गांधी के आदि अनुयायी

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खेड़ेया इतिहास की बातें बताते हैं. टाना भगत समुदाय के पुरोधा जतरा टाना भगत और गांधीजी में मुलाकात तक नहीं हुई थी. जब गांधीजी झारखंड पहुंचकर बेड़ो में तीन दिन के लिए रुके थे, उसके बहुत पहले ही जतरा टाना भगत दुनिया से विदा हो चुके थे. गांधी बेड़ो पहुंचे तब उन्हें इस समुदाय की गतिविधियों के बारे में मालूम हुआ, जो बहुत पहले से ही अपने तरीके से सत्य-अहिंसा के प्रयोग के साथ अंग्रेजों को लगान न देकर देशभक्ति की लड़ाई लड़ रहा था. खेती में कपास उगाकर अपने कपड़े भी खुद तैयार करता था. खेड़ेया कहते हैं, ‘पहले हमारे समुदाय का झंडा सादा हुआ करता था, वेश भी साधा, जीवन भी सादा, लेकिन गांधीजी के आग्रह पर हमारे समुदाय ने सादे झंडे को चरखाछाप तिरंगे में बदला और बाद में हम गांधी के ही हो गए, अब तक हैं, कोशिश होगी कि हमेशा रहें भी.’

खेड़ेया आखिरी वाक्य भी एक लय में बोल जाते हैं कि कोशिश करेंगे कि गांधी की राह पर ही समुदाय की आने वाली पीढ़ी भी चले और उन्हीं की होकर रहे. लेकिन उनके इस कहे में भविष्य के प्रति एक आशंका का भाव दिखता है. टाना भगत समुदाय के लोग नहीं बताते लेकिन हमें जानकारी मिलती है कि नई पीढ़ी का जुड़ाव अपनी परंपरा से कम होता जा रहा है. इसकी कई वजहें बताई जाती हैं. एक तो  ये आदिवासी समुदाय से आते हैं, आदिवासियों के बीच ही रहते हैं जिनमें बलि प्रथा की एक महत्वपूर्ण विधि है. हालांकि टाना भगतों के प्रभाव में आकर कई आदिवासी भी अब दूध-अनाज की बलि देने लगे हैं, लेकिन यह संख्या बहुत कम है. दूसरा, आदिवासी समुदाय में हंड़िया पीना भी एक परंपरा है, जिससे बचना नई पीढ़ी के लिए इतना आसान नहीं. इन सबके साथ इस खास समुदाय को बचाने-बढ़ाने के लिए सरकारी स्तर पर वह नहीं हुआ जिसकी दरकार थी. आजादी के इतने साल बाद नीलाम जमीन मिलने की प्रक्रिया का शुरू होना एक बड़ी विडंबना तो दिखाता ही है, और भी कई चीजें हैं जिनसे इनकी उपेक्षा का अनुमान लगाया जा सकता है.

1982 में सीसीएल कंपनी द्वारा टाना भगत समुदाय के बेरोजगार नौजवानों को प्रशिक्षित करने के लिए आईटीआई की शुरुआत हुई थी, लेकिन यह संस्थान तीन साल चलकर अचानक बंद हो गया. क्यों, इसका जवाब किसी के पास नहीं. रांची जिले के सोनचिपी, गुमला जिले के चापाटोली और लोहरदगा जिले के बमनडीहा में एक समय टाना भगत आवासीय विद्यालयों की स्थापना हुई थी लेकिन बकौल गंगा टाना भगत, अब वे विद्यालय भी सामान्य आदिवासी आवासीय विद्यालय की तरह चल रहे हैं और वहां टाना भगत समुदाय के बच्चों की संख्या न के बराबर है. इस समुदाय की ऐसी ही कई अन्य समस्यााएं और चुनौतियां हैं. जाहिर-सी बात है कि यदि परंपरा से नई पीढ़ी को जोड़ने वाली कोई योजना नहीं रहेगी तो इस समुदाय का इतिहास बनना तय है. इनकी संख्या अभी कितनी है, यह पक्का नहीं लेकिन अखिल भारतीय टाना भगत विकास परिषद के अनुसार इनकी जनसंख्या 44 हजार है.

‘टाना भगत समुदाय की बसाहट जहां-जहां है, वहां नक्सलियों का प्रभाव कम हुआ है. कई नक्सली इनके प्रभाव में आकर गांधी की राह अपना चुके हैंसमाजशास्त्री डॉ एस नारायण ने टाना भगतों की जमीन वापसी में अहम भूमिका निभाई है. उन्हें टाना भगत भी बहुत सम्मान देते हैं. इस समुदाय पर व्यापक सामाजिक शोध करने वाले डॉ नारायण कहते हैं, ‘बात इनकी संख्या की नहीं, इनमें संभावनाओं की है. सरकार उन संभावनाओं को नहीं देख रही है. यह गांधी के सिद्धांत सत्य, अहिंसा आदि को जीवंतता के साथ आज भी जीने वाला दुनिया का इकलौता समुदाय है.’ डॉ नारायण आगे बताते हैं, ‘इस समुदाय की बसाहट जहां-जहां है, वहां नक्सलियों का प्रभाव कम हुआ है. कई नक्सली इनके प्रभाव में आकर गांधी की राह अपना चुके हैं और यह तय है कि अगर इन टाना भगतों को समूह में नक्सल प्रभावित इलाकों में ले जाकर बसाया जाए तो ये अपनी जीवनशैली, निष्ठा से नक्सल प्रभाव कम करने में सक्षम हैं.’ नारायण कहते हैं कि उन्होंने इस बाबत केंद्रीय गृह मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट सौंपकर सलाह दी है. इस पर आगे क्या होता है, यह देखा जाना बाकी है.

टाना भगतों से और भी ढेरों बातें होती हैं. आखिर में हम खक्सीटोली गांव पहुंचते हैं, जहां एक टोली में जतरा टाना भगत की बड़ी प्रतिमा लगी है. सामने तीन चरखाछाप तिरंगे वाला बांस है. खक्सीटोली के बाहरी हिस्से में जाते हैं, जहां हरिवंश टाना भगत समेत 74 स्वतंत्रता सेनानी टाना भगतों के नाम के पत्थर कतार में दिखते हैं. इसी जगह टाना भगत समुदाय के लोग गांधी जयंती हर्षोल्लास से मनाते हैं.

और यहीं अगली कतार में लगे कुछ पत्थर टाना भगतों के साथ राजनीति का खेल भी बयान करते हैं. एक बड़ा शिलापट्ट धाकड़ आदिवासी नेता शिबू सोरेन के नाम का दिखता है जो मुख्यमंत्री रहते हुए शिलान्यास करने आए थे. दूसरे शिलापट्ट पर बड़े गैरआदिवासी कांग्रेसी नेता व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय का नाम दिखता है, जो अनावरण करने गए थे. इसी तरह कई नेताओं के नाम दिखते हैं. वहां तकली से धागा बना रहे बुधुआ टाना भगत मिलते हैं. जिरगा टाना भगत भी मिलते हैं. जिरगा कहते हैं, ‘जिन-जिन नेताओं के नाम लगे हैं, सबने कहा था कि इसे महत्वपूर्ण स्थल बनाएंगे, लेकिन अपने नाम का पट्ट लगाने के बाद इस जगह को याद तक नहीं किया उन्होंने. महत्वपूर्ण स्थल क्या बनाएंगे, एक बाउंड्री वाल तक नहीं दिलवा सके.’

टाना भगतों के साथ राजनीति आगे क्या करेगी, यह अब भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता. टाना भगत पारंपरिक तौर पर कांग्रेस के मतदाता और समर्पित कांग्रेसी कार्यकर्ता रहे हैं. वे कहते हैं कि उन्हें सबसे ज्यादा तवज्जो इंदिरा गांधी ने दी थी. बाद में राजीव गांधी तक टाना भगतों को पार्टी तवज्जो देती रही. लेकिन उसके बाद जंगल में बसे टाना भगतों और दिल्ली में बैठी कांग्रेस की आलाकमानों के बीच संवाद में दूरी आ गई. गंगा टाना भगत कहते हैं, ‘अबकी राहुल गांधी झारखंड आए थे तो दिल्ली बुलाए हैं. जाएंगे, उम्मीद है कि फिर संवाद कायम होगा.’

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