असम राइफल्स : सेना में सड़ांध

चक्रवर्ती: आपको देना है तो दो नहीं तो भूल जाओ
चक्रवर्ती : (फोन पर) सर एक अच्छी खबर है. मैथ्यू ने आपके हिस्से के 20 हजार दे दिए. (उसके बाद वह फोन मैथ्यू को दे देता है)
ठेकेदार मैथ्यू (फोन पर): सर 30 लाख के बिल में जो भी बकाया था वह सब दे दिया.

एक अधिकारी जिसकी पहचान लेफ्टिनेंट कर्नल गोगोई के रूप में हुई वह मैथ्यू को निर्देश देता है कि वह पैसा उसके अधीनस्थ को सौंप दें.

लेफ्टिनेंट कर्नल गोगोई: यहां काम करना थोड़ा मुश्किल है. थोड़ी जुगत भिड़ानी पड़ती है… मेरा हिस्सा उन साहब को दे दो (एक व्यक्ति की ओर इशारा)

इस पर सूबेदार पी लिंबू अपने वरिष्ठ अधिकारी तथा अपने हिस्से का पैसा लेते हैं.

सूबेदार लिंबू: (पैसा लेते हुए) सर ने क्या कहा?
ठेकेदार: सर ने यह हिस्सा आपको देने को कहा.

बी के सरकार असम राइफल्स के महानिदेशालय के भुगतान और लेखा कार्यालय में वरिष्ठ लेखा अधिकारी हैं. यह लेखा विभाग का सबसे बड़ा पद है. जिस वक्त तहलका की टीम उनके केबिन में घुसी उन्होंने ठेकेदार मैथ्यू के सारे बिल निकाले और अपने हिस्से के पैसे का हिसाब लगाया और कहा कि पहले उनका बकाया निपटाया जाए.

तहलका की पड़ताल से यह भी पता चलता है कि बीते सालों के दौरान इनमें से कुछ अधिकारियों ने अवैध रूप से बहुत अधिक संपत्ति एकत्रित कर ली है. सूत्रों के मुताबिक असम राइफल्स के एक वरिष्ठ अधिकारी कथित तौर पर पूर्वोत्तर में इसी अवैध कमाई से एक पांचसितारा होटल बनवा रहे हैं.

तहलका को मिली जानकारी के मुताबिक इंफाल के करीब एक शिविर को जल्द ही खाली कराया जा रहा है ताकि एक नया शिविर बनाने के लिए परियोजना को मंजूरी दी जा सके. ऐसा करके और अधिक धन बनाया जा सकेगा. इसी तरह अनेक ऐसी परियोजनाएं हैं जो फिजूल में चल रही हैं.

एक और स्तब्ध करने वाली बात यह है कि एक ठेकेदार ने असम राइफल्स के शिविर के भीतर ही अपना गोदाम बना रखा है. उसका दावा है कि उसने डीआईजी की मंजूरी ली है. इसका इस्तेमाल निर्माणा सामग्री तथा अन्य उपकरण रखने के लिए किया जाता है. हालांकि नियमानुसार किसी शिविर का इस्तेमाल ऐसे काम में नहीं किया जा सकता. यह पूरी तरह अवैध है. एक ठेकेदार सुरेश ने तो कैमरे पर ही यह भी स्वीकार किया कि उसने इस संवेदनशील क्षेत्र में डीआईजी की इजाजत से यह निर्माण अपने निजी इस्तेमाल के लिए किया है.

ठेकेदार सुरेश: यह पूरा इलाका एकदम शुरुआत से ही हमने बनाया है. मैंने यह इलाका ले रखा है, मुझे इसके लिए डीआईजी की अनुमति हासिल है.

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उत्तर-पूर्व के रक्षक

अंग्रेजों ने 1835 में असम में एक अर्द्ध सैन्यबल की स्थापना की थी. इसका काम था कछारी जमीन को पहाडों पर वास करने वाली ‘जंगली जनजातियों’ से बचाना. इसे बीच में बल को कई नाम दिए गए जैसे असम फ्रंटियर पुलिस (1883), द असम मिलेटरी पुलिस (1891) और ईस्टर्न बंगाल एंड असम मिलेटरी पुलिस (1913). प्रथम विश्व युद्ध में इस बल के योगदान के बाद इसे 1917  में असम राइफल्स नाम दिया गया. क्षेत्र में असम राइफल्स से जुड़ाव के कारण इस बल को  ‘उत्तर-पूर्व के रखवाले’ और  ‘पहाड़ी लोगों के मित्र’ जैसे नामों से नवाजा जाता रहा है. आज असम राइफल्स में 46 बटालियन हैं और इन्हें आंतरिक सुरक्षा के साथ-साथ भारत-म्यांमार सीमा की रखवाली की जिम्मेदारी दी गई है.

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अतीत में भी असम राइफल्स के ताकतवर और रसूखदार लोगों पर वित्तीय अनियमितताओं के इल्जाम लगते रहे हैं लेकिन वे मामले किसी तार्किक परिणति तक नहीं पहुंच सके. इससे खुफिया विभाग और सतर्कता विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठते हैं. लेकिन एक सवाल जिससे हर किसी को चिंतित होना चाहिए वह यह कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले पर इन लालची अधिकारियों का भरोसा कैसे किया जाए? क्या देश बाहरी दुश्मनों के नापाक इरादों से सुरक्षित है?

इन अवैध गतिविधियों का असम राइफल्स जैसी संस्था पर असर पड़ना तय है. भ्रष्टाचार में जो लोग शामिल हैं वे मूलरूप से डेस्क पर यानी कार्यालय में काम करने वाले हैं. इनमें क्लर्क, जेसीओ, इंजीनियर और अन्य अधिकारी हैं. इनके विपरीत अशांत माहौल में अपनी जान जोखिम में डालकर विद्रोहियों से लोहा लेने वालों को इन कार्यालयीन कर्मियों की तुलना में कम वेतन मिलता है.

हो सकता है असम राइफल्स के जवानों के लिए विपरीत परिस्थितियों में विद्रोहियों से मुकाबला अब भी आसान हो. लेकिन उनका मनोबल बनाए रखने के लिए जरूरी है कि सरकार इस संस्थान में अमरबेल की तरह फैल चुके भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए जल्दी से सख्त कदम उठाए.

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2 COMMENTS

  1. एकदम सही पड़ताल है । मैं तो यह कहूँगा कि इस बल में आर्मी का डेप्यूटेशन बंद कर दिया जाना चाहिए । आर्मी आफिसर इसे दुधारू गाय समझते हैं । असम राइफल्स का जवान विपरीत परिस्थितियों के साथ-साथ सेना के अधिकारियों का हमेशा शिकार होता है । असम राइफल्स कैडर के अधिकारियों के साथ भेदभाव भी करते हैं सेना के अधिकारी ।

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