‘हाइपोनेट्रीनिया का तिलिस्म’

मान लें कि ‘हाइपोनेट्रीमिया’ हो ही गया तो मरीज को क्या-क्या होगा? हाइपोनेट्रीमिया के कारण मुख्यत: मस्तिष्क की कोशिकाओं में सूजन आने लगती है. इसीलिए ऐसे मरीज को मुख्यत: न्यूरोजिकल लक्षण प्रकट होते हैं. सिर दर्द, जी मितलाने और थकान से बात शुरू होगी. यदि डॉक्टर ने सही कारण नहीं पकड़ा तो धीरे-धीरे मरीज होश खोने लगेगा. उनींदा रहेगा. फिर पूरा बेहोश भी हो सकता है. उसे मिर्गी जैसे दौरे तक आ सकते हैं जो दिमागी सूजन बेहद बढ़ जाने के द्योतक हैं. यदि इस स्टेज पर भी डॉक्टर को बात नहीं समझ आई और वह बेहोशी को स्ट्रोक, लकवा आदि मानकर चलता चला गया तो मरीज की मृत्यु तक हो सकती है. देखने में छोटी सी सोडियम की इत्ती-सी कमी जान ले सकती है.

हां, यदि समय पर सही डायग्नोसिस बन गई तो पूरा इलाज संभव है. पर मुसीबत यह है कि यह बीमारी प्राय: बड़े ही धीमे धीमे, बिना अन्य किसी चेतावनी के आती है. एक बूढ़ा आदमी कुछ समय से थका थका, सोया सा रहता है- और हम मानते है कि यह सब तो बुढ़ापे में होता ही रहता है. डॉक्टर भी यह मान लेते हैं. (हाइपोथायरायड) के मरीज, डिप्रेशन आदि मानसिक बीमारी के रोगी- यूं ही थके, सोये रहते हैं. वे कब हाइपोनेट्रीमिया में चले गए, पता ही नहीं चलता.

ब्लडप्रेशर में दी जाने वाली कुछ बेहद पापुलर दवाइयां भी धीरे-धीरे हाइपोनेट्रीमिया पैदा कर सकती हैं. डॉक्टर यदि अलर्ट नहीं है तो वह ये दवाइयां जारी रखेगा तथा हाइपोनेट्रीमिया जानलेवा हद तक बढ़ जाएगा. हाइपोनेट्रीमिया का खतरा दुतरफा है, बल्कि तितरफा- एक तो यह कि प्राय: आमजन को इसकी बिल्कुल खबर नहीं है, फिर रक्त में सोडियम लेवल की सटीक तथा विश्वसनीय जांच की व्यवस्था वाली पैथलेब केवल बड़े शहरों में हैं, और तीसरी सबसे खतरनाक बात यह कि प्राय: डॉक्टरों को भी इसकी डायग्नोसिस तथा सही-सही इलाज का सही-सही पता नहीं है. यह मात्र खाने में नमक बढ़ाने से, सेलाइन चढ़ाने से या कोई फैंसी दवा देने से ठीक नहीं हो जाएगी.

फिर क्या करें?

बस, याद रखें कि यदि मरीज बिना किसी जायज कारण के बेहोश-सा, या बेहोश ही हो रहा है, तो यह भी एक कारण हो सकता है. डॉक्टर यदि हाइपोनेट्रीमिया की डायग्नोसिस बोले तो उसकी गंभीरता को समझें. डॉक्टर को ही शेष सब समझने दें. अच्छा डॉक्टर चुनकर सब उस पर छोड़ दें.

भगवान भला करेगा. भगवान के पास और कोई चारा नहीं. न ही आपके पास.

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