शीतयुद्ध की बढ़ती गर्मी

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किएव के दंगाइयों की हू-बहू नकल
अपनी नाक इस बुरी तरह कटने के बाद किएव की अंतरिम सरकार ने उसी सप्ताहांत पड़ रहे ईस्टर त्यौहार के बहाने से अपना अभियान रोक दिया. पूर्वी यूक्रेन के रूसी-भाषी विद्रोही भी धरना देने, सड़कों पर और सरकारी भवनों के सामने बाधाएं खड़ी करने और उन पर कब्जा जमा लेने के हूबहू वही कारगर तरीके अपना रहे हैं, जो यूक्रेन के रूस-विरोधी प्रदर्शनकारी राजधानी किएव में भारी सफलता के साथ दिखा चुके हैं. उनकी मांग अपने क्षेत्र का रूस में विलय करने से अधिक इस बात को लेकर है कि यूक्रेन को एक संघात्मक शासन-व्यवस्था वाला देश बनाने के लिए जनमतसंग्रह कराया जाए, रूसी भाषा की प्रधानता वाले पूर्वी तथा दक्षिणपूर्वी यूक्रेन को सच्चे स्वायत्तशासी अधिकार दिए जाएं. लेकिन यूक्रेन की अंतरिम कठपुतली सरकार और उसके यूरोपीय-अमेरिकी सूत्रधार यही रट लगाए हुए हैं कि पूर्वी यूक्रेन के रूसी-भाषी रूस के चाटुकार पृथकतावादी हैं जिनके जरिये रूस अपना विस्तार करना और यूक्रेन को अपनी मुठ्ठी में कसे रखना चाहता है.

पश्चिम का रामबाण तर्क
पश्चिमी देश इस बात में कोई बुराई नहीं देखते कि वे स्वयं भी तो यूक्रेन को अपनी मुठ्ठी में कसना चाहते हैं. रूस का तो वह फिर भी तीन सदियों तक हिस्सा रहा है जबकि जर्मनी, फ्रांस या अमेरिका से तो उसका कुछ भी लेना-देना नहीं है. ऐसी आपत्तियों पर पश्चिम का सबसे रामबाण तर्क होता है– हम लोकतंत्र हैं. मानो लोकतंत्र होना सदा-सर्वदा सच्चा और सही होने का ऐसा जन्मसिद्ध एकाधिकार है, जो केवल अमेरिका और उसके पिट्ठुओं की बपौती है. उन्हीं के पास यह जानने की दैवदृष्टि भी है कि कौन सच्चा लोकतंत्र है और कौन नहीं.

चारपक्षीय जेनेवा वार्ताओं के बाद यूक्रेन की अंतरिम सरकार ने देश के पूर्वी भाग के रूस-समर्थकों के विरुद्ध अपना कथित ‘आतंकवाद-विरोधी’ अभियान फिर से छेड़ दिया है. पहले ही दिन एक हेलीकॉप्टर मार गिराया गया जबकि स्लाव्यांस्क के पास गोलियों की बौछार से क्षतिग्रस्त एक अंतोनोव-30 परिवहन विमान जैसे-तैसे उतरने में सफल रहा. किएव की सरकार अपने सुरक्षाबलों की निष्ठा पर क्योंकि अब भी पूरा विश्वास नहीं कर सकती, इसलिए वह अमेरिका के माध्यम से रूस पर दबाव डलवा रही है कि रूस अपने समर्थकों को अनुशासित करे. अमेरिका ने रूस के विरुद्ध प्रतिबंधों का विस्तार करने के साथ-साथ रूस से लगी सीमा वाले पोलैंड, एस्तोनिया, लातविया और लिथुआनिया में अपने 600 अतिरिक्त सैनिक भेजने और इन देशों की हवाई निगरानी बढ़ा देने की घोषणा की है.

पर्यवेक्षक पकड़े गए
‘यूरोपीय सुरक्षा एवं सहयोग संगठन’ की ओर से उसके ‘स्पेशल मॉनिटरिंग मिशन’ (विशेष पर्यवेक्षण मिशन) के करीब 140 पर्वेक्षक वैसे तो पहले से ही यूक्रेन में तैनात हैं और अपनी रिपोर्टें संगठन के सभी देशों के पास भेजते रहते हैं. लेकिन, यूक्रेनी सरकार ने देश के पूर्वी हिस्से की टोह लेने के लिए एक और दल ‘मिलटरी वेरिफिकेशन टीम’ (सैनिक सत्यापन टीम) के कुछ सदस्यों को भी संभवतः अलग से बुला रखा है.

जर्मन सेना ‘बुंडेसवेयर’ के नेतृत्व में गठित इस टीम के एक दर्जन सदस्यों को स्लाव्यांस्क के रूसियों की जनमिलिशिया ने 26 अप्रैल को बंदी बना लिया. वे किसी वर्दी में नहीं थे, बल्कि सामान्य कपड़े पहने हुए थे. उन में से चार जर्मनी के हैं, बाकी यूक्रेन, चेक गणराज्य, डेनमार्क, स्वीडन और पोलैंड के बताए जाते हैं. 27 अप्रैल को उन्हें मीडिया के सामने पेश करने के बाद स्वीडिश बंदी को मधुमेह का रोगी होने कारण रिहा कर दिया गया. स्लाव्यांस्क के स्वघोषित मेयर व्याचेस्लाव पोनोमार्येव ने उन पर ‘नाटो के भेदिये’ होने का आरोप लगाया और कहा कि उन्हें यूक्रेनी सरकार द्वारा बंदी बनाए गए रूसी-भाषी जनमिलिशिया के सदस्यों के साथ अदला-बदली से ही रिहाई मिल सकती है. रूसी विदेशमंत्रालय ने आश्वासन दिया है कि विदेशी बंदियों को शीघ्र ही छुड़ाने की हर संभव कोशिश की जायेगी.

मीडिया में पुतिन की अत्यधिक आलोचना एक तरह से उनका हित ही कर रही है.
मीडिया में पुतिन की अत्यधिक आलोचना एक तरह से उनका हित ही कर रही है.

रूसी सैनिक-जमाव
उधर अमेरिका उपग्रहों से ली गई पुरानी तस्वीरों के माध्यम से सिद्ध करने में लगा है कि रूस ने यूक्रेनी सीमा के पास 40 से 50 हजार सैनिक जमा कर रखे हैं, जो किसी भी समय सीमा पार कर सकते हैं. लेकिन, मॉस्को में पैदा हुए और वहीं पढ़े-लिखे सैन्य-विशेषज्ञ अलेक्सांदर गोल्त्स का कहना है कि वे बीती फरवरी से ही वहां हैं पर यूक्रेन पर कब्जा करने के लिए कतई पर्याप्त नहीं हैं. पुतिन के आलोचक गोल्त्स ने एक जर्मन दैनिक से कहा कि यह सैन्यबल छाताधारी (पैराशूट) सैनिकों तथा थल सेना की 3-4 विशिष्ट इकाइयों को मिला कर बने एक त्वरित हस्तक्षेप बल के आदिरूप (प्रोटोटाइप) जैसा है और यूक्रेन के किसी प्रादेशिक भूभाग तक को हड़पने के योग्य नहीं हैं. यूक्रेन में ‘यदि कोई नई सीमा खींचनी है, तो कम से कम एक लाख जवानों की जरूरत पड़ेगी. यदि हम सारी बातों को विवेकसम्मत ढंग से सोचें, तो यूक्रेन पर आक्रमण का आदेश संभव नहीं लगता,’ गोल्त्स का कहना है. उन्होंने याद दिलाया कि अमेरिका सहित संसार का कोई भी देश नागरिक जनता के प्रतिरोध पर कभी विजय प्राप्त नहीं कर पाया. इसे पुतिन भी जानते हैं.

अमेरिका-भक्तों के माथे पर शिकन
दूसरी ओर राष्ट्रपति बराक ओबामा रूस को ईंट का जवाब पत्थर से देने की कुछ ऐसी उतावली में लगते हैं कि अमेरिका के सबसे विश्वस्त जर्मनी जैसे भक्तों के माथे पर भी शिकन पड़ने लगी है कि वे आखिर चाहते क्या हैं. 25 अप्रैल को अमेरिकी विदेशमंत्री जॉन केरी ने जी-7 के सभी देशों के सरकार प्रमुखों को फोन कर हड़काया कि ‘सात दिनों से रूस सही दिशा में कोई ठोस कदम उठाने से मना कर रहा है.’ उन्होंने सभी सात देशों को मजबूर कर दिया कि वे एक साझी घोषणा में रूस से कहें कि वह हफ्ते भर के अंदर पूर्वी यूक्रेन के रूस समर्थकों की नकेल कसे, वरना बहुत बुरा होगा. लेकिन, यूक्रेन की अंतरिम सरकार से कोई आग्रह, कोई अपील नहीं की गई. इसी से स्पष्ट हो जाना चाहिए कि यूक्रेन-संकट को, जिसे यूरोपीय संघ और अमेरिका ने ही मिल कर पैदा किया, किसी संभावित युद्ध तक ले जाने में दिलचस्पी और उतावली किस की है.

स्थिति यह हो गई है कि पश्चिमी सरकारें और सारे मीडिया मिलकर रूसी राष्ट्रपति के विरुद्ध एक स्वर में जितना अधिक प्रलाप कर रहे हैं, आम जनता का उनके ऊपर से विश्वास उतना ही उठता जा रहा है. कम से कम जर्मनी में तो यही देखने में आ रहा है. पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाले पाठक-पत्रों और वेबसाइटों पर छपने वाली पाठकों की टिप्पणियों में उन लोगों का पलड़ा काफी भारी है, जो पश्चिमी सरकारों के इरादों के प्रति शंका और राष्ट्रपति पुतिन के प्रति समझ दिखा रहे हैं. मीडिया वाले हैरान हैं और नेता परेशान. इन प्रतिक्रियाओं में ऐसे बहुत सारे तथ्यों का उल्लेख मिलता है, जो और सरकारें तो छिपाती ही हैं, मीडिया वाले भी दबा देते हैं.

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