बड़े भाई का ‘बिगब्रदर-पन’

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मार्कुस की गिरफ्तारी के पांच ही दिन बाद, नौ जुलाई को जर्मनी के संघीय अभियोजन कार्यालय ने बताया कि रक्षा मंत्रालय के एक कर्मचारी की भी अमेरिका के लिए जासूसी के संदेह में जांच चल रही है. इस जांच के आधार पर देश की गुप्तचर संस्थाओं पर नजर रखने वाली संसदीय निगरानी समिति के अध्यक्ष क्लेमेंस बिनिंगर का कहना था कि इस कर्मचारी के बारे में प्रथम संकेत अगस्त 2010 में मिले थे, पर ठोस प्रमाण अभी तक नहीं मिल पाए हैं, इसलिए वह हिरासत में नहीं है.

रक्षा मंत्रालय में भी अमेरिकी भेदिया छिपा होने की बात इतनी गंभीर समझी गई कि चांसलर अंगेला मेर्कल की अनुपस्थिति में–वे चीन की औपचारिक यात्रा पर थीं– जर्मनी के गृह एवं रक्षा मंत्रियों तथा चांसलर कार्यलय के प्रमुख ने मिल कर निर्णय लिया कि बर्लिन के अमेरिकी दूतावास में ‘सीआईए’ प्रमुख जॉन ब्रेनन को निष्कासित कर दिया जाना चाहिए. ब्रेनन को ‘चीफ ऑफ स्टेशन’ के तौर पर राजनयिक निरापदता (इम्यूनिटी) मिली हुई है. इस कारण न तो उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता था, न ही उन्हें ‘अवांछित व्यक्ति’ घोषित कर अमेरिका से पंगा मोल लिया जा सकता था.

राजनयिक भूकंप
यही सब सोच कर जल्द ही एक कदम पीछे हटाते हुए कहा गया कि जर्मनी चाहता है कि ब्रेनन स्वयं स्वदेश लौट जाएं. तब भी, यह निर्णय एक राजनयिक भूकंप के समान था. अमेरिका ने भी अपनी नाराजगी जताते हुए उसे इसी अर्थ में लिया. राष्ट्रपति भवन के प्रवक्ता ने कहा कि जर्मनी को चाहिए था कि वह बात सार्वजनिक करने के बदले ”कूटनीतिक चैनलों” का उपयोग करता.

जर्मन रक्षा मंत्रालय वाले संदिग्ध व्यक्ति के विषय में कहा जा रहा है कि अगस्त 2010 में उसके बारे में गुमनाम संकेत मिलने के बाद से जर्मनी की सैनिक गुप्तचर सेवा ‘एमआरडी’  उस पर नजर रखे हुए थी. वह 15-16 बार तुर्की की संक्षिप्त यात्राएं कर चुका है. समझा जाता है कि वहां वह अमरीकी एजेंटों से मिलता रहा है. इससे पहले अनुमान लगाया जा रहा था कि वह तुर्की में शायद रूसी एजेंटों से मिलता है. उसके कंप्यूटर इत्यादि जब्त कर लिए गए हैं, पर उसे तुरंत गिरफ्तार नहीं किया गया.

एक दर्जन से अधिक भेदिये
मानो चांसलर सहित पूरे देश की वर्षों से चल रही इलेक्ट्रॉनिक जासूसी और एक ही सप्ताह में दो जीते-जागते जासूसों की धर-पकड़ पर्याप्त न हो, जर्मनी के सर्वाधिक बिक्री वाले सनसनी-पसंद अखबार ‘बिल्ड’ ने 13 जुलाई को लिखा कि जर्मनी के कम से कम चार मंत्रालयों के एक दर्जन से अधिक कर्मचारी अमेरिका की वैदेशिक गुप्तचर सेवा ‘सीआईए’ के लिए काम कर रहे हैं. रक्षा, वित्त, गृह और विकास-सहायता मंत्रालयों में बैठे ये घर के भेदी वर्षों से ‘सीआईए’ की सेवा कर रहे बताए गए हैं. ‘बिल्ड’ के अनुसार, जर्मन  अधिकारियों को जब से पता चला है कि अमेरिका बड़े पैमाने पर जर्मन भूमि पर भी जासूसी कर रहा है, तबसे इन भेदियों को निर्देश देने वाले अमरिकी एजेंट उनसे जर्मनी के बाहर वियेना, वार्सा या प्राग में मिलते हैं.

जर्मन सरकार का माथा तो पिछले साल एडवर्ड स्नोडन द्वारा उड़ाए गए दस्तावेजों के प्रकाशन के समय से ही ठनक रहा था. लेकिन, कुछ तो अमेरिका के प्रति इतिहासजन्य कृतज्ञता के बोध से और कुछ उसकी सत्ता और महत्ता के भय से– सरकार अमेरिका की ठकुरसुहाती करने और जनभावना को बरगलाने में ही लगी रही. अमेरिका से यही कहती रही कि हम तो तुम्हारे अपने ही हैं, कम से कम हमारे साथ तो वही व्यवहार मत करो, जो ईरान, सूडान या उत्तर कोरिया के साथ होता है. उसने बहुत अनुनय-विनय की कि अमेरिका उसके साथ भी वैसा ही एक ‘जासूसी-नहीं’ (नो स्पायिंग) समझौता कर ले, जैसा उसने आंग्लवंशी व अंग्रेजी-मातृभाषी कैनडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से कर रखा है. लेकिन, अमेरिका टस से मस नहीं हुआ. केवल इतना ही आश्वासन दिया कि चांसलर मेर्कल का मोबाइल अब नहीं सुना जाएगा.

अमेरिका को समझाना टेढ़ी खीर
चांसलर मेर्कल ने चीन से लौटने के बाद और फुटबॉल विश्वकप के फाइनल में जर्मन टीम का साथ देने के लिए ब्राजील जाने से ठीक पहले प्रमुख जर्मन टेलीविजन चैनल ‘जेडडीएफ’ के साथ एक भेंटवार्ता में कहा कि अमेरिका वालों को यह समझाना टेढ़ी खीर है कि ‘वे अपनी गुप्तचर सेवाओं के काम का ढर्रा बदलें…तब भी हम कहते रहेंगे कि कहां हम उन से मतभेद रखते हैं.’ मेर्कल ने कहा कि सब कुछ होने के बावजूद ”हम (अमेरिका के साथ) साझेदारीपूर्ण सहयोग करते रहेंगे.”  चीन में उन के मुंह से निकल गया था कि ‘बस, अब बहुत हो गया!’ उल्लेखनीय है कि यूक्रेन-संकट पर तो चांसलर मेर्कल और राष्ट्रपति ओबामा अक्सर एक-दूसरे को फोन कर लिया करते थे. पर, जर्मनी को परेशान कर रहे जासूसी कांड पर, जुलाई के मध्य तक, दोनों के बीच कोई फोन वार्ता नहीं हुई. रविवार, 13 जुलाई को, ऑस्ट्रिया की राजधानी वियेना में अमेरिका और जर्मनी के विदेशमंत्रियों के बीच इस विषय पर पहली बार उच्चस्तरीय संवाद जरूर हुआ. परिणाम ढाक के तीन पात जैसा ही रहा.

दरअसल अमेरिका आतंकवाद से अपनी लड़ाई में जासूसी की हर विधा को एक ऐसा सधा हुआ अस्त्र मानता है, जिसके इस्तेमाल में उसे अपनों-परायों या शत्रु-मित्र के बीच कोई भेद स्वीकार्य नहीं है. पश्चिमी जगत का यह मुखिया इस बीच 100 साल पहले की रूसी समाजवादी क्रांति के प्रणेता लेनिन के इस सिद्धांत का कायल बन गया लगता है कि ‘भरोसा करना ठीक है, लेकिन निगरानी रखना उससे बेहतर है.’ उसे अब याद नहीं कि कभी वही लेनिन के इस सिद्धांत की खिल्ली उड़ाया करता था. वह भूल रहा है कि जासूसी के औचित्य के पक्ष में गढ़ा गया, अविश्वास को विश्वास पर वरीयता देने वाला यह लेनिनवादी सिद्धांत ही ढाई दशक पूर्व सोवियत संघ और उस के समूचे पूर्वी गुट को ले डूबा. सोवियत संघ भी एक महाशक्ति हुआ करता था. अमेरिका भी एक महाशक्ति है. कौन जाने, उस का भी कभी यही हाल हो!!

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