पत्रकारिता ‌‌विशेषांक Archives | Page 2 of 2 | Tehelka Hindi — Tehelka Hindi

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लोग गाते-गाते गरियाने लगे हैं!

एक मशहूर टीवी न्यूज चैनल के एंकर ने एक बार मुझे बताया कि अब काम करना बड़ा मुश्किल होता जा रहा है. उनकी हर स्टोरी पर लोग-बाग इस तरह रिएक्ट करते हैं कि लगता है अगर उन्हें वे अकेले पा जाएं तो मार ही दें. यह कहने वाले कोई आम  

फिल्म पत्रकारिता : पैसा दो, प्रशंसा लो

भारतीय सिनेमा बाजार पर अमेरिकी फिल्मों के बढ़ते वर्चस्व की समस्या का निदान निकालने हेतु अंग्रेजों ने 1927-28 में टी. रंगाचारियार की अध्यक्षता में एक सिनेमेटोग्राफ इंक्वायरी कमेटी गठित की. कमेटी का उद्देश्य अमेरिकी फिल्मों के बरक्स ब्रिटिश फिल्मों को बढ़ावा देने पर विचार करना था. इस कमेटी का महत्व  

हिंदी बनाम अंग्रेजी : पत्रकारिता के दो रंग

अपने एक कमरे के छोटे-से किराये के ‘घर’ के दरवाजे पर ताला मारकर मैं दौड़ी-दौड़ी घर के सामने वाले चौराहे पर पहुंची. ‘ब्लू डार्ट’ से मेरे लिए एक लिफाफा आया था. जल्दी से दस्तखत कर कुरियर वाले को पर्ची पकड़ाई और लिफाफा लेकर वापस कमरे की तरफ दौड़ी. लिफाफे के  

मजीठिया पर महाभारत

इस आयोग की सिफारिशें मीडिया कर्मचारियों के लिए सिर्फ सपना बनकर रह गई हैं, जिसे हकीकत बनाने के लिए तमाम मीडिया मालिकान के खिलाफ मुट्ठी-भर पत्रकार ही संघर्ष कर रहे हैं. न्यायपालिका के सख्त आदेशों के बावजूद मीडिया संस्थान इसे लागू करने में आनाकानी कर रहे हैं. सिफारिशें न लागू  

सोशल मीडिया: खबरों की लूट और बंटवारा

एक जमाने में खजाना लूटा जाता था. अस्मत भी लूटी जाती थी. तमाम तरह की लूटों के किस्से सदियों तक तैरते रहते थे. इतिहास को समझना आसान करते थे. लुटेरे इतिहास-कथा के रोचक सूत्रधार थे. आज लुटेरे लुटेरों जैसे नहीं लगते. न्यायप्रिय पदों, कपड़ों, लहजों में वे बिखरे हुए हैं.  

हाथ में कलम, सिर पर कफन

राज्य के पत्रकार नक्सल प्रभावित इलाकों से न सिर्फ समाचार भेजता है बल्कि कई बार तो उन्हें जवानों के क्षत-विक्षत शवों को भी गंतव्य तक पहुंचाना पड़ता है. 17 अप्रैल 2015 की एक घटना है. दक्षिण बस्तर के पामेड़ पुलिस थाने के तहत आने वाले नक्सल क्षेत्र कंवरगट्टा में पुलिस  

आत्म नियमन फेल नियमन की जरूरत

अब ये लगभग सिद्ध हो गया है कि मीडिया उद्योग द्वारा आत्म नियमन के जरिए खुद को दुरूस्त करने के तमाम दावे नाकाम हो चुके हैं. वैसे तो आत्मनियमन हकीकत से ज्यादा रूमानियत भरी कल्पना थी, एक भ्रम था और उसके लिए कोई जरूरी ढांचा तो था ही नहीं इसलिए  

हर शाख पे उल्लू बैठा है

पत्रकारिता के अव्वल, दोयम और फर्जी संस्थानों से हर साल सपनीली आंखों वाले लड़के-लड़कियों के झुंड बाहर निकल रहे हैं. इनमें से बहुतेरे किसी दोस्त, परिचित के हवाले से मुझसे मिलते हैं. कॅरिअर के बारे में सलाह मांगने के बीच में अचानक उतावले होकर बोल पड़ते हैं, सर! कोई नौकरी  

संपादक या तानाशाह

कुछ बरस पहले एक दिन सुबह-सुबह बिंदु (बदला हुआ नाम) का फोन आया. वो बहुत ही घबराई हुई लग रही थी. मुझे थोड़ा-बहुत अंदाजा तो लग गया लेकिन बिंदु ने जो बताया, वह मेरी कल्पना से परे था. बिंदु अपनी पीड़ा साझा करते हुए कभी सिसकती और कभी रोने लग  

चिराग तले  अंधेरा

पारले-जी के एक छोटे पैकेट में लगभग 316 कैलोरी होती है. औसत रूप से स्वस्थ व्यक्ति को एक दिन में लगभग 2500-3000 कैलोरी की जरूरत होती है. अमित पांडेय दिन में दो बार यानी दोपहर के खाने के समय और रात के खाने में पारले-जी के इस छोटे पैकेट से