विकास पर भारी जुबानी बिसात

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‘लालू यादव चाराखोर हैं.’

‘नरेंद्र मोदी ब्रह्मपिशाच है, हम ओझा हैं, बोतल में बंद कर लेंगे, लाल मिरचा के धुआं से भगाएंगे.’

‘जो हमारी ओर आंख उठाकर देखेगा, उसका छाती तोड़ देंगे.’

‘मटन पत्नी की तरह है, बीफ मां और बहन की तरह.’

‘नीतीशजी डाइवोर्सी दुलहा हैं.’

‘अगर जवानी में लालूजी बधिया करा लिए होते तो जनसंख्या कुछ कम रहती.’

यह सारे बयान कुछ उदाहरण हैं. इन बयानों के बीच नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित सवा लाख करोड़ वाला विकास पैकेज और उसके जवाब में नीतीश कुमार द्वारा घोषित चार लाख वाला विकास पैकेज कहां दबकर रह गया, किसी को पता नहीं चला. नीतीश कुमार द्वारा विकास के सात सूत्र भी कहां गए, उसकी थाह नहीं मिल रही और भाजपा के विकास के एजेंडे कहां गए, यह भाजपा नेताओं को भी नहीं पता.

जो युवा वोटर इन नेताओं के अशालीन भाषणों को सुन रहे हैं, कल वे भी राजनीति में आएंगे. आज जो वे सीख रहे हैं, कल को वही आजमाएंगे

बिहार के इस चुनाव में विश्लेषक और जानकार देश का भविष्य देख रहे हैं. ज्ञानेश्वर कहते हैं कि जिन चीजों को लोग बिहार में भूल गए थे, उन्हें फिर से दोहराया जा रहा है. साफ दिख रहा है कि बिहार भयावह भविष्य के रास्ते बढ़ रहा है. विधानसभा चुनाव में यह भाषा है, संयम इस तरह जवाब दे गया है तो अगले साल बिहार में पंचायत और निकाय चुनाव भी होने हैं. उस चुनाव को करवाने की जिम्मेदारी उनकी ही होगी, जो आज तमाम किस्म की विकृत भाषा और वाणी का इस्तेमाल कर सत्ता पाएंगे. सत्ता किसे मिलेगी, यह भले न पता हो लेकिन यह तय है कि जो सत्ता में आएगा, उससे अपना बोया हुआ ही काटते नहीं बनेगा. क्योंकि ऐसी ​स्थिति ही नहीं होगी. विधानसभा चुनाव जिस तरह से लड़ा जा रहा है, जाहिर-सी बात है, पंचायत चुनाव में उसकी परछाईं पड़ेगी.

भयावह भविष्य सिर्फ इस रास्ते नहीं दिख रहा. खतरनाक पहलू दूसरा है. बिहार में इस बार के चुनाव को एक दूसरी वजह से भी खास माना जा रहा है. आंकड़ों का सहारा लेते हुए विभिन्न तरीके से रोजाना बताया जाता है कि यह जो अपना युवा देश है, उसे युवा बनाने में बिहार की युवा आबादी की बड़ी भूमिका है. बिहार में 18 से 39 साल वालों की आबादी 3.79 करोड़ है. यानी कुल आबादी में करीब 61 प्रतिशत. पांच साल पहले इस आयु समूह की हिस्सेदारी 51 प्रतिशत थी.

अगर हर विधानसभा क्षेत्र के हिसाब से देखें तो अमूमन हर क्षेत्र में औसतन करीब 84,651 मतदाता इस आयु समूह के हैं. पिछली बार बिहार विधानसभा में सभी सीटों पर जीत हार का अंतर औसतन 15 हजार का था. यानी साफ है कि यह आयु समूह इस बार जीत-हार तय करेगा. इनमें बड़ी आबादी उन युवाओं की है, जो पहली बार मतदान कर रहे हैं. इस युवा आबादी पर सभी दलों की टकटकी है. सबको उम्मीद है कि वे उनके साथ आएंगे और बाजी को पलट देेंगे. वे युवा मतदाता किसी न किसी के साथ जा रहे हैं, जाएंगे ही, लेकिन याद रखिए कि बिहार में कल को वे भी राजनीति में आएंगे. वे इस बार सिर्फ पहली बार वोट ही नहीं दे रहे, बहुत करीब से चुनाव को देख भी रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं- कल को इन्हीं बच्चों को बिहार की राजनीति में आना है. आज जो वे सीख रहे हैं, कल को उसे ही वे फिर से बिहार की राजनीति में आजमाएंगे. यह दुखद है. सुमन कहते हैं कि इस बार के चुनाव में दुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि प्रधानमंत्री ने भी हल्की भाषा का इस्तेमाल किया, उन्हें संयम बरतना चाहिए था. महेंद्र सुमन की बातें सही हैं. संयम सबको बरतना चाहिए था लेकिन किसी ने नहीं बरता.

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