हरप्रीत कौर की अजब कहानी

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2012 में निर्भया बलात्कार मामले के बाद लाखों लोग सड़क पर उतर आए थे. फोटो: विकास कुमार

यह पत्र हरप्रीत के बलात्कार की कहानी को बिलकुल अलग दिशा में मोड़ देता है. इस संबंध में पूछने पर हरप्रीत पहले तो इस बात से इनकार करती हैं कि वे कभी नौनिहाल सिंह से होटल में मिली थी. लेकिन उन्हीं का दिया और हस्ताक्षर किया हुआ पत्र दिखाने पर वे इस बात को स्वीकार करती हैं. हरप्रीत बताती हैं, ‘2011 में मैंने ही होटल में कमरा बुक करवाया था. वहां नौनिहाल सिंह आया और मैंने वीडियो भी बनाई. वह वीडियो आज भी मेरे पास है. लेकिन मैं गुरुग्रंथ की कसम खाती हूं कि 2010 में नौनिहाल ने मेरा बलात्कार किया था और उससे पहले हमारे कोई शारीरिक संबंध नहीं रहे हैं.’ हरप्रीत का यह बयान भी उस पत्र में लिखी बातों से मेल नहीं खाता जिसमें उन्होंने कहा था कि नौनिहाल सिंह 2001 से ही उनका बलात्कार कर रहा है. तहलका ने जब हरप्रीत के मामले में और जानकारी जुटाई तो यह तथ्य भी सामने आया कि यह मामला बलात्कार का नहीं बल्कि हरप्रीत द्वारा नौनिहाल सिंह को बदनाम करने का है.

पिछले साल जब निर्भया आंदोलन के दौरान हरप्रीत दिल्ली आई थी तो सबसे पहले उनकी मुलाकात भगत सिंह क्रांति सेना के तेजिंदर बग्गा से हुई थी. तेजिंदर बताते हैं, ‘हमने शुरुआत में उनकी मदद की. उन्हें कई संस्थाओं से भी मिलवाया. फिर हमें उन पर कुछ शक हुआ तो हम खुद ही पीछे हट गए. वे कभी कहती थीं मेरा बलात्कार हुआ है, कभी कहती मैंने सीडी बनाई है और कभी कहती थी कि मैंने तीन बार सीडी बनाई है.’ तेजिंदर सवालिया अंदाज में कहते हैं, ‘कोई महिला अपने बलात्कार की तीन बार सीडी कैसे बना सकती है?’

तेजिंदर के अलावा हरप्रीत की मुलाकात रिची लुथारिया से भी हुई थी. रिची निर्भया आंदोलन के दौरान जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकरियों का नेतृत्व करने वालों में से एक थे. रिची से जब हरप्रीत के बारे में पूछा गया तो वे बताते हैं, ‘उस महिला का मामला पूरी तरह से झूठा है. हमें भी शुरू में उनके आंसू देख कर धोखा हुआ और हमने उनका साथ दिया. कई छात्रों ने तो हरप्रीत की कहानी सुनकर नुक्कड़ नाटक भी तैयार किया. जंतर मंतर से लेकर शहर के कोने-कोने में छात्रों ने हरप्रीत के समर्थन में नुक्कड़ नाटक किए. मैं खुद हरप्रीत को लेकर मानवाधिकार आयोग भी गया था. लेकिन जब भी मैं उनसे उनके दस्तावेज मांगता था वे किसी बहाने से टाल देती थीं. उस समय निर्भया आदोलन अपने चरम पर था और हम बहुत ज्यादा व्यस्त थे. इसलिए हमें भी कभी इतना समय नहीं मिला.’ रिची आगे बताते हैं, ‘अप्रैल के बाद जब आंदोलन सफल हो गया तब मैंने हरप्रीत के दस्तावेजों को ध्यान से देखा. उनसे मुझे पता चला कि इनमें कहीं बलात्कार का जिक्र ही नहीं है. हरप्रीत मुझसे कहने लगीं कि किसी तरह पुराने कागजों में भी बलात्कार का जिक्र जोड़ दो. मुझे बड़ी हैरानी हुई और मैंने उनसे कहा कि मैं तुम्हारा साथ नहीं दूंगा. मैं समझ गया कि वह कोई पीड़ित नहीं है बल्कि ब्लैकमेल करने के लिए या किसी अन्य दुर्भावना से बलात्कार का ढोंग कर रही है. मैंने निर्भया आंदोलन के फेसबुक पेज पर इस बारे में लिखा भी था. इसके बाद तो हरप्रीत ने मुझ पर हमला करवा दिया. अपने कुछ गुंडों के साथ उसने मेरे कपड़े फाड़ दिए और मुझे मारा. मैंने संसद मार्ग थाने में हरप्रीत से जान का खतरा बताते हुए रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी.’

तहलका ने जब आईपीएस अफसर नौनिहाल सिंह से उन पर लग रहे आरोपों के बारे में पूछा तो उनका कहना था, ‘इस मामले की 15-16 बार अलग-अलग स्तर पर जांच हो चुकी है. मैंने हर बार जांच में पूरा सहयोग किया है. यह मामला उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक जा चुका है लेकिन कभी कुछ नहीं निकला. उस महिला का या तो मानसिक संतुलन ठीक नहीं है या फिर उसके पीछे कुछ अन्य लोग हैं जो मुझे बदनाम करना चाहते हैं.’ यह पूछे जाने पर कि वे हरप्रीत के खिलाफ मानहानि का मुकदमा क्यों नहीं करते नौनिहाल सिंह बताते हैं, ‘मुझे जिस भी जांच में अपनी बात रखनी थी मैंने रखी है. मेरे परिवार के लोग मुझ पर विश्वास करते हैं इसके अलावा मुझे किसी बात से फर्क नहीं पड़ता.’ नौनिहाल सिंह हरप्रीत के बारे में बताते हैं, ‘उसकी पहली शिकायत पर सबसे पहले मैंने ही जांच के आदेश दिए थे. तब उसकी शिकायत थी कि कुछ पुलिस वालों ने उससे मारपीट की है. मुझे अपने सूत्रों से पता चला है कि हरप्रीत गांव के लोगों से पुलिस में भर्ती कराने के नाम पर पैसे लेती थी. उसने मेरे नाम पर भी कई लोगों से पैसे लिए. जब लोगों की भर्ती नहीं हुई और लोग उससे सवाल करने लगे तो उसने मुझ पर ही ऐसे आरोप लगा दिए.’

निर्भया आंदोलन से जुड़े रहे और हरप्रीत के मामले को नजदीक से देख चुके एक सामाजिक कार्यकर्ता नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘हरप्रीत कई बार यह जिक्र कर चुकी हैं कि उसके पास नौनिहाल सिंह की कोई वीडियो है. शायद यही कारण है कि नौनिहाल हरप्रीत के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करते. कानूनन तो हरप्रीत ऐसा कुछ भी नहीं कर सकतीं जिससे नौनिहाल  पर कोई आंच आए. यह बात नौनिहाल भी अच्छे से जानते हैं. लेकिन यदि उन्होंने हरप्रीत के खिलाफ कोई कार्रवाई की और वह वीडियो सार्वजनिक हो गया तो नौनिहाल सिंह ज्यादा बदनाम होंगे. हरप्रीत का भी उद्देश्य प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाना नहीं है. यदि ऐसा होता तो वे कभी भी कोर्ट में जाकर शिकायत दर्ज करवा सकती थीं. ऐसा करते ही मामले की सुनवाई शुरू हो जाती. लेकिन वे जानती हैं कि उन्हें भी कोर्ट से कुछ नहीं मिलेगा. इसलिए वे बस समाज के बीच पीड़िता बनी रहना चाहती हैं और नौनिहाल सिंह को ऐसे ही बदनाम करना चाहती हैं.’

हरप्रीत के दस्तावेजों के आधार पर दिल्ली उच्च न्यायालय के अधिवक्ता गौरव गर्ग बताते हैं, ‘दस्तावेजों से यह मामला पहली नजर में ही झूठा प्रतीत होता है. यह किसी भी तरह से बलात्कार का मामला नहीं है. लेकिन यह भी सही है कि बलात्कार की शिकायत पर प्रथम सूचना रिपोर्ट का दर्ज न होना कहीं से भी सही नहीं ठहराया जा सकता. भारतीय दण्ड संहिता में हुए हालिया संशोधन के बाद तो बलात्कार जैसे गंभीर मामलों में प्रथम सूचना दर्ज करना आनिवार्य हो गया है. इनकार करने पर पुलिस वालों के खिलाफ धारा 166ए (सी) के तहत कार्रवाई की जा सकती है जिसमें दो साल तक की सजा का भी प्रावधान है. रिपोर्ट दर्ज करने के बाद जांच में यदि मामला झूठा निकले तो उल्टा शिकायतकर्ता पर धारा 211 के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है.’ गौरव आगे बताते हैं, ‘बलात्कार के मामलों में दो तरह की गड़बड़ियां देखने को मिलती हैं. एक, प्रभावशाली लोगों के खिलाफ पुलिस मामला दर्ज ही नहीं करती. दूसरा, यदि रिपोर्ट दर्ज हो जाए तो पुलिस तुरंत ही आरोपित को गिरफ्तार कर लेती है. कानूनन प्रथम सूचना दर्ज करना अनिवार्य है, गिरफ्तारी नहीं. ऐसी गिरफ्तारी ही बलात्कार संबंधी कानूनों के दुरूपयोग को जन्म देती है.’

बीते कुछ समय में ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं जहां बलात्कार के आरोप कई बड़े नामों पर लगे हैं. लेकिन इन सभी में व्यक्तियों के अनुसार कानून को बदलते भी साफ देखा जा सकता है. मसलन तरुण तेजपाल पर जब आरोप लगा था तो पीड़िता के पुलिस तक पहुंचने से पहले ही गिरफ्तारी की मांग शुरू हो गई थी और जल्द ही गिरफ्तारी भी हुई. वहीं जब ऐसा ही आरोप जस्टिस गांगुली पर लगा तो गिरफ्तारी तो दूर उन्होंने मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से इस्तीफा तक नहीं दिया. ठीक ऐसे ही जब आसाराम ने न्यायालय से अपने मामले की मीडिया रिपोर्टिंग पर रोक लगाने की मांग की तो न्यायालय ने उनकी मांग को ठुकरा दिया. वहीं जब सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश पर बलात्कार का आरोप लगा तो सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं ही मीडिया को आरोपित का नाम तक प्रकाशित करने से प्रतिबंधित कर दिया.

गिरफ्तारी के संबंध में ‘अमरावती बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ का फैसला बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है. यह फैसला इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा 2004 में दिया गया था. जस्टिस मार्कंडेय काट्जू की अध्यक्षता में सात न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ ने इस फैसले में कहा था, ‘दुर्भाग्यवश हमारे देश में जब भी किसी संज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज होती है तो पुलिस तुरंत जाकर आरोपित को गिरफ्तार कर लेती है. हमारी नजर में ऐसा करना गैर कानूनी है. यह संविधान के अनच्छेद 21 में दिए गए मौलिक अधिकार का भी हनन है.’ इसी फैसले में संवैधानिक पीठ ने कहा है, ‘यदि प्रथम सूचना रिपोर्ट या शिकायत में संज्ञेय अपराध के होने की बात का खुलासा होता भी है तो भी गिरफ्तारी अनिवार्य नहीं है.’ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय भी सही ठहरा चुका है. लेकिन इस फैसले में दिए गए निर्देश किताबों तक ही सिमट कर रह गए हैं.

पुरुष अधिकारों के लिए काम करने वाली एक संस्था ‘सेव इंडियन फैमिली फाउन्डेशन’ के संस्थापक सदस्य राजेश वखारिया बताते हैं, ‘सिर्फ लड़की के बयान को ही परम सत्य मानते हुए आरोपित को गिरफ्तार करना एकदम गलत है. लेकिन आज सारे देश में यही होता है. इसमें मीडिया भी दोषी है. आरोप लगते ही मीडिया किसी को भी बलात्कारी घोषित कर देता है. ऐसे में जज पर भी इतना सामाजिक दबाव बन जाता है कि वे आसानी से जमानत भी नहीं देते. यही सब बातें झूठे बलात्कार के मामले दर्ज करने वालों को बढ़ावा देती हैं. ऐसे लोग जानते हैं कि उनकी एक शिकायत भर से आरोपित तुरंत गिरफ्तार होगा और उसे जमानत भी नहीं मिलेगी.’ राजेश आगे बताते हैं, ‘निर्भया मामले के बाद कानूनों को एक-तरफा मजबूती दी गई है. इससे फर्जी मामलों की बाड़ सी आ गई है.’

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े भी राजेश की इन बातों का काफी हद तक समर्थन करते हैं. दिल्ली में 2012 में जहां बलात्कार के मामलों में 46 प्रतिशत लोग ही बरी हुए थे वहीं 2013 के शुरुआती आठ महीनों में यह आंकड़ा बढ़कर 75 प्रतिशत हो गया. इसका मतलब है कि इस दौरान दिल्ली में सिर्फ 25 प्रतिशत आरोपितों को ही सजा हुई है और बाकी सब बरी हुए हैं. हालांकि इन आंकडों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि बरी होने वाले सभी 75 प्रतिशत मामले झूठे ही थे. लेकिन कई न्यायाधीशों के फैसलों और टिप्पणियों से झूठे मामलों की पुख्ता जानकारी जरूर मिलती है.

दिल्ली के एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र भट्ट ने तो कुछ समय पहले यह तक कहा था कि दिल्ली इसलिए ‘रेप कैपिटल’ कहलाती है क्योंकि यहां झूठे बलात्कार के कई मामले दर्ज होते हैं. इसका कारण बताते हुए राजेश वखारिया कहते हैं, ‘जस्टिस वर्मा कमेटी के सुझावों पर जो संशोधन कानून में किए गए हैं वो विवेकशील नहीं बल्कि भावनात्मक होकर किए गए.’ निर्भया मामले के बाद जब सारा देश बलात्कार संबंधी कानूनों को कठोर करने की मांग कर रहा था तब भी राजेश और उनकी संस्था के लोग यह बात उठा रहे थे कि इन कानूनों को ऐसा न बना दिया जाए कि इनका दुरूपयोग बढ़ जाए. राजेश बताते हैं, ‘हमने हजारों सुझाव वर्मा कमेटी को भेजे थे. हमारी मुख्य मांग थी कि बलात्कार और यौन अपराधों के कानून लैंगिक आधार पर तटस्थ हों. साथ ही बलात्कार के झूठे मुकदमे करने वालों को भी सजा देने का प्रावधान बने. लेकिन उस वक्त सारा देश भावनाओं में बहकर कुछ सुनना नहीं चाहता था. आज परिणाम सबके सामने हैं.’ बलात्कार के झूठे मामलों पर टिप्पणी करते हुए इसी साल दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जीपी मित्तल ने कहा था, ‘बलात्कार पीड़िता को बहुत ज्यादा पीड़ा और अपमान सहना पड़ता है. लेकिन ठीक इसी तरह बलात्कार के झूठे आरोप लगाए जाने पर आरोपित को भी उतनी ही पीड़ा और अपमान का सामना करना पड़ता है. झूठे बलात्कार के मुकदमों से किसी आरोपित को बचाने की भी पूरी कोशिश की जानी चाहिए.’

मई 2013 में दिल्ली उच्च न्यायालय के जस्टिस कैलाश गंभीर ने भी यह माना है कि ‘बलात्कार संबंधी कानूनों को दुर्भावना से एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है.’ जस्टिस गंभीर के इस बयान का समर्थन करते दर्जनों मामले पिछले कुछ समय में सामने भी आए हैं. इसी साल दिल्ली के एक युवक को बलात्कार के आरोप से बरी करते हुए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र भट्ट ने कहा था, ‘बलात्कार के झूठे आरोप में फंसे व्यक्ति को राज्य द्वारा या शिकायतकर्ता द्वारा मुआवजा दिए जाने की व्यवस्था होनी चाहिए.’ इस मामले में आरोपित व्यक्ति पर उसकी मकान मालकिन द्वारा बलात्कार का आरोप लगाया गया था. बाद में महिला ने यह स्वीकार किया कि उसने यह आरोप इसलिए लगाया क्योंकि उसके पति को आरोपित से उसके संबंधों के बारे में पता चल गया था. राजेश वखारिया बताते हैं, ‘यह कमी हमारे कानून की ही है कि कोई महिला अपनी सहमति से संबंध बनाने के बाद कभी भी बलात्कार का मुकदमा करने के लिए आजाद है. बलात्कार के ज्यादातर फर्जी मामले ऐसे ही हैं जहां पहले तो लड़का-लड़की साथ रहते हैं और बाद में यदि उनके रिश्ते में खटास आई तो लड़की बलात्कार का मुकदमा कर देती है.’ राजेश आगे कहते हैं, ‘आजकल लाखों युवा लिव-इन में रहते हैं. ऐसे में यदि लड़की शादी से इनकार कर दे तो सब ठीक रहता है. लेकिन लड़के ने शादी से इनकार किया तो लड़की मुकदमा कर देती है और लड़का बलात्कारी हो जाता है. यदि लड़कों को भी ऐसे मामले में लड़कियों पर बलात्कार का मुकदमा करने का अधिकार हो तो उतनी ही लड़कियां भी बलात्कारी घोषित हो सकती हैं.’

शादी के वादे से मुकरने पर बलात्कार का मुकदमा दर्ज होने के सैकड़ों मामले इन दिनों न्यायालयों में लंबित हैं. इस मामले में न्यायाधीशों की राय भी अलग-अलग हैं. बीते दिसंबर ऐसे ही एक मामले में आरोपित को बरी करते हुए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धर्मेश शर्मा ने माना था कि ‘जब आरोपित को लड़की की कुछ अनुचित बातों का पता लगा तो उसके पास शादी से इनकार करने का वाजिब कारण था.’ दूसरी तरफ ऐसे भी कई मामले हैं जहां शादी का वादा करके शारीरिक संबंध बनाने और बाद में शादी से इनकार करने को न्यायाधीशों ने बलात्कार माना है. इसके अलावा ऐसे मामलों की भी लंबी-चौड़ी सूची मौजूद है जहां पैसे ऐंठने, बकाया वसूलने, जमीन जायदाद के झगड़े निपटाने या विवाहेत्तर संबंधों के कारण बलात्कार के झूठे मुकदमे दर्ज किए गए हों. दिल्ली में ही न्यायाधीश रेनू भटनागर ने पिछले साल एक ऐसे आरोपित को बलात्कार के मुकदमे में बरी किया था. इस मामले में जमीन के झगड़े के चलते आरोपित पर बलात्कार का झूठा मुकदमा दर्ज किया गया था.

कानून के दुरुपयोग पर अधिवक्ता गौरव गर्ग बताते हैं, ‘बलात्कार के मामलों में सहमति सबसे अहम मुद्दा होता है. ऐसे मामलों में कानून का दुरुपयोग भी उसे ही कहा जाता है जब सहमति से संबंध बनाने के बाद महिला इस बात से मुकर जाए कि उसने सहमति दी थी. या महिला यह कहे कि उसकी सहमति किसी दबाव में या किसी झूठे वादे के चलते ली गई थी. अधिकतर मामलों में आरोपितों के बरी होने का भी यही कारण है. न्यायालय में जिरह के दौरान या तो पीड़िता स्वयं ही यह स्वीकार कर लेती है या किसी अन्य माध्यम से यह साबित हो जाता है कि उसने स्वयं ही सहमति दी थी.’

इस संबंध में मनोवैज्ञानिक रजत मित्रा एक साक्षात्कार में बताते हैं, ‘अधिकतर बलात्कार के मामलों में पीड़िता परामर्श के दौरान यह बात स्वीकार कर लेती है कि उसने संबंध बनाने की सहमति दी थी. लेकिन यही बात वे अपने माता-पिता के सामने स्वीकार नहीं कर पातीं.’ वखारिया इस बारे में कहते हैं, ‘सहमति से संबंध बनाने के बाद महिलाएं कई कारणों से बाद में मुकर जाती हैं. समाज का डर, माता-पिता का दबाव या विवाहेत्तर संबंधों में पति को ऐसे रिश्तों का पता चलने पर कई महिलाएं बलात्कार का आरोप लगाने को ही आसान विकल्प के तौर पर चुन लेती हैं.’ राजेश आगे बताते हैं, ‘बलात्कार बहुत ही गंभीर अपराध है. लेकिन इसका झूठा आरोप लगाना भी उतना ही बड़ा अपराध है. इससे आरोपित का जीवन तो हमेशा के लिए प्रभावित होता ही है साथ ही न्यायालय में मुकदमों की संख्या में भी अनावश्यक बढ़ोत्तरी होती है. ऐसे में उन लोगों को न्याय मिलने की भी उम्मीद कम हो जाती है जिनके साथ सच में ये भयानक हादसे होते हैं. हमारी संस्था इसीलिए यह मांग करती आई है कि बलात्कार के झूठे मामले दर्ज करने वालों को गंभीर सजा मिलनी चाहिए. इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हर उस मामले में शिकायतकर्ता को सजा हो जाए जिसमें आरोप सिद्ध न हुए हों. लेकिन जिन मामलों में यह साफ साबित हो कि पूरा आरोप या मुकदमा ही झूठा था वहां तो सख्त सजा होनी ही चाहिए. जब तक हमारे कानून संतुलित नहीं होंगे तब तक उनका उपयोग भी संतुलित नहीं हो सकता.’

बलात्कार संबंधी कानूनों में भले ही संतुलन न हो लेकिन हरप्रीत कौर का मामला कई तरह से संतुलित जरूर है. एक तरफ हरप्रीत महीनों से जंतर मंतर पर बैठी हैं लेकिन न्यायालय जाकर अपनी शिकायत दर्ज नहीं करवाती. दूसरी तरफ नौनिहाल सिंह भी एक-एक कर सभी जांच अधिकारियों को अपना जवाब देते हैं लेकिन हरप्रीत पर मानहानि का मुकदमा नहीं करते. शायद इसलिए कि इस विचित्र मामले में इससे आगे बढ़ने पर दोनों ही पक्षों की हार है.

1 COMMENT

  1. Initially she made complaint against a few police officers for manhandling her along wih two others to the SSP. The SSP suspended police officers. This matter became media hyped. But soon investigation went against her. She was compelling police for interference in civil matter of money. हरप्रीत यही मामला लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक भी पहुंचीं लेकिन वहां से भी उनकी याचिका खारिज हुई. चंडीगढ़ में हरप्रीत के वकील रहे फरियाद सिंह बताते हैं, ‘हरप्रीत ने बलात्कार की कोई बात नहीं की थी. उन्होंने सिर्फ सुरक्षा मांगी थी लेकिन वो याचिका खारिज हो गई थी.
    But now she has tried her luck by raising rapes charges. He is not a common man. She could not frame him in a rape case. But such a lady will quit only when she will find counterclaim by this IPS officer.

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