चुनौतियों से जूझ रहे हैं वहीं पार्टी नेताओं में आपसी विवाद और मतभिन्नता भी एक बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है. कुमार विश्वास और मल्लिका साराभाई के बीच का विवाद हो या फिर पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे विनोद कुमार बिन्नी के पार्टी नेतृत्व पर उठाए गए सवाल,  जबसे पार्टी सत्ता में आई है तबसे इसकी अनुशासन की डोर लगातार कमजोर होती दिखाई दे रही है. जानकार लोग इसे सत्ता में आने का स्वाभाविक दोष मान रहे हैं. ऐसे में स्वाभाविक है कि कुछ लोग नेतृत्व से नाराज होते भी दिखाई दें.

दिल्ली में ऐतिहासिक प्रदर्शन के बाद से ही पार्टी से जुड़ने को बेताब लोगों की लाइन लगी हुई है. एक तरफ जेएनयू में प्रोफेसर और पिछले 40 सालों से वामपंथी संगठन सीपीआई के सदस्य रहे कमल मित्र चिनॉय आप ज्वाइन कर रहे हैं तो वहीं खुले मार्केट के पैरोकार और देश में सस्ती विमान सेवा मुहैया कराने वाले एयर डक्कन के संस्थापक कैप्टन गोपीनाथ भी पार्टी की नाव पर सवार हो गए हैं. इनके साथ ही देश की बड़ी आईटी कंपनी इंफोफिस के बोर्ड मेंबर रहे बालाकृष्णन, बैंकर और रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड (आरबीएस) की पूर्व सीईओ और अध्यक्ष मीरा सान्याल, पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पोते आदर्श शास्त्री और लेखिका एवं आंदोलन के समय से ही टीम केजरीवाल की आलोचक रही अरुंधति रॉय की मां ने भी आप का दामन थाम लिया है.

यानी हर तरह के लोग पिछले एक महीने में पार्टी से जुड़े हैं. कई जानकारों की मानें तो यह स्वाभाविक है कि जितनी विविधता वाले लोग पार्टी में शामिल होंगे उतनी ही मतभिन्नता भी दिखाई देगी. इसका नमूना तब दिखा जब  केजरीवाल ने खुदरा बाजार में एफडीआई का विरोध किया तो कैप्टन गोपीनाथ ने इसे गलत बताया. ऐसे में यह संभावना प्रबल है कि आने वाले समय में पार्टी के भीतर खींचतान और बढ़ेगी. एक साक्षात्कार में इस सवाल का जवाब देते हुए केजरीवाल कहते हैं, ‘बिलकुल बढ़ेगी. जब समाज में विविधता है तो पार्टी में भी होगी. यह पार्टी शिवजी की बारात की तरह है. इसमें आपको हर तरह के लोग दिखाई देंगे.’

बड़ी संख्या में पार्टी से जुड़ रहे लोगों के कारण जहां एक तरफ पार्टी का विस्तार हो रहा है तो वहीं कुछ नई चिंताएं भी देखने को मिल रही हैं. तहलका ने इस दौरान पार्टी के कई पुराने  कार्यकर्ताओं से बात की. आंदोलन के शुरुआती दौर से ही साथ रहे कुछ कार्यकर्ताओं में अपनी पार्टी के प्रति कुछ नाराजगी दिखाई देती है.

सूरजभान आरके पुरम में पार्टी के एक कार्यकर्ता हैं. पार्टी बनने के बाद से ही वे अपनी विधानसभा में सक्रिय थे, लेकिन अब वे कुछ मायूस हैं. कहते हैं, ‘अब शायद पार्टी को हमारी जरूरत नहीं रही. दिल्ली का चुनाव जीतने के बाद बड़ी संख्या में नए लोग पार्टी से जुड़े हैं. वरिष्ठ नेता नए लोगों को ही ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं. हम तो नींव के पत्थरों जैसे चुपचाप पार्टी को मजबूत करने के लिए जमीन में धंस गए.’ आरके पुरम से चुनाव लड़ी शाजिया इल्मी पर आरोप लगाते हुए वे कहते हैं, ‘मैडम को जिताने के लिए हम लोगों ने दिन-रात एक कर दिया. दुर्भाग्य से वे 326 वोटों से हार गई. बस फिर क्या था. वे अपनी हार का ठीकरा हमारे ही सर फोड़ रही हैं. हम लोगों को पार्टी की हर गतिविधि से दूर रखने की कोशिश की जा रही है. मेरे जैसे सैकड़ों लोग इस विधानसभा में हैं.’ कुछ कार्यकर्ता ऐसे भी हैं जो आरोप लगाते हैं कि पूरी पार्टी चार दोस्तों अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और कुमार विश्वास के हाथों में सिमट गई है. यही चारों सबकुछ तय कर रहे हैं.

लोकसभा चुनाव और हड़बड़ी
दिल्ली विधानसभा के उत्साहजनक नतीजों के बाद से ही आप राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए बेताब है. पार्टी के नेताओं ने कई बार ऐलान किया कि पार्टी आगामी लोकसभा चुनाव पूरे देश में  लड़ेगी. पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक उनकी मंशा लगभग 300 सीटों पर किस्मत आजमाने की है. पार्टी के इस कदम को सराहने वाले और इसे जरुरी बताने वाले लोगों की कमी नहीं है. ऐसे लोग आम आदमी पार्टी को बदलाव का विकल्प मानते हैं. दिल्ली की जनता ने यह साबित करके दिखाया है. पार्टी नेता योगेंद्र यादव भी कहते हैं, ‘पूरा देश बदलाव चाहता है. ऐसे में हम पीछे नहीं हट सकते.’

लेकिन पार्टी की इस मंशा के आलोचक भी कम नहीं हैं. आलोचकों की नजर में आप बहुत हड़बड़ी में है. ऐसे लोग आप को ‘आधी छोड़ पूरी को धावे, आधी मिले न पूरी पावे’ वाली कहावत के चश्मे से देख रहे हैं जो कि कुछ हद तक सही भी है. पार्टी को पहले दिल्ली में खुद को साबित करने पर ध्यान लगाना चाहिए था क्योंकि उन्होंने पहाड़ सरीखे जो वायदे किए हैं उन्हें पूरा करना असंभव तो नहीं लेकिन ऐसा करने के लिए कड़ी मेहनत और समय दोनों की दरकार होगी. दिल्ली में बेहतर काम करके पार्टी एक उदाहरण प्रस्तुत कर सकती थी. लेकिन ऐसा न करके पार्टी जो अभी देश के ज्यादातर हिस्सों में ठीक से अपने पैरों पर खड़ी भी नहीं हो सकी है, पूरे देश में सत्तासीन होने का सपना देख रही है. सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटी के आदित्य निगम कहते हैं, ‘पार्टी क्षमता से ज्यादा तेज गति से दौड़ रही है. उसने खुद के लिए असंभव लक्ष्य और समयसीमा तय कर रखी है.’

फिलहाल आम आदमी पार्टी लोकसभा चुनावों में चमत्कार करने को लेकर उत्साहित है. देश भर से लोगों को जोड़ने के लिए वह मुफ्त सदस्यता का एक बड़ा अभियान ‘मैं भी आम आदमी’ चला रही है. इसके तहत उसने 26 जनवरी तक एक करोड़ लोगों को पार्टी से जोड़ने का लक्ष्य तय किया था. पार्टी नेता गोपाल राय के मुताबिक पार्टी अपने इस लक्ष्य में सफल हुई है और अब तक उससे कुल एक करोड़ पांच लाख लोग जुड़ चुके हैं. हालांकि पार्टी की इस मेंबरशिप ड्राइव की प्रामाणिकता पर कुछ सवाल भी खड़े हुए हैं. पार्टी से जुड़ने वाले नामों में बराक ओबामा, जवाहर लाल नेहरु, मार्क जुकरबर्ग, अटल बिहारी बाजपेयी, इंदिरा गांधी, नरेंद्र मोदी से लेकर राहुल गांधी तक के नाम शामिल हैं. इस हिसाब से अगर देखें तो यह पूरा अभियान ही संदेह के घेरे में आता है.

ये सारी घटनाएं सिर्फ पिछले एक महीने के दौरान घटी हैं. आप के एक महीने के कार्यकाल का हर दिन किसी न किसी विवाद के नाम रहा है. इसने पार्टी की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया है. पार्टी के कुछ नेता भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि पिछले एक महीने में पार्टी नेताओं और सरकार से उपजे विवादों ने लोगों के बीच में पार्टी की मजबूत स्थिति को चोट पहुंचाई है. हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि जनता का विश्वास पूरी तरह से टूट चुका है. पार्टी को लेकर लोगों के मन में उठ रहे सवालों का प्रत्यक्ष उदाहरण पार्टी को मिल रहे ऑनलाइन चंदे में तेजी से आई गिरावट भी है. मसलन दो जनवरी को जहां पार्टी को 50 लाख रु का चंदा मिला था वहीं 16 जनवरी तक आते-आते यह रकम गिरकर एक लाख 60 हजार पर सिमट गई. पार्टी के नेता भी डोनेशन में आई गिरावट को इस दौरान पैदा हुए विवादों से जोड़कर देखते हैं.

जो काम किया
विवादों से भरे-पूरे पिछले एक महीने के कार्यकाल में आप के नाम कई उपलब्धियां भी दर्ज हैं. इस दौरान सरकार ने वीआईपी कल्चर खत्म करने, बिजली के रेट कम करने, 700 लीटर प्रतिदिन मुफ्त पानी देने, बिजली कंपनियों का कैग ऑडिट करने, रैन बसेरों का विस्तार करने जैसे कई जनहित के निर्णय लिए हैं.  कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने वाले केजरीवाल लगातार यह आलोचना झेल रहे हैं कि वे जानबूझकर कांग्रेस शासन के दौरान हुई गड़बड़ियों की जांच नहीं करा रहे हैं. हालांकि केजरीवाल ने खुद ही कॉमनवेल्थ गेम्स तथा दिल्ली जल बोर्ड से जुड़े मामलों पर कार्रवाई करने का इशारा किया. एक साक्षात्कार में अरविंद कहते हैं, ‘मैं दोनों मामलों की फाइल खुद ही देख रहा हूं. जल्द ही कांग्रेस को इस बात का अफसोस होगा कि उसने क्यों हमारा समर्थन किया. इन मामलों में नेता से लेकर अधिकारी किसी को नहीं छोड़ा जाएगा.’ आदित्य निगम कहते हैं, ‘यह पहली बार हो रहा है कि किसी पार्टी ने आकर यथास्थिति को तोड़ने की कोशिश की है.’

यह भी एक तथ्य है कि पार्टी और सरकार से जुड़े विवादों के शोर में सरकार की उपलब्धियां कहीं खो सी गई लगती हैं. मीडिया से बातचीत में केजरीवाल अपनी पीड़ा जाहिर करते हैं, ‘पिछले 20 दिनों में हमने जितना काम किया है वह ऐतिहासिक है. लेकिन फिर भी हमारी आलोचना हो रही है. दिल्ली के साथ ही बाकी चार राज्यों में बनी सरकारों से कोई नहीं पूछता कि उन्होंने पिछले 20 दिनों क्या किया है.’ अरविंद कहते हैं कि ऐसा पहली बार हो रहा है जब देश के लोगों ने चुनावी घोषणापत्र को गंभीरता से लिया है. यह हमारी कामयाबी है.

आलोचनाओं के साथ आप का चोली दामन का साथ रहा है. आंदोलन के समय में उनकी इस बात के लिए आलोचना होती थी कि वे सड़क पर कानून बनाना चाहते हैं. तब दूसरी राजनीतिक पार्टियों का कहना था कि कानून बनाना है तो वे राजनीति में क्यों नहीं आते. केजरीवाला राजनीति में आए तो नेताओं का एक वर्ग उनका यह कहकर आलोचना करने लगा कि ये लोग सत्ता के भूखे है, इनकी राजनीतिक महात्वाकांक्षाएं हैं. चुनाव में उन्होंने प्रत्याशी चयन के लिए नया तरीका निकाला तो पार्टियों ने मजाक उड़ाया कि ऐसे चुनाव नहीं लड़े जाते. चुनाव परिणाम आए तो वह भाजपा जिसके पास सबसे अधिक सीटें आई थीं वह सरकार बनाने से पीछे हट गई और भाजपा के नेता उल्टे आप पर आरोप लगाने लगे कि वह सरकार बनाने से भाग रही है. जैसे ही आप ने सरकार बनाई तो वही भाजपा के लोग इस बात की आलोचना करने लगे कि कांग्रेस से समर्थन क्यों लिया. प्रदेश में बलात्कार होने पर लोग सरकार को घेर रहे हैं लेकिन वहीं सरकार जब सुरक्षा के लिए जिम्मेदार पुलिस को जवाबदेह बनाने के लिए घेर रही है तो उसकी आलोचना हो रही है. पार्टी से नए-नए जुड़े कमल मित्र चिनॉय तहलका से बातचीत में बताते हैं कि पार्टी के लोगों और विधायकों को विधिवत प्रशिक्षण की जरूरत है. वे कहते हैं, ‘यही 1922 में चौरी चौरा में हुआ था जिसके कारण महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था. हमें इससे सीख लेनी होगी.’

पार्टी के चाणक्य कहे जाने वाले योगेंद्र यादव को पार्टी और सरकार के सामने मौजूद चुनौतियों का भान है. वे कहते हैं, ‘हर सुबह उठने के बाद यह एहसास और गहरा होता है कि जूता कितना बड़ा है और हमारा पांव कितना छोटा.’

भले ही अभी जूते और पांव का मेल ठीक से नहीं बैठ रहा हो, लेकिन आम आदमी पार्टी के सामने इस अधूरे संयोजन के साथ ही ठीक से कदम बढ़ाने की चुनौती है.

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