इत्ते! उत्ते! कित्ते! से जित्ते! तक

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इधर लड़का अपने बाप के इत्ते-उत्ते की आदत से अब उकता चुका था. उसका पहला प्रबल कारण यह था कि इत्ते-उत्ते के चक्कर में लड़के की जित्ती उम्र निकल चुकी थी, उत्ती उम्र में तो उसे खुद बाप बन जाना चाहिए था. लड़का सोचने लगा पिता जी के इत्ते-उत्ते के चक्कर में तो उसकी शादी की उम्र ही निकली जाएगी. और दूसरा कारण, जो पहले से अधिक प्रबल था, लड़का इश्क की गिरफ्त में था. बुरी तरह से. नहीं… नहीं अच्छी तरह से.

लड़के के बाप को समझते देर न लगी कि बाजी उसके हाथ से निकल चुकी है. लड़का बागी हो चला. थक-हार कर लड़के की शादी वहीं करनी पड़ रही, जहां से इत्ता-उत्ता नहीं मिला. लड़की के बाप ने जित्ता दिया, उत्ते पर ही शादी तय हुई. इधर बारात निकल रही है और उधर लड़के के बाप के अरमानों का जनाजा. उधर विदाई में लड़की वाले आंसू बहा रहे हैं और इधर लड़के का बाप खून के आंसू पी रहा है.

शादी के बाद क्या दिन फिरे! आजकल लड़के का बाप एक गाना ‘मोहब्बत है क्या चीज ये हमको बताओ, ये किसने शुरू की हमें भी बताओ’ खूब सुन रहा है, हां मगर नम आंखों से.लड़के के बाप की इत्ता-उत्ता की आदत भी बदल गई है. अब वो इत्ता-उत्ता कि जगह सबसे जित्ता-जित्ता कहता फिर रहा है. खुद को दहेज का विरोधी बता रहा. ‘दुलहन ही दहेज है’ टर्राता फिर रहा है. हां. मगर वह चाहता है कि सारे जवान लड़कों के बाप उसकी तरह लाचार हो जाए.

कमबख्त इश्क न जाने और कितने लड़कों के बाप के अरमानों के महल को ताश के पत्तों की तरह ढहाएगा. देखते जाइए

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