अमर सिंह होने का मतलब

सपा के लिए अमर सिंह की दूसरी बड़ी उपयोगिता धनसंपर्क के क्षेत्र में हो सकती है. उत्तर प्रदेश सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी उत्तर प्रदेश में पैसा नहीं आ पा रहा है. पूंजीनिवेश की कमी से सूबे का विकास भी प्रभावित हो रहा है और पार्टी का भी. मुलायम सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में अमर सिंह उत्तर प्रदेश में निवेश लाने के लिए बनाई गई संस्था के प्रमुख रह चुके हैं और अनेक अवसरों पर उन्होंने अनिल अंबानी सहित देश के कई बड़े उद्योगपतियों को यूपी में हाजिर-नाजिर भी किया था. समाजवादी पार्टी को आज फिर इसी दोस्ती की जरूरत है. उद्यमियों से रिश्तों की गर्माहट समाजवादी पार्टी के चेहरे को फिर से गुलाबी बना सकती है और इस काम के लिए मुलायम सिंह यादव को अमर सिंह से ज्यादा अच्छा साथी दूसरा मिल नहीं सकता. नरेश अग्रवाल पूरी कोशिशों के बावजूद इस कला में कोई बड़ा कमाल नहीं कर पाए हैं. जबकि अमर सिंह इस मामले में वाकई कमाल के हैं.

अमर सिंह की एक और भूमिका जोड़-तोड़ के मामले में भी हो सकती है. अभी जो हालात हैं उनमें लग रहा है कि अगले विधानसभा चुनावों के लिए समाजवादी पार्टी को कई तरह के राजनीतिक जोड़-तोड़ की बहुत जरूरत पड़ सकती है. चाहे लोकदल जैसे दलों से गठबंधन की संभावना हो या फिर ठाकुर राजनीति के ध्रुवीकरण की, अमर सिंह हर जगह उपयोगी हो सकते हैं. हालांकि समाजवादी पार्टी के नेता अभी अमर सिंह की भावी उपयोगिताओं के बारे में कुछ कहने से बच रहे हैं मगर विपक्षी दल के एक नेता का कहना है कि अमर सिंह की सबसे बड़ी उपयोगिता तो यह है कि वे समाजवादी कुनबे को टैक्स हैवन कंट्रीज में एकाउंट खुलवाना सिखा सकते हैं.

वैसे अमर सिंह की जरूरत मुलायम सिंह यादव को लोकसभा चुनाव से पहले ही महसूस होने लगी थी. भारत-पाकिस्तान के रिटायर्ड फौजियों की एक अनौपचारिक बैठक में छह महीने पहले अमर सिंह के घर पर शिवपाल सिंह की मौजूदगी ने इसके संकेत दे दिए थे. लोकसभा चुनाव के दौरान भी मुलायम सिंह यादव ने अमर सिंह के बारे में कहा भी था कि मेरे दिल की बात सिर्फ एक ही आदमी समझता है. नवंबर 2012 में अमर सिंह के खिलाफ कानपुर की एक अदालत में चल रहे मनी लांड्रिंग के मामले में अखिलेश सरकार द्वारा क्लोजर रिपोर्ट लगा देने से भी यह साफ हो गया था कि अमर सिंह को लेकर समाजवादी पार्टी में चल रही कड़वाहट अब खत्म हो रही है.

लेकिन अमर सिंह की वापसी की राह बहुत आसान नहीं है. मुलायम सिंह इस बात को बखूबी समझते हैं. इसलिए वे इस मामले में ‘जोर का झटका धीरे से’ वाली रणनीति अपना रहे हैं. अमर सिंह के साथ मुलायम ने मंच तो साझा किया, लेकिन अमर सिंह की कुर्सी उनसे और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से दूर ही रही. मंच पर प्रवेश के समय भी मुलायम सिंह यादव ने उनसे अभिवादन की सामान्य औपचारिकता ही निभाई, उसमें कहीं भी आत्मीयता नहीं थी. हालांकि बाद में मुलायम और अमर सिंह पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार फ्लाइट में अगल-बगल की सीटों पर बैठ कर ही दिल्ली गए. मुलायम जानते हैं कि अमर की सपा में घुसपैठ से पार्टी के भीतर कई तरह के समीकरण बन-बिगड़ सकते हैं. पार्टी के अंदर अमर सिंह से पीड़ित नेताओं की संख्या कम नहीं है और उनके विरोधियों की भी कमी नहीं हैं. लखनऊ के कार्यक्रम में न तो नरेश अग्रवाल दिखाई दिए, न ही रामगोपाल यादव. आजम खान तो लखनऊ में मौजूद होने के बावजूद कार्यक्रम में नहीं पहुंचे. बाद में उन्होने यह कहकर सफाई दी कि ‘मुझे उस कार्यक्रम में जाना चाहिए था. नहीं जा सका. इसका मुझे अफसोस है.’ मगर वे यह कहना भी नहीं भूले कि’राजनीतिक मंच पर सभी तरह के लोग होते हैं. कुछ हम जैसे फकीर होते हैं, कुछ खेल वाले खिलाड़ी और कुछ मदारी होते हैं.’ ऐसा ही कुछ दिल्ली में राम गोपाल यादव ने भी कहा. उन्होने कहा कि लखनऊ के समारोह में दस हजार लोग मौजूद हैं. वे उन दस हजार में से एक हैं.

मगर यह तय है कि इन कठोर सुरों को अब कोमल होना ही होगा, क्योंकि अमर सिंह और मुलायम अब एक ही फ्लाइट की अगल-बगल की सीटों पर बैठ चुके हैं. अमर सिंह यह घोषित कर ही चुके हैं कि वे मुलायमवादी हो गए हैं. नवंबर में राज्य सभा का अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले वे समाजवादी कुनबे की सेवा के लिए पूरी तरह समाजवादी भी हो जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. अमर सिंह तो कहते ही हैं कि ‘हम बने तुम बने, एक दूजे के लिए.’

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