एक कदम आगे, दो कदम पीछे

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और आखिर में भाजपा की बड़ी उम्मीदें अपने मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर टिकी हुई हैं जिसने बीते लोकसभा चुनाव में जमीनी स्तर पर काम कर सारे समीकरण पलट दिए. भाजपा भले ही संघ की भूमिका पर खुलकर न बोले, लेकिन लालू प्रसाद यादव जैसे नेता खुलकर इसे स्वीकारते हैं. लालू कहते हैं, ‘हमारी सभाओं में ज्यादा भीड़ हो रही थी, लेकिन संघ वालों ने आखिरी वक्त में खेल बदल दिया.’ लालू प्रसाद आगे कहते हैं, ‘ऐसा नहीं कि हमें वोट नहीं मिला. हमारा यानी राजद, जदयू, कांग्रेस आदि को मिलाकर वोट बढ़ा है, लेकिन तीनों को मिलाकर सीटें सिर्फ सात आ सकीं. भाजपा ने गरीबों, पिछड़ों आदि को सांप्रदायिक रूप से चार्ज करके मतों का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कर दिया जिसका नुकसान हमें हुआ.’

लोकसभा चुनाव के बाद उल्टी दिशा का रास्ता पकड़ चुकी बिहार की राजनीति का अगला रास्ता क्या होगा, यह कुछ दिनों बाद ही स्पष्ट हो जाएगा जब बिहार में 11 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होंगे

लालू की बात गलत नहीं, लेकिन अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा ऐसा खेल नहीं करेगी, इसकी गारंटी भी देने की स्थिति में कोई नहीं. और दूसरी बात यह कि सत्ता में 23 साल रहने वाली दो जातियों के दो प्रमुख नेताओं लालू प्रसाद और नीतीश कुमार का अगर गठजोड़ होगा तो फिर दूसरे किस्म के ध्रुवीकरण की गुंजाइश भी बनेगी. भाजपा ऐसी तमाम कोशिशें करेगी, लेकिन उसे भी पता है कि लोकसभा की तरह विधानसभा में नैया पार लगाना इतना आसान नहीं होगा. एक तो पार्टी में कोई एक ऐसा नेता नहीं जिसकी अपील पूरे राज्य में हो. दूसरी बात यह कि दल में किसी एक नेता के नाम पर सहमति बनने की राह में भी बहुतेरे रोडे़ हैं. तीसरी बात यह कि भाजपा पर तेजी से सवर्णों की पार्टी का ठप्पा लगा है जिसकी कीमत राजनीतिक जानकारों के मुताबिक उसे विधानसभा चुनाव में चुकानी होगी.

लोकसभा चुनाव के बाद उल्टी दिशा का रास्ता पकड़ चुकी बिहार की राजनीति का अगला रास्ता क्या होगा, यह कुछ दिनों बाद ही स्पष्ट हो जाएगा जब बिहार में 11 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होंगे. अगर नीतीश कुमार ने अपने बागियों को बर्खास्त कर दिया तो 15 सीटों पर चुनाव होंगे. इस चुनाव में लालू और नीतीश के बीच गठजोड़ बन पाता है या नहीं,  यह भी देखा जाएगा. अगर बनता है तो संयुक्त रूप से भाजपा से लड़ने के लिए उनके पास औजार क्या होंगे, इसका खुलासा भी होगा  जिससे भविष्य की लड़ाई का अंदाजा हो जाएगा. सबसे खास बात यह कि इस लड़ाई में कौन किस पर भारी पड़ता है, उससे भी बहुत कुछ साफ होगा. लेकिन यह तय है कि भाजपा की जीत-हार या राजद के पुनर्जीवन से बड़ा सवाल नीतीश कुमार का होगा जो दो दशक के दौरान वाम से लेकर दक्षिण तक का साथ लेकर राजनीतिक यात्रा करने के बाद आखिर में फिर अपने मूल स्थान पर लौटने की तैयारी में दिख रहे हैं.

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मांझी और नैया 

बिहार की राजनीति में जीतन राम मांझी पाला और पासा, दोनों पलट सकते हैं.

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नीतीश कुमार ने जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनवाकर बड़ा दांव खेला है, पर क्या यह सफल होगा.

लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद छोड़ते हुए जब इस कुर्सी के लिए एक अदद नेता की तलाश शुरू की तो अनुमान पर अनुमान लगाए जाते रहे. कभी किसी का नाम सामने आता, कभी किसी का. एक बड़ा वर्ग यह भी मानता रहा कि नीतीश फिर से खुद ही मुख्यमंत्री बन जाएंगे. लेकिन उन्होंने जीतन राम मांझी को सीएम बनवाकर सारे अनुमान ध्वस्त कर दिए. महादलित समुदाय से आनेवाले मांझी के मुखिया बनते ही पूरी राजनीति बदल गई. नीतीश ने महादलित नाम के जिस नए समूह का गठन किया था, उसे एक बड़ा अवसर देकर उन्होंने लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी को हुए नुकसान को काफी हद तक पीछे धकेल दिया.

अब मांझी नेता हैं. वे सिर्फ बिहार के मुख्यमंत्री भर नहीं हैं, बल्कि बिहार की राजनीति किस करवट बैठेगी इसके भी मुख्य सूत्रधार हैं. सीएम बनने के बाद मांझी सक्रिय हैं. रोजाना सभाओं में जा रहे हैं. उदघाटन कर रहे हैं. उनके पोस्टर लग रहे हैं और नीतीश लगभग मौन की राजनीतिक मुद्रा में आ गए हैं. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यह जानबूझकर साधा गया मौन है जो अभी जारी रहेगा. वे कई बार मौन की राजनीति कर ही बहुत सारी मुश्किलों से पार पाते रहे हैं.

लेकिन इस बार की मुश्किल थोड़ी बड़ी है. नीतीश ने बहुत  ठोक-ठाककर मांझी को सीएम बनाया है. आंख मूंदकर सब यह मान रहे हैं कि मांझी भविष्य में भरत जैसा काम करेंगे. यानी वक्त आने पर राम के लिए गद्दी छोड़ देंगे. लेकिन व्यावहारिक तौर पर ऐसा होगा, यह कहना इतना आसान नहीं. मांझी के मुख्यमंत्री बनाए जाने का श्रेय भाजपावाले भी लेना चाहते हैं. वे कह रहे हैं कि उनकी पार्टी ने अगर जदयू को बुरी तरह नहीं हराया होता तो नीतीश कभी ऐसा नहीं करते. उनकी वजह से राजनीति में यह बदलाव आया है. भाजपा वाले दूसरा दांव भी खेल रहे हैं. लगातार कह रहे हैं कि अगर जदयू ने एक महादलित को सीएम बनाया है तो अगला चुनाव भी उसके ही नेतृत्व में लड़ा जाए. अगले मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में उन्हें ही पेश किया जाए. दरअसल मांझी के नाम पर नीतीश ने दांव खेला है तो भाजपा भी खेलना चाहती है. माना जा रहा है कि अगर जदयू ने मांझी के नेतृत्व में चुनाव नहीं लड़ा तो वह महादलितों को यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि सिर्फ मजबूरी में मुसहर जाति के एक नेता का इस्तेमाल भर किया गया.

जदयू के लिए आशंकाएं दूसरी भी हैं. इतिहास के पन्ने पलटकर देखें तो मांझी की नैया हमेशा सत्ता की धारा के साथ चली है. 80 के दशक में जब बिहार में कांग्रेस का बोलबाला था तो मांझी कांग्रेस के सिपाही हुआ करते थे. उसके बाद लालू प्रसाद का उदय हुआ तो मांझी लालू के हो गए. जब लालू के दिन लदने लगे तो मांझी नीतीश के साथी हो गए. मांझी को जाननेवाले जानते हैं कि  काबिल नेता होने के बावजूद वे रामविलास पासवान की तरह सत्ता की संभावना देखनेवाले नेता भी रहे हैं और शिवानंद तिवारी की तरह पाला बदलनेवाले भी. इसलिए जदयू के भी कुछ नेताओं को यह संदेह है कि आखिरी वक्त में मांझी पूरा खेल बदल भी सकते हैं. अगर उन पर दांव नहीं लगा यानी अगर उन्हें ही अगले संभावित सीएम के तौर पर पेश नहीं किया गया तो फिर वे पाला भी पलट सकते हैं और पासा भी. जदयू और राजद के बीच रिश्ते बन भी गए तो भी खेल का अहम हिस्सा मांझी के पाले में होगा. मांझी को सीएम बना देने के बाद उसका लाभ चुनावी राजनीति में उठाना नीतीश का अहम दांव है जिसका फल क्या रहता है, यह देखने वाली बात होगी. मांझी को मुख्यमंत्री बनाकर नीतीश ने भाजपा को करारा झटका दिया है. जानकारों के मुताबिक भाजपा जब तक नीतीश से बड़ा दांव नहीं खेलती तब तक महादलितों में उसकी सेंधमारी संभव नहीं.

लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद छोड़ते हुए जब इस कुर्सी के लिए एक अदद नेता की तलाश शुरू की तो अनुमान पर अनुमान लगाए जाते रहे. कभी किसी का नाम सामने आता, कभी किसी का. एक बड़ा वर्ग यह भी मानता रहा कि नीतीश फिर से खुद ही मुख्यमंत्री बन जाएंगे. लेकिन उन्होंने जीतन राम मांझी को सीएम बनवाकर सारे अनुमान ध्वस्त कर दिए. महादलित समुदाय से आनेवाले मांझी के मुखिया बनते ही पूरी राजनीति बदल गई. नीतीश ने महादलित नाम के जिस नए समूह का गठन किया था, उसे एक बड़ा अवसर देकर उन्होंने लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी को हुए नुकसान को काफी हद तक पीछे धकेल दिया.

अब मांझी नेता हैं. वे सिर्फ बिहार के मुख्यमंत्री भर नहीं हैं, बल्कि बिहार की राजनीति किस करवट बैठेगी इसके भी मुख्य सूत्रधार हैं. सीएम बनने के बाद मांझी सक्रिय हैं. रोजाना सभाओं में जा रहे हैं. उदघाटन कर रहे हैं. उनके पोस्टर लग रहे हैं और नीतीश लगभग मौन की राजनीतिक मुद्रा में आ गए हैं. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यह जानबूझकर साधा गया मौन है जो अभी जारी रहेगा. वे कई बार मौन की राजनीति कर ही बहुत सारी मुश्किलों से पार पाते रहे हैं.

लेकिन इस बार की मुश्किल थोड़ी बड़ी है. नीतीश ने बहुत  ठोक-ठाककर मांझी को सीएम बनाया है. आंख मूंदकर सब यह मान रहे हैं कि मांझी भविष्य में भरत जैसा काम करेंगे. यानी वक्त आने पर राम के लिए गद्दी छोड़ देंगे. लेकिन व्यावहारिक तौर पर ऐसा होगा, यह कहना इतना आसान नहीं. मांझी के मुख्यमंत्री बनाए जाने का श्रेय भाजपावाले भी लेना चाहते हैं. वे कह रहे हैं कि उनकी पार्टी ने अगर जदयू को बुरी तरह नहीं हराया होता तो नीतीश कभी ऐसा नहीं करते. उनकी वजह से राजनीति में यह बदलाव आया है. भाजपा वाले दूसरा दांव भी खेल रहे हैं. लगातार कह रहे हैं कि अगर जदयू ने एक महादलित को सीएम बनाया है तो अगला चुनाव भी उसके ही नेतृत्व में लड़ा जाए. अगले मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में उन्हें ही पेश किया जाए. दरअसल मांझी के नाम पर नीतीश ने दांव खेला है तो भाजपा भी खेलना चाहती है. माना जा रहा है कि अगर जदयू ने मांझी के नेतृत्व में चुनाव नहीं लड़ा तो वह महादलितों को यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि सिर्फ मजबूरी में मुसहर जाति के एक नेता का इस्तेमाल भर किया गया.

जदयू के लिए आशंकाएं दूसरी भी हैं. इतिहास के पन्ने पलटकर देखें तो मांझी की नैया हमेशा सत्ता की धारा के साथ चली है. 80 के दशक में जब बिहार में कांग्रेस का बोलबाला था तो मांझी कांग्रेस के सिपाही हुआ करते थे. उसके बाद लालू प्रसाद का उदय हुआ तो मांझी लालू के हो गए. जब लालू के दिन लदने लगे तो मांझी नीतीश के साथी हो गए. मांझी को जाननेवाले जानते हैं कि  काबिल नेता होने के बावजूद वे रामविलास पासवान की तरह सत्ता की संभावना देखनेवाले नेता भी रहे हैं और शिवानंद तिवारी की तरह पाला बदलनेवाले भी. इसलिए जदयू के भी कुछ नेताओं को यह संदेह है कि आखिरी वक्त में मांझी पूरा खेल बदल भी सकते हैं. अगर उन पर दांव नहीं लगा यानी अगर उन्हें ही अगले संभावित सीएम के तौर पर पेश नहीं किया गया तो फिर वे पाला भी पलट सकते हैं और पासा भी. जदयू और राजद के बीच रिश्ते बन भी गए तो भी खेल का अहम हिस्सा मांझी के पाले में होगा. मांझी को सीएम बना देने के बाद उसका लाभ चुनावी राजनीति में उठाना नीतीश का अहम दांव है जिसका फल क्या रहता है, यह देखने वाली बात होगी. मांझी को मुख्यमंत्री बनाकर नीतीश ने भाजपा को करारा झटका दिया है. जानकारों के मुताबिक भाजपा जब तक नीतीश से बड़ा दांव नहीं खेलती तब तक महादलितों में उसकी सेंधमारी संभव नहीं.

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