जिंदल को जमीन, जनता पर जुल्म

0
341

सुरेश नौटियाल ने बताया, ‘इस मामले में सीधे तौर पर मुख्यमंत्री की भागीदारी है. किसी भी जमीन का हस्तांतरण का पट्टा बनता है. जब हम सबने एसडीएम के पास जाकर उसके बारे में पूछा कि हस्तांतरण का कागज दिखाइए तो पता चला कि जमीन का पट्टा नहीं हुआ है. बिना पट्टा हुए जमीन को तार से घेर दिया गया है. ग्राम प्रधान गोकुल सिंह राणा भी उनके साथ मिला हुआ है. कुछ गांववाले प्रधान का साथ दे रहे हैं. ज्यादातर गांव वाले हमारे साथ हैं क्योंकि गांववाले खुद पीसी तिवारी के पास आए थे और मामले में दखल देने की मांग की थी.’ सुरेश ने बताया कि जेल जाने के बाद पीसी तिवारी और रेखा धस्माना के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट लगाते हुए मुकदमा दर्ज कर दिया गया है.

सुरेश नौटियाल के मुताबिक, 26 जनवरी को गांव वाले निर्माण स्थल के बाहर प्रदर्शन के लिए इकट्ठा हुए, जिसमें कई सामाजिक कार्यकर्ता और सिविल सोसायटी के लोग भी थे. उस दौरान वहां पर एक आदमी था जिसने मुंह ढंक रखा था. उसने डीएम को डांटते हुए कहा, ‘क्या तुम्हें इसीलिए रखा है कि तुम इनके साथ मिल जाओ?’ लोगों के अनुसार वह जिंदल का बेटा था. सामाजिक कार्यकर्ता रघु तिवारी ने बताया, ‘गांववालों ने 26 जनवरी को कब्जा की गई जमीन पर गांव के बुजुर्ग, जो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी हैं, से झंडारोहण करवाया. प्रशासन ने वह झंडा तुरंत उतरवा दिया.’ जीवनचंद चिंता जताते हुए कहते हैं, ‘सारे गांव के विरोध के बाद शासन पर कोई असर नहीं हुआ लेकिन जिंदल के कहने पर संयुक्त मजिस्ट्रेट ने 26 जनवरी को राष्ट्रीय झंडे का अपमान करते हुए उसे उतरवा दिया.’ 

ग्रामीण राजेंद्र के मुताबिक, ‘हम लोगों को कोई अंदाजा ही नहीं था. जमीन जिस प्रक्रिया से ली जाती है, वैसी किसी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया. जब वहां पर काम शुरू हो गया तब हमें इसके बारे में पता चला कि गांव की जमीन किसी कंपनी को दी गई है. किसी तरह के मुआवजे की कोई बात ही नहीं चली. कोर्ट ने स्टे का आदेश दिया है, लेकिन उसे प्रशासन ने तामील नहीं करवाई. जमीन कानूनन तो हमारी है लेकिन हमारी ही सुनने वाला कोई नहीं है. हम लोगों ने कोर्ट जाने से पहले एफआईआर दर्ज कराई थी, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई.’

गांववालों से धोखा होने का उदाहरण देते हुए मुनीष कहते हैं, ‘जब गांववालों ने आंदोलन शुरू किया तो मुख्यमंत्री हरीश रावत ने बयान दिया था कि यदि गांव वाले नहीं चाहते तो उनकी जमीन नहीं ली जाएगी. इसके बाद गांववालों ने उन्हें एक मेमोरेंडम भेजा कि हम अपनी जमीन किसी को नहीं देना चाहते. इस पर गांववालों ने दस्तखत किए थे. इसका कोई संज्ञान नहीं लिया गया और शासन की मदद से ही जिंदल समूह को कब्जा दिलाया गया.’

[box]

यह हमने एक नीति के तहत किया है. हमारे पहाड़ों में निवेश नहीं आता है और शिक्षा की बड़ी समस्या है. पलायन का यह एक बहुत बड़ा कारण है. शिक्षा संस्थान और अस्पताल अगर आएंगे तो इससे हमारा भला होगा. इसमें तीस प्रतिशत सीटें राज्य के लोगों के लिए होंगी. स्थानीय लोगों और पहाड़ों में काम करने वाले अधिकारियों के बच्चों की पढ़ाई हो सकेगी. इसके निकट के गांवों के चार प्रधानों की इसमें सहमति है. अब यह विरोधी पार्टी के कार्यकर्ता हैं जो प्रदर्शन करने में लगे हुए हैं

हरीश रावत, मुख्यमंत्री, उत्तराखंड [/box]

अंतर्राष्ट्रीय स्कूल की यह परियोजना कारोबारी जिंदल परिवार की है. जो सोसाइटी इस स्कूल का निर्माण करवा रही है, वह देवी सहाय जिंदल समूह की है. सोसायटी के उपाध्यक्ष प्रतीक जिंदल हैं, जो नवीन जिंदल के भतीजे हैं. जिंदल परिवार से कांग्रेस पार्टी की नजदीकी किसी से छुपी नहीं है. खुद नवीन जिंदल दस साल तक कांग्रेस के सांसद रहे हैं. पिछला लोकसभा चुनाव उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर लड़ा था और हार गए थे.

गांववालों के मुताबिक, 22 अक्टूबर को जिस दिन इस स्कूल का शिलान्यास होना था, प्रतीक जिंदल और मुख्यमंत्री हरीश रावत के पुत्र आनंद रावत एक ही हेलीकॉप्टर में सवार होकर नैनीसार आए थे. शिलान्यास का विरोध करने पर गांववालों को पुलिस ने दौड़ा-दौड़ा कर पीटा. कई लोगों को पकड़कर थाने में बंद कर दिया गया. 22 अक्टूबर को ही विरोध करने वाले गांव के 32 लोगों को नामजद करते हुए 382 लोगों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज किया गया था.   

गांववालों का सरकार के साथ संघर्ष बढ़ने के साथ यह मामला चर्चा में आया तो दिल्ली से कुछ पत्रकारों का एक स्वतंत्र जांच दल नैनीसार गया था. जांच दल की रिपोर्ट के मुताबिक, ‘नैनीसार की जो सात हेक्टेयर जमीन हिमांशु एजुकेशन सोसायटी को दी गई है, उस संबंध में जिलाधिकारी कार्यालय (अल्मोड़ा) द्वारा उपजिलाधिकारी (रानीखेत) को 29 जुलाई, 2015 को भेजे गए एक ‘आवश्यक’ पत्र में तीन बिंदुओं पर संस्तुति मांगी गई थी: एक- प्रस्तावित भूमि के संबंध में संयुक्त निरीक्षण करवाकर स्पष्ट आख्या; दो- ग्राम सभा की खुली बैठक में जनता/ग्रामप्रधान द्वारा प्राप्त अनापत्ति प्रमाण पत्र की सत्यापित प्रति; और तीसरा- वन भूमि न होने के संबंध में स्पष्ट आख्या. इसके जवाब में 14 अगस्त, 2015 को शासन को जो पत्र भेजा गया, उसमें संयुक्त निरीक्षण का परिणाम यह बताया गया कि कुल 7.061 हेक्टेयर प्रस्तावित जमीन वन विभाग के स्वामित्व की नहीं है. उस पर 156 चीड़ के पेड़ लगे हैं लेकिन वे ‘वन स्वरूप में नहीं हैं’. आकलन के मुताबिक, इस भूमि का नजराना 4,16,59,900.00 रुपये बनता है और वार्षिक किराया 1196.80 रुपये बनता है. जवाब में ग्रामसभा की खुली बैठक का कोई जिक्र नहीं है.’

 nanisar2web

एक अन्य आरटीआई आवेदन के जवाब में प्रशासन की ओर से 22 नवंबर को कहा गया कि सोसायटी ने सरकार के खजाने में दो लाख रुपये का नजराना 20 नवंबर को जमा कराया है.

अब सवाल उठता है कि अगर सरकारी खजाने में पहली बार 20 नवंबर को दो लाख रुपये जमा हुए, तो जिंदल समूह को जमीन पर कब्जा दो महीने पहले कैसे दे दिया गया? पट्टा तो भुगतान के बाद हस्तांतरित होना चाहिए था, जबकि सितंबर में कब्जा ले लिया गया और अक्टूबर में शिलान्यास भी हो गया.

मुनीष ने कहा, ‘इस स्कूल के निर्माण में मुख्यमंत्री हरीश रावत का बेटा शामिल है. प्रतीक जिंदल से उसकी घनिष्ठता है. हरीश रावत का जिंदल परिवार से करीबी रिश्ता है. वे गांव वालों के हित-अहित को नजरअंदाज करके कॉरपोरेट को फायदा पहुंचा रहे हैं.’ ग्रामीणों की परेशानी जो भी हो, लेकिन जिंदल समूह को पहाड़ों की ऊंचाई पर बसी सात हेक्टेयर जमीन की सालाना कीमत अगर 1196.80 रुपये देनी हो, तो उनके लिए इससे अच्छा क्या हो सकता है?

‘सारे गांव के विरोध के बाद शासन पर कोई असर नहीं हुआ लेकिन जिंदल के कहने पर संयुक्त मजिस्ट्रेट ने राष्ट्रीय झंडे का अपमान किया’

ग्राम प्रधान गोकुल सिंह राणा जमीन को सरकारी बताते हुए ग्रामीणों के विरोध को ही अनुचित बताते हैं, लेकिन नया क्रांतिकारी जनवादी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष जीवनचंद इस बात को नकारते हुए तथ्य पेश करते हैं, ‘अगर वह जमीन सरकारी थी तो वहां वनपंचायत कैसे संभव हुई? उसमें वनपंचायत की जमीन है, जिसे लेकर 2001 में नोटिफिकेशन जारी हुआ था. चूंकि उस जमीन में एक हिस्सा वनभूमि भी है, इसलिए वह जमीन सरकार द्वारा किसी को भी नहीं दी जा सकती. वनपंचायत के गठन में पांच सरपंच नियुक्त हुए थे, वे अभी जिंदा हैं जिनसे तस्दीक की जा सकती है. इसमें ग्रामीणों की भी जमीन है, लेकिन उनकी राय नहीं ली गई. इस प्रक्रिया में पंचायतीराज एक्ट का भी उल्लंघन हुआ है. दूसरे, आज तक उस जमीन की लीज निष्पादित नहीं हुई है. फिर जिंदल समूह को कब्जा कैसे मिल गया? बिना लीज निष्पादित हुए किसी को कब्जा कैसे दिया जा सकता है? 22 अक्टूबर को मुख्यमंत्री हरीश रावत ने उस परियोजना का शिलान्यास भी कर दिया. इससे यह साफ है कि सरकार और मुख्यमंत्री प्रतीक जिंदल पर मेहरबान हैं और पूरा तंत्र इस गैरकानूनी कार्य में शामिल है.’