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सीमाओं काे लांघकर कला के विभिन्न आयामों तक पहुंचने वाला नाम विद्या

 

Vidya WEB

ट्रांसजेंडर समुदाय ने अपने अस्तित्व और पहचान की खोज में विभिन्न कलाओं की सीमाओं को भी लांघा है. कला के विभिन्न आयामों तक पहुंचने वाला ऐसा ही एक नाम सामाजिक कार्यकर्ता, ब्लॉगर, फिल्म निर्माता और अदाकारा ट्रांसजेंडर विद्या या स्माइली का भी है. विद्या की उपलब्धियां असीमित हैं. ट्रांसजेंडर समुदाय से वह पहली पूर्णकालिक थियेटर कलाकार हैं. इस समुदाय से मुख्यधारा के निजी बैंक में काम करने वाली भी वो पहली हैं. तमिल सिनेमा में भी उन्होंने काफी दिनों तक काम किया. शॉर्ट फिल्मों में अभिनय करने के अलावा उन्होंने मलयालम और तमिल की कुछ फिल्मों में सहायक निर्देशक की भी भूमिका निभाई है. अभिनय को लेकर उनके इस प्यार ने उन्हें बड़े परदे तक भी पहुंचाया. 2010 की मशहूर तमिल फिल्म नंदलाला में उन्होंने नामी निर्देशक मिस्कीन के साथ बतौर सहायक निर्देशक काम किया.

स्माइली के नाम से मशहूर दलित विद्या अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान में तंजावूर स्थित तमिल विश्वविद्यालय से परास्नातक हैं. 2008 में ‘आई एम सर्वानन विद्या’ नाम से उनकी आत्मकथा आई थी, जिसमें उन्होंने ट्रांसजेंडर समुदाय के खुद को पहचानने और उस पहचान के साथ समाज में अपनी जगह बनाने में आने वाले संघर्षों के बारे में लिखा. उस दुविधा के बारे में वो लिखती हैं, ‘मैं एक लड़की थी पर बदकिस्मती से दुनिया मुझे एक लड़के के तौर पर ही देखती थी. मैं अंदर से एक लड़की ही बनना चाहती थी पर हर संभव कोशिश करती कि दुनिया को मेरे अंदर छिपे इस स्त्रीत्व के बारे में पता न लगे. स्कूल में हुए कड़वे अनुभवों के चलते मैं पूरी कोशिश करती थी कि कॉलेज में कोई मुझे देख भी न पाए. मैंने एक झूठी जिंदगी जीने का असफल प्रयास किया जहां मैं आदमियों की तरह अकड़ में रहने, उनकी तरह बोलने की कोशिश किया करती थी.’

विद्या या स्माइली किन्नर समुदाय की पहली पूर्णकालिक थियेटर कलाकार हैं. विद्या की उपलब्धियां असीमित हैं. उनकी आत्मकथा को चेन्नई के स्टेला मारिस कॉलेज में बीए अंग्रेजी और मदुरई के अमेरिकन कॉलेज के बीए तमिल के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है

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‘आई एम सर्वानन विद्या’ किसी ट्रांसजेंडर द्वारा लिखी गई पहली आत्मकथा है, जो तमिल में है. बाद में इसका अंग्रेजी, मलयालम, कन्नड़ और मराठी में अनुवाद हुआ. चेन्नई के स्टेला मारिस कॉलेज में उनकी आत्मकथा को बीए अंग्रेजी के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है. वहीं आत्मकथा के तमिल संस्करण को मदुरई के अमेरिकन कॉलेज के बीए तमिल के पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाता है. इस आत्मकथा के कन्नड़ संस्करण ‘नानू अवानू अला अवालू’ (आई एम नॉट हिम, आई एम हर) को 2012 का सर्वश्रेष्ठ कन्नड़ अनुवाद का पुरस्कार मिला. इतना ही नहीं उनकी इस आत्मकथा के लिए कन्नड़ साहित्य अकादमी उन्हें सम्मान देने की भी सिफारिश कर चुकी है.

चेन्नई के तिरुचि में जन्मीं तीन भाई-बहनों में से एक स्माइली, सर्वानन नाम के साथ बड़ी हुईं. फिर खुद की तलाश में निकली स्माइली ने ट्रांसजेंडर समुदाय का हिस्सा बनने के लिए घर छोड़ दिया. आखिरकार उन्होंने आंध्र प्रदेश में सेक्स चेंज ऑपरेशन करवाया, यहीं उन्हें थियेटर के बारे में पता चला. थियेटर के प्रति इस लगाव के चलते ही उनके पन्मई थियेटर की शुरुआत हुई. यहां वो निर्देशन भी करती हैं. इसके अलावा वे कई और थियेटर संगठनों से भी जुड़ी हुई हैं. यहां गौर करने वाली बात ये है कि उनके काम में लिंग और जाति से जुड़े मुद्दों को लेकर समाज से सवाल होते हैं. थियेटर के इस जुड़ाव और विदूषक के रूप में सराही गई उनकी भूमिकाओं की वजह से उन्हें ब्रिटिश काउंसिल की ओर से 2013 में ‘चार्ल्स वॉलेस इंडिया ट्रस्ट स्कॉलरशिप’ भी मिल चुकी है. साथ ही स्माइली एक स्व-प्रशिक्षित चित्रकार भी हैं, उनके चित्रों का बंगलुरु और चेन्नई में प्रदर्शन भी हो चुका है. उनके ज्यादातर चित्र ट्रांसजेंडर मुद्दों को एक स्त्री के नजरिये से देखते हुए होते हैं.

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