आतंक का ऑनलाइन चेहरा

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बंदूकों को लेकर ये लगाव 1990 के उस वक्त की याद दिलाता है जब घाटी में आतंकी संगठनों के ढेरों उत्साही अनुयायी हुआ करते थे. हालांकि उनका ये भ्रम जल्दी ही टूट ही गया जब उनके वादे में कही हुई ‘आजादी’ लोगों को नहीं मिली और घाटी में खून-खराबा आम बात हो गई. इसके बाद भी आतंक का दौर जारी रहा पर जिहाद की ये लड़ाई अब तक पाकिस्तान या अफगानिस्तान से आए लड़ाकों के कंधों पर थी. जिहाद लाने के लिए सुसाइड बम और कार विस्फोट करने वाले बाहरी आतंकियों की तुलना में स्थानीय लोगों का प्रतिशत और संगठन में उनकी सहभागिता लगातार कम होती गई. ये इराक और मध्य पूर्व में ये सब दोहराए जाने के बहुत पहले हुआ था. अब जब टेक-सेवी नई पीढ़ी आतंकी संगठनों से जुड़ी है, तस्वीरें और वीडियो अपलोड करने का नया खेल शुरू हुआ है तो लगता है कि एक समय का एक चक्र पूरा हो गया है. घाटी में हथियारबंद संघर्ष की फसल दोबारा खड़ी हो गई है और यहां समस्या सिर्फ आतंकियों में स्थानीयों का बढ़ता प्रतिशत या सोशल मीडिया पर मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं है बल्कि मुठभेड़ में हुई किसी आतंकी की मौत के बाद वहां पसरने वाला व्यापक शोक है.

23 जून को, दक्षिण कश्मीर के कुलगाम में दो आतंकियों- जावेद अहमद भट और इदरीस अहमद के अंतिम संस्कार के समय हजारों की भीड़ जमा हुई जो कश्मीर की आजादी से जुड़े नारे लगा रही थी. जब ये मुठभेड़ चल रही थी तब प्रदर्शनकारियों के एक बड़े समूह ने सुरक्षा दलों पर पथराव करते हुए आतंकियों को भागने में मदद की थी.

कुछ ऐसे ही तथ्यों को रॉ के पूर्व प्रमुख एएस दुलत ने भी अपनी किताब ‘द वाजपेयी ईयर्स’ में शामिल किया है. किताब में 1990 के कश्मीर के बारे में कई चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं. हाल ही में दिए गए एक साक्षात्कार में दुलत ने कहा भी कि कश्मीर फिर 1990 के पहले जैसे हालात में पहुंच गया है. दुलात कहते हैं, ‘1996 में, नेशनल कांफ्रेंस के सत्ता में आने का कारण था कि बाकी किसी ने भी इस चुनाव को गंभीरता से नहीं लिया. आज कश्मीर में वैसे हालात नहीं हैं पर राजनीतिक रूप से देखें तो या तो समय कहीं रुक गया है या हम कुछ आगे निकल गए हैं. जिस तरह का आतंकवाद हम पिछले कुछ समय से देख रहे हैं वह भयावह है. आतंकी संगठनों में जाने वाले ये लड़के अच्छे मध्यम और उच्च वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते हैं और प्रशिक्षित इंजीनियर हैं, तो इन्हें ऐसे संगठनों से जुड़ने की क्या जरूरत है? ये खौफनाक है.’

यहां वानी का मुद्दा प्रमुख है. उसके पिता मुजफ्फर अहमद वानी एक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य हैं. इस संपन्न परिवार का तीन-मंजिला घर ट्राल शहर को जाने वाले मुख्य रास्ते से थोड़ी दूर पर लगभग दो कनाल की जमीन पर बना है. वानी की इस समृद्ध पृष्ठभूमि से आने की बात से आस-पास के इलाकों और घाटी में उसके दोस्तों के बीच उसका रुतबा और बढ़ा ही है.

बुरहान वानी के ‘नायकत्व’ के ऑनलाइन प्रचार के बाद अब दक्षिणी कश्मीर के कुछ हिस्सों और श्रीनगर के बाहरी इलाकों में उसके ‘ग्रैफिटी’ (दीवारों पर बने चित्र या नारे) भी दिखने लगे हैं. श्रीनगर के बाहर पम्पोर में एक दीवार पर लिखा दिखता है, ‘ट्राल, बुरहान जिंदाबाद! वी वांट हिजबुल मुजाहिदीन, तालिबान एंड लश्कर-ए-तैयबा.’

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