‘अब ये लड़ाई नहीं छोड़ी जा सकती’

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आज की तारीख में होम गार्ड्स से पूरे आठ घंटे की ड्यूटी ली जाती है. तीन साल की जगह 10 साल और 15 साल तक सेवा ली जाती है और फिर उन्हें कार्यमुक्त कर दिया जाता है. देश के कई राज्यों में होम गार्ड्स को 60 साल की उम्र तक सेवा देने का प्रावधान है. लेकिन दिल्ली में 1998 के बाद से हर साल कुछ न कुछ पुराने होम गार्ड्स को हटा दिया जाता है फिर उनकी जगह नए लोगों की भर्ती होती है. विभाग इसके पीछे कानून का हवाला देता है लेकिन विरोध कर रहे जवान इसके पीछे भ्रष्टाचार को जिम्मेदार मानते हैं. दस साल तक होम गार्ड्स रहे और आज इस लड़ाई का नेतृत्व कर रहे सुरेश कुमार कौशिक का मानना है कि ऊंचे पद पर बैठे अधिकारियों की मुट्ठी तभी गर्म होती है जब नए लोगों की बहाली होती है. आज तो लाख-लाख रुपये की घूस चलती है. सुरेश बताते हैं, ‘सीधा-सा हिसाब है. पुराने जाएंगे, तभी नए आएंगे. नए लोगों की बहाली होगी तो माल मिलेगा. इसी वजह से हम बाहर हैं. दस साल नौकरी बजाने के बाद सड़क पर धरना दे रहे हैं. कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रहे हैं.’ इन जवानों की समस्या कई विभागों के बीच गोल-गोल घूम रही है. दिल्ली सरकार का कहना है कि होम गार्ड्स एक अलग विभाग है इसलिए वह ही इस बारे में फैसला लेगा.

संसद में पूछे गए एक सवाल (अतारांकित प्रश्न संख्या 2982, दिनांक: 11.03.2003) के जवाब में केंद्र सरकार कहती है कि ऐसे होमगार्ड्स जिन्हें कार्यमुक्त कर दिया गया है उन्हें फिर से सेवा में लिए जाने के लिए कार्यवाही शुरू हो गई है. लेकिन जब ये जवान इस बाबत दिल्ली होम गार्ड्स विभाग से संपर्क करते हैं तो विभाग कहता है कि ऐसी किसी कार्यवाही के बारे में उसे जानकारी नहीं है. यह सब जानकारी उन फाइलों के पुलिंदे में कैद है जिसे धरने पर बैठे ये जवान अपने पास रखे हुए हैं. कुछ मिनटों की बातचीत के बाद ये लोग इन कागजों को दिखाने लगते हैं. भूतपूर्व होम गार्ड्स जवानों में से एक का सवाल है, ‘अगर नहीं करना तो ये इतने साल से हमारे से साथ ऐसा मजाक क्यों कर रहे हैं. नेता कुछ कहते हैं. संसद कुछ कहती है और विभाग कुछ और ही बात समझाता है. हमें समझ नहीं आ रहा कि किसका भरोसा करें. क्या करें और क्या न करें?’  एक लंबी और बेहद थकाऊ लड़ाई के बाद इन लोगों को टूट जाना चाहिए था. लेकिन ऐसा नहीं है. ये और मजबूती से एक साथ आए हैं. अपने अधिकारों के लिए. अपनी रोजी-रोटी के लिए. सुरेश कौशिक कहते हैं, ‘देखिए, कोई और रास्ता भी नहीं था. हम जान दे नहीं सकते थे. सो हमने लड़ने का फैसला किया. हम लड़ रहे हैं. रोज. घर के भीतर भी और बाहर भी. पता नहीं क्या होगा. लेकिन अब तो लड़ना भी नहीं छोड़ सकते. इसकी भी आदत हो गई है.’

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