एक अस्वस्थ परंपरा की शुरुआत

1
372

उदाहरण के तौर पर सर्वोच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति की अलग तरह की व्यवस्था है – जिसे वर्तमान सरकार ने कुछ और बेहतर बना दिया है, उनका कार्यकाल निश्चित है और सर्वोच्च न्यायालय का खर्चा देश के कंसॉलिडेटेड फंड से आता है. इसके अलावा सर्वोच्च अदालत अपना स्टाफ खुद नियुक्त करती है, इसकी शक्तियों को कोई छीन नहीं सकता और इसके क्रियाकलापों की चर्चा किसी विधायिका और संसद में नहीं की जा सकती. न्यायपालिका और कार्यपालिका को एक-दूसरे से अलग रखने की व्यवस्था भी इसी वजह से की गई है. संविधान के अनुच्छेद 124(7) में यह भी प्रावधान है कि सर्वोच्च न्यायालय का कोई भी अवकाशप्राप्त जज भारत की किसी भी अदालत में या प्राधिकरण के समक्ष जिरह या उसमें कार्य नहीं कर सकता.

अब इतने तरह के प्रावधानों से सुरक्षित-संरक्षित सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों में से एक को –वह भी पूर्व मुख्य न्यायाधीश– सरकार ने एक राज्य का राज्यपाल बना दिया है. ऐसे में कोई जज गवर्नर बनने के लालच में अपने कार्यकाल के आखिर में कुछ गड़बड़ी कर सकता है, ऐसी आशंका से कैसे इनकार किया जा सकता है. इंदिरा गांधी के समय ऐसे उदाहरण मिलते ही हैं जब दो जजों को बिना बारी के देश का मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया था.

हालांकि कई ऐसे कानून हैं जो सर्वोच्च और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को सेवानिवृत्ति के बाद अहम पदों पर नियुक्त करने का काम करते हैं जैसे कि उपभोक्ता संरक्षण कानून और मानवाधिकार सुरक्षा कानून. लेकिन इन पदों का कार्य न्यायपालिका के कार्य से मिलता-जुलता ही है और दूसरा एक बार नियुक्ति के बाद इन पर कार्यपालिका के दखल की गुंजाइश भी न के बराबर है.

दूसरी ओर राज्यपाल का पद घोषित तौर पर संवैधानिक होते हुए भी असल में राजनीतिक ही है. राष्ट्रपति के माध्यम से नियुक्त करके केंद्र सरकार कभी भी राज्यपाल को हटा सकती है. यानी कि किसी का गवर्नर बनना और बने रहना सरकार की इच्छा पर ही निर्भर करता है. इसीलिए सीबीआई के अलावा राज्यपालों का भी केंद्र सरकारों ने अपने राजनीतिक विरोधियों को ठिकाने लगाने के लिए सबसे ज्यादा दुरुपयोग किया है.

किसी लोकतंत्र में न केवल संविधान के मुताबिक चलना जरूरी है बल्कि समय-समय पर उसमें अनुपस्थित व्यवस्थाओं के लिए स्वस्थ परंपराएं बनाना भी जरूरी है. ऐसा इसलिए भी है कि आपकी सरकार न सही आगे या उसके भी आगे की सरकार इनके थोड़ा आड़ा-तिरछा होने की आड़ में अपने गलत खेल, खेल सकती हैं. लेकिन मोदी सरकार का यह निर्णय इतनी दूरंदेशी की बात नहीं करता. और पूरी तरह पारदर्शी भी नहीं लगता.

1 COMMENT

  1. बहुत बढ़िया लिखा है संजय जी। आपकी लेखनी और जुझारूपन का कायल हूँ।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here