‘सफेदपोशों को बचाने के लिए वीरप्पन को मारा’

0
770

वीरप्पन बातचीत के लिए रजनीकांत और सिवाजी गणेसन को शामिल करने का दबाव इस वजह से डाल रहा था ताकि पुलिस के सामने आत्मसमर्पण के वक्त उसकी जान की सुरक्षा हो सके. शायद उसका मानना था कि अपहृत अभिनेता राजकुमार समेत प्रभावशाली अभिनेताओं की मौजूदगी तमिलनाडु और कर्नाटक की सरकार को उसके जघन्य अपराधों के लिए माफ करने के लिए मजबूर कर सकती है. वह अपने परिवार के साथ तमिलनाडु में बसना चाहता था. वह हथियार त्यागने के लिए भी तैयार था. हालांकि मौजूदा कानून उस जैसे खूंखार भगोड़े के लिए किसी भी तरह उपयुक्त नहीं थे कि उसे पूरी तरह क्षमादान मिल सके.

nakkikaran web

क्या ये सच है कि लोग और पुलिस जंगल में अभी भी उसकी दौलत की खोजबीन में लगे हैं? आपको क्या लगता है वीरप्पन की मौत के बाद उसकी दौलत का क्या हुआ होगा?

हां, ये मैंने सुना है कि स्थानीय लोग अभी भी उसके पैसों को जंगल में ढूंढ़ रहे हैं. वे इसके लिए काफी मेहनत भी कर रहे हैं. हालांकि मेरा मानना है कि वीरप्पन अपने पीछे कोई संपदा छोड़कर नहीं गया. पैसे को संभालने में वीरप्पन कमजोर था. जो भी उसे मिला उसने स्थानीय समुदाय के खाने-पीने और अन्य जरूरतों को पूरा करने में खर्च कर दिया.

एसटीएफ ने उसे जिंदा पकड़ने की बजाय गोली क्यों मारी? इस तरह की अफवाह है कि कुछ वीवीआईपी लोगों को बचाने के लिए उसे खत्म कर दिया गया जिनके उसके साथ संबंध थे. क्या ये सच है? 

ये सच है कि उसे जिंदा पकड़ा गया था और मारने से पहले दो दिनों तक यातनाएं दी गई थीं. मारे गए इस डाकू की बिना मूछों वाली तस्वीर इस बात की तस्दीक करने के लिए काफी है. उसे अपनी मूंछों पर बहुत गर्व था. काटने की तो छोड़ो, वह अपनी मूंछों को किसी को छूने भी नहीं देता. मैं ये भी मानता हूं कि वह कई वीवीआईपी लोगों के करीब था जिनके राजनीतिक संपर्क थे. अगर उसे जिंदा पकड़ा जाता तो कई सफेदपोश लोग बेनकाब हो सकते थे इसी वजह से उसकी हत्या कर दी गई. यही नहीं, एसटीएफ भी वीरप्पन को कुचलने की कुंठा से भरी हुई थी.

‘ये बहुत मुश्किल है कि वीरप्पन जैसा कोई दोबारा पैदा हो. वह दिल से अच्छा इंसान था. पुलिस के अत्याचारों ने ही उसे क्रूरता के दलदल में धकेला’

दो दशकों से भी ज्यादा समय तक वीरप्पन को किसने पनाह दी? तमिलनाडु और कर्नाटक की सरकारों को उसे पकड़ने में इतना वक्त क्यों लग गया?

राज्य सरकारों की राजनीतिक रस्साकशी और दोनों राज्यों की एसटीएफ के बीच तनातनी के कारण ही उसे पकड़ने में ज्यादा वक्त लगा. वीरप्पन जंगल के चप्पे-चप्पे से अच्छी तरह वाकिफ था और आसानी व बहुत तेजी के साथ जंगल के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंच सकता था. वह पलक झपकते ही गायब हो जाने में माहिर था. बंदूकें और अन्य हथियार होने के बावजूद जंगल में पुलिस असहाय थी. यही नहीं, उसे जंगल में रहने वाले स्थानीय लोगों का भी समर्थन प्राप्त था जो पुलिस और एसटीएफ के निरंकुश व्यवहार से चिढ़ते थे. वीरप्पन गांव वालों पर होने वाले अत्याचारों से कठोरता से निपटता था इसलिए गांव वाले भी उसकी रक्षा के लिए अपनी जान देने के लिए तैयार रहते थे.

क्या वीरप्पन का कोई उत्तराधिकारी बचा है?

नहीं. जहां तक मेरा मानना है उसका कोई उत्तराधिकारी नहीं है. ये बहुत मुश्किल है कि वीरप्पन जैसा कोई दोबारा पैदा हो. वह दिल से अच्छा इंसान था. पुलिस के अत्याचारों ने ही उसे क्रूरता के दलदल में धकेला. उसने पहले डीएफओ पी. श्रीनिवास की हत्या की जिसने उसकी बहन के साथ बलात्कार किया था. इस वजह से उसकी बहन ने आत्महत्या कर ली थी.

आप वीरप्पन का आकलन किस तरह करेंगे?

वीरप्पन एक हत्यारा था, जो खुद को सुधारना चाहता था.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here