टाइमबम !

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असुरक्षित : परियोजना की नहर की दीवार के अंदर और बाहर पड़ी दरारें और उन्हें भरने की असफल कोशिश
असुरक्षित: परियोजना की नहर की दीवार के अंदर और बाहर पड़ी दरारें और उन्हें भरने की असफल कोशिश. फोटो: प्रदीप सती

हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय में कार्यरत भूगर्भ शास्त्री प्रोफेसर वाईपी सुंदरियाल कहते हैं, ‘परियोजना शुरू होने के पहले दिन से ही जिस तरह की कार्यप्रणाली इसको लेकर अपनाई जा रही थी, तब से ही इसके पूरी तरह सुरक्षित होने पर संशय के बादल मंडरा रहे थे. लेकिन अब डीएसबी टैंक जैसे अहम हिस्से के टूट जाने की घटना के बाद तो कोहरा पूरी तरह छंट गया है.’ विश्व विद्यालय में कार्यरत एक और भूगर्भशास्त्री डॉ. एसपी सती भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं. वे कहते हैं, ‘2007 में ही एक रिपोर्ट के जरिए हमने बता दिया था कि श्रीनगर में बन रही बिजली परियोजना के निर्माण कार्य में कई तरह की लापरवाहियां बरती जा रही हैं जो भविष्य में इस पूरे प्रोजेक्ट के साथ ही श्रीनगर के सामने भी मुसीबतों का पहाड़ खड़ा कर सकती हंै. दरअसल डीएसबी टैंक से पावर हाउस तक पानी पहुंचाने के लिए जिस चौरास इलाके में नहर बनाई गई है. उस जमीन के निचले हिस्से की मिट्टी बेहद दलदली है. इसमें इतना सामर्थ्य नहीं है कि वह इतनी बड़ी और ऐसी नहर का वजन संभाल सके जिसमें चौबीसों घंटे पानी का प्रवाह जारी हो. इस सबके बादजूद न तो कंपनी और न ही सरकारों ने इन बातों को गंभीरता से लिया, जिसका परिणाम सबके सामने हैं.’ वे आगे कहते हैं, ‘पिछले साल जून महीने में आई आपदा से श्रीनगर शहर को हुए नुकसान में इस परियोजना की भूमिका जगजाहिर है. उस वक्त इस परियोजना का तकरीबन पांच लाख घन मीटर मलवा अलकनंदा नदी में बहा था, जिसने समूचे श्रीनगर को पाट दिया था. ऐसे में अब नहर से होने वाले रिसाव के साथ ही डीएसबी टेंक के पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाने की घटनाओं को देखते हुए सुरक्षा की दृष्टि से इस परियोजना को खतरनाक बताने के लिए और क्या प्रमाण दिया जाए?’

प्रोफेसर सुंदरियाल तथा प्रोफेसर एसपी सती द्वारा जाहिर की गई इन आशंकाओं की पड़ताल करने के क्रम में कुछ प्रमुख घटनाओं की तरफ एक सरसरी निगाह डालना जरूरी हो जाता है जो इस परियोजना की लचर कार्यप्रणाली का प्रमाण तो प्रस्तुत करती ही हैं, साथ ही यह भी बताती हैं कि इस परियोजना के चलते श्रीनगर और उसके आसपास के इलाकों को किस तरह का नुकसान अब तक उठाना पड़ा है.

आपदा के बाद जांच में पता चला कि बांध के नजदीक वाले इलाकों में 47 प्रतिशत और बांध से दूर वाले इलाकों में 20 प्रतिशत मलबा इसी परियोजना का था

पिछले साल जून महीने की आपदा के बाद तथा इसी साल केदारनाथ यात्रा शुरू होने से ठीक पहले तहलका ने दो समाचार रिपोर्टों में इस परियोजना से श्रीनगर शहर में मची तबाही का पूरा ब्यौरा सामने रखा था. उन दोनों ही रिपोर्टों में साफ तौर पर इस बात का जिक्र था कि इस परियोजना के मलबे ने श्रीनगर के शक्तिविहार इलाके के कई घरों को रहने लायक नहीं छोड़ा था. इसके अलावा तब से लेकर अब तक कई दूसरी रिपोर्टों में भी इस बात की तस्दीक हो चुकी है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई रवि चोपड़ा कमेटी ने भी इसी साल अप्रैल में प्रस्तुत की गई अपनी रिपोर्ट में उत्तराखंड में हुई आपदा के नुकसान को बढ़ाने में बांधों की भूमिका को स्वीकार किया है. इस बारे में रवि चोपड़ा कहते हैं, ‘2013 की आपदा के बाद हमारी टीम ने श्रीनगर के अलग-अलग इलाकों से मलबे के सेंपलों की जांच की थी. इस जांच में पता चला कि बांध के नजदीक वाले इलाकों में 47 प्रतिशत और बांध से दूर वाले इलाकों में 20 प्रतिशत मलबा इसी परियोजना का था. खुद जीवीके कंपनी ने भी तब इस बात को स्वीकार किया था कि श्रीनगर और उसके आसपास के इलाकों में घुसे मलबे का बीस प्रतिशत तक हिस्सा इसी परियोजना के मलवे का था. ऐसे में कंपनी की यह स्वीकारोक्ति साफ तौर पर बताती है कि स्थितियां कितनी चिंताजनक हैं.’

असुरक्षित: परियोजना की नहर की दीवार के अंदर और बाहर पड़ी दरारें और उन्हें भरने की असफल कोशिश. फोटो: प्रदीप सती
असुरक्षित: परियोजना की नहर की दीवार के अंदर और बाहर पड़ी दरारें और उन्हें भरने की असफल कोशिश. फोटो: प्रदीप सती

अब इस परियोजना के काफर डैम के क्षतिग्रस्त होने की घटनाओं का जिक्र करते हैं. 330 मेगावाट बिजली की उत्पादन क्षमता वाले इस पावर प्रोजेक्ट के लिए श्रीनगर शहर से ठीक पहले कोटेश्वर नामक जगह पर परियोजना का मुख्य बांध बनाया गया है. 90 मीटर ऊंचे इस बांध का निर्माण करने के लिए कंपनी ने इसके ठीक आगे काफर बांध बनाया था. दरअसल इस तरह की बिजली परियोजनाओं के लिए मुख्य बांध की दीवार का निर्माण करने से पहले काफर बांध बनाया जाता है. इस काफर बांध की मदद से नदी के पानी को एक तरफ से रोका जाता है जिसके बाद उस जगह पर मुख्य बांध का निर्माण किया जाता है. इसके बाद इसी तर्ज पर पानी को दूसरी तरफ से रोक कर पूरा बांध तैयार किया जाता है. इस तरह देखा जाए तो मुख्य बांध की निर्माण प्रक्रिया में काफर डैम की बेहद अहम भूमिका होती है. लेकिन 2008 में श्रीनगर परियोजना का काफर बांध अचानक टूट गया. उस वक्त मुख्य बांध का निर्माण कार्य प्रगति पर था. इसके बाद अगले ही साल 27 जुलाई को एक बार फिर से इस घटना की पुनरावृत्ति हो गई. 27 जून, 2010 को इसके तीसरी बार ढह जाने से परियोजना की घटिया कार्यप्रणाली खुल कर सतह पर आ गई. तीनों ही मौकों पर काफर डैम के टूटने से नदी किनारे स्थित बस्तियों को काफी नुकसान पहुंचा था. 2009 में दूसरी बार काफर बांध टूटने के बाद पौड़ी जिले के तत्कालीन अपर जिलाधिकारी की अध्यक्षता में एक जांच कमेटी बनाई गई, जिसका काम काफर डैम के टूटने के कारणों का पता लगाने के साथ ही, बांध के निर्माण कार्यों की गुणवत्ता जांचने तथा नदी किनारे की बस्तियों को हुए नुकसान का आकलन करना था. इस कमेटी ने जांच के दौरान परियोजना की कार्यप्रणाली में बहुत सारी अनियमितताएं पाई. बावजूद इस सबके कंपनी के खिलाफ कोई भी कड़ा कदम नहीं उठाया गया. भाकपा (माले) के गढ़वाल संयोजक इंद्रेश मैखुरी इसे सीधे तौर पर प्रशासन और कंपनी की मिलीभगत बताते हैं. वे कहते हैं, इस परियोजना का संचालन करने वाली जीवीके कंपनी की कारगुजारियों के खिलाफ जितनी भी बार स्थानीय स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुए, इक्का-दुक्का मौकों को छोड़ दिया जाए तो प्रशासनिक पैंडुलम हमेशा कंपनी की तरफ ही झुका रहा.

कंपनी के पक्ष में प्रशासनिक तरफदारी की जिन बातों को इंद्रेश मैखुरी कह रह हैं उन बातों के सहारे थोड़ा आगे बढ़ा जाए तो मालूम पड़ाता है कि प्रशासन की दरियादिली के साथ ही स्थानीय जनप्रतिनिधियों का मन भी जीवीके कंपनी के प्रति हमेशा मेहरबान रहा है. 2011 में इस परियोजना पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा पाबंदी लगाई जाने के बाद गढ़वाल के तत्कालीन सांसद सतपाल महाराज तथा उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री, मंत्री प्रसाद नैथानी परियोजना के समर्थन में भारी दलबल के साथ नई दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पहुंच गए थे. उस वक्त इस परियोजना का समर्थन करने वालों में मंगसूं गांव के वे ग्रामीण भी शामिल थे जिनका जिक्र इस रिपोर्ट की ऊपरी पंक्तियों में किया जा चुका है. इस बारे में पूछे जाने पर मंगसू के निवासी राजेंद्र मुयाल कहते हैं, ‘उस वक्त कंपनी ने हमें तमाम तरह की सुविधाएं देने की बात कही थी. इसके अलावा मंत्री प्रसाद नैथानी तथा सतपाल महाराज ने भी तब स्थानीय हितों का खयाल रखने की बात कही थी. लेकिन जैसे ही इस परियोजना पर लगी रोक हटी, कंपनी और जनप्रतिनिधियों, दोनों ने हमसे मुंह मोड़ लिया.’ वे आगे कहते हैं, ‘हालांकि 26 जुलाई को मंत्री प्रसाद नैथानी ने इस इलाके का दौरा किया था, लेकिन कंपनी के खिलाफ कार्रवाई करने का कोरा आश्वासन देने के बाद से उनका कोई अता-पता नहीं है.’ धरना स्थल पर बैठे ग्रामीणों में से जितनों से भी तहलका ने बात की वे सभी खुद को ठगा महसूस कर रहे थे.

आपदा के बाद जांच में पता चला कि बांध के नजदीक वाले इलाकों में 47 प्रतिशत और बांध से दूर वाले इलाकों में 20 प्रतिशत मलबा इसी परियोजना का था

2011 में इस परियोजना का समर्थन करने दिल्ली पहुंचे सतपाल महाराज तथा मंत्री प्रसाद नैथानी ने तब इस परियोजना को राज्यहित में बताया था. उस वक्त इन दोनों नेताओं का तर्क था कि श्रीनगर परियोजना से मिलने वाली बिजली राज्य को समृद्धि की ओर ले जाएगी. इसके अलावा राज्य के दो पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूरी तथा विजय बहुगुणा भी बिजली की कमी का तर्क देकर श्रीनगर परियोजना की पैरवी कर चुके हैं. लेकिन श्रीनगर परियोजना राज्य की बिजली जरूरतों को पूरा करने में कितनी भूमिका निभा सकती है, जरा इस पर भी एक नजर दौड़ा लेते हैं.

2002 में बनी राज्य की ऊर्जा नीति के मुताबिक इस परियोजना की निर्माता कंपनी को उत्तराखंड राज्य को 12.5 प्रतिशत बिजली मुफ्त देने की बाध्यता के साथ ही अगले 45 सालों तक कुल बिजली का 87.5 प्रतिशत हिस्सा बेचने का अधिकार मिला हुआ है. ऐसे में यदि यह बांध महफूज भी रहता है और बेरोकटोक बिजली का उत्पादन भी करता है तब भी 330 मेगावाट क्षमता वाली इस परियोजना से केवल 39.60 मेगावाट बिजली ही उत्तराखंड के हिस्से में आना निश्चित है. बाकी बिजली को यह कंपनी किसी अन्य राज्य को भी बेच सकती है. इसी के तहत उसने उत्तर प्रदेश सरकार के साथ बाकी पूरी बिजली बेचने का करार कर लिया है. जबकि 1985 में इसको मंजूरी देते समय पर्यावरण मंत्रालय का साफ कहना था कि यह मंजूरी क्षेत्र में बिजली की समस्या को दूर करने के लिए ही दी जा रही है. इंद्रेश मैखुरी कहते हैं, ‘चालीस मेगावाट बिजली के लिए इतनी बड़ी आबादी को दांव पर लगा कर नीति नियंताओं ने एक ऐसी कंपनी का हित साधने का काम किया है जिसने श्रीनगर क्षेत्र के सिर पर बांध के रूप में एक ऐसा टाइम बम रख दिया है जिसका ट्रिगर अपने आप कभी भी दब सकता है.’ झुनझुनवाला कहते हैं, ‘अगर जीवीके कंपनी की कार्यप्रणाली ऐसी ही रही तो बहुत संभव है कि इस परियोजना का मुख्य बांध भी किसी दिन जवाब दे दे. अगर ऐसा हुआ तो यह घटना इस इलाके के लिए ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश के लिए अस्तित्व का संकट पैदा कर देगी.

अलकनंदा नदी पर बन रही इस परियोजना को खतरनाक बताने वाले कारणों मंे एक बड़ा कारण इस बांध की ऊंचाई को भी बताया जा रहा है. परियोजना के शुरुआती प्रस्ताव में मुख्य बांध की ऊंचाई 63 मीटर तय की गई थी, लेकिन जीवीके के जिम्मा संभालने के बाद इसकी ऊंचाई को बढ़ाकर 90 मीटर कर दिया गया. बढ़ी हुई ऊंचाई की वजह से बांध से बनने वाली झील का दायरा 15 किलोमीटर तक फैल गया है. ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि इतनी बड़ी झील में जमा पानी अप्रिय स्थितियों में किस कदर खतरनाक हो सकता है. वह भी तब जब यह झील एक ऐसे इलाके में बनी हो जो भूस्खलन की दृष्टि से बेहद खतरनाक है. तकरीबन डेढ़ दशक पहले सीमा सड़क संगठन ने ऋषिकेश से बद्रीनाथ के बीच तकरीबन नब्बे छोटे-बड़े भूस्खलन क्षेत्र चिह्नित किए थे. श्रीनगर परियोजना इसी मार्ग के बीच में बन रही है. इसरो रिमोट सेंसिंग और भूगर्भ सर्वेत्रण विभाग द्वारा तैयार भूस्खलन हैजार्ड मैपिंग के अनुसार भी इस मार्ग का 441.57 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र भूस्खलन से प्रभावित होनेवाला है.

बहरहाल काफर डैम टूटने से लेकर डीएसबी टैंक के क्षतिग्रस्त हो जाने तक की अब तक की तमाम परिस्थितियां ऐसी हैं जिनके आधार पर इस परियोजना को सुरक्षा के नजरिए से खतरनाक करार दिया जा सकता है. तहलका ने इस सबको लेकर जीवीके कंपनी से दस सवाल पूछे थे. इन दस सवालों में एक सवाल यह भी था कि, क्या कंपनी ऐसा कोई आश्वासन दे सकती है जिससे इस इलाके के लोग इस परियोजना के चलते भविष्य में खुद को पूरी तरह महफूज समझ सकें ? बाकी नौ सवालों के साथ ही यह सवाल भी अब तक जवाब की प्रतीक्षा में है.

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4 COMMENTS

  1. श्रीनगर जलविद्युत परियोजना के विनाशकारी प्रभावों को उजागर करती प्रदीप सती की रिपोर्ट प्रशंसनीय और काबिले गौर है.तहलका के इस अंक के लिहाज से यह रिपोर्ट इसलिए भी सुकूनदायक है क्यूंकि कवर स्टोरी के नाम पर अतुल चौरसिया नामक “सज्जन” ने व्यक्तिगत दुराग्रहों से ग्रसित होकर, जिस तरह का कलमी विष वमन कर जहरीला कूड़ा-कचरा फैलाया है,उसके बरक्स यह रिपोर्ट कुछ वास्तविक पत्रकारिता का भी आभास कराती है

  2. बड़े दुःख की बात है इतने बड़े मुद्दे पर विपक्षी पार्टी भी सड़क पर नहीं उतरी …

  3. एक शानदार और तथ्यों से परिपूर्ण रिपोर्ट। अगर हम और सरकारें अभी भी नहीं चेती तो भविष्य में 2013 की आपदा से भी महाआपदा आना तय है

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