‘लालू ऊपरी वार करते हैं, जबकि नीतीश…’

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आपके मुताबिक लोकतंत्र में गड़बड़ी है. तो सही रास्ता क्या है? सभी पार्टियों को देखा-आजमाया जा चुका है. समाजवादी व्यक्तिवादी हो गए हैं, कांग्रेस ने इतने साल के शासन में जो दिया वह सबके सामने है और भाजपा सांप्रदायिक ही है.
मैंने लोकतंत्र को खारिज नहीं किया. उसकी अपनी खासियत है. उसी की देन है कि आज चाय बेचनेवाला देश का प्रधानमंत्री बन गया. ललुआ-ललुआ, जिसे लोग कहते थे, गाय चरानेवाले का बेटा बिहार का मुख्यमंत्री बन गया. अस्थायी ठेका मजदूर रघुवर दास मुख्यमंत्री बन गए. यह सब लोकतंत्र की वजह से ही तो हुआ. सबसे बड़ी बात है कि लोकतंत्र से पिछड़ों का, वंचितों का, दलितों का गहरा जुड़ाव है. वह है, तभी यह लोकतंत्र चल रहा है. वह समूह जानता है कि संभावनाएं इसी प्रणाली में बची हुई हैं. उसके लिए स्पेस इसी प्रणाली में है, वरना जो अभिजात्य वर्ग है, वह तो कब का इस लोकतंत्र से चिढ़ चुका है. उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता कि कोई चाय बेचनेवाला पीएम बन जाए, मजदूर सीएम बन जाए, गाय चरानेवाला बड़ा नेता बन जाए.

जहां तक दूसरों को आजमाने की बात है, तो मुझे लगता है कि मोदी इस देश के आखिरी प्रधानमंत्री होंगे, जो इसी आर्थिक व्यवस्था को चलाना चाहेंगे या पुरजोर कोशिश करेंगे, लेकिन उनके बाद व्यवस्था बदलेगी. जब तक आर्थिक नीतियों में बदलाव नहीं होगा, किसी को आजमाते रहने से कुछ नहीं होगा. एक वैकल्पिक व्यवस्था उभरेगी.

आप तो जदयू में लंबे समय तक रहे हैं. शरद और नीतीश के स्टैंड में फर्क दिखता है. शरद यादव की भूमिका क्या है पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर?
शरद यादव की राजनीति का एजेंडा क्या है, यह पहले जानिए. वह किसी तरह लोकसभा या राज्यसभा में बने रहना चाहते हैं, वही उनका इकलौता मकसद है. बाकी उन्हें बहुत लेना-देना नहीं है पार्टी से. वे जबलपुर से सांसद हुए थे 1974 में. 1977 में जब जनता पार्टी की प्रचंड लहर थी, तो उनकी जीत का मार्जिन वहां से कम गया और 1980 में वहां से उनकी जमानत ही जब्त हो गई. तब मुलायम की शरण में गए और उसके बाद फिर बिहार आ गए. और तब से उनका बिहार से वास्ता बस किसी तरह सांसद बने रहकर सुविधाओं का इस्तेमाल करना है. वह एक बार मुझसे कहने लगे कि मैं 40 सालों से संसद में हूं. यही बात उन्होंने कई बार बोली, तो मुझे गुस्सा आ गया. मैंने कहा कि क्या 40 साल रट रहे हैं. 40 सालों में आपने कौन-सी क्रांति कर दी. दूसरे दलों के साथ मिलकर एकाध बार बंद करने के अलावा आपने और क्या किया 40 सालों के संसदीय जीवन में. रही बात राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर काम करने की, तो शरद तो हमेशा अपना दुखड़ा रोते रहे हैं. मुझसे भी दुखड़ा रोते रहे हैं कि उनकी चलती ही नहीं.

शरद की तो इच्छा नहीं थी कि बिहार में जदयू का भाजपा से अलगाव हो. क्या यह सही है?
हां, शरद नहीं चाहते थे. वह एनडीए में बने रहना चाहते थे. देखिए यह तो सच है न कि नीतीश ने बिहार को जिंदा किया. एक सकारात्मक माहौल दिया. जब नीतीश ने बिहार मंे काम शुरू किया, तो देशभर में चर्चा हुई. अमर्त्य सेन और रामचंद्र गुहा जैसे लोगों ने नीतीश में भावी पीएम की छवि देखनी शुरू कर दी. नीतीश को भी ऐसा लगने लगा. वह सोचने लगे कि देश का जो उदारवादी वर्ग है, वह तब तक उनके साथ नहीं आएगा, जब तक वह भाजपा का साथ छोड़ नहीं देते. नीतीश कुमार खुद को प्रधानमंत्री के रूप में देखने लगे और उसके लिए भाजपा का साथ छोड़ना उन्हें जरूरी लगा. यह काम नरेंद्र मोदी के नाम पर हुआ. लेकिन मुझे लगता है कि नीतीश ने वक्त को नहीं समझा. सही समय का चयन नहीं किया. 2010 के चुनाव के पहले ही अगर वह भाजपा का साथ छोड़ देते और अकेले चुनाव लड़ते, तो भाजपा इतनी बड़ी पार्टी नहीं बन पाती और आज इस तरह चुनौती नहीं बनती बिहार में. मैंने उसी समय नीतीश को कहा भी कि अब क्या बचा है, अलग रास्ता अपनाओ, लेकिन नीतीश दुविधा में रहे.

तो दुविधा और जिद की वजह से ऐसा हुआ.
भ्रम के साथ-साथ अहंकार की वजह से. नीतीश को लगता है कि वह जो सोचते हैं, वही सही है और सबसे बड़ी दिक्कत यही है. वह सिर्फ अपना आभामंडल चमकाना चाहते हैं. मैंने भी राजगीर सम्मेलन में नीतीश के सामने कहा था कि आप पार्टी के बड़े नेता हैं. इतनी तंगदिली ठीक नहीं है. नीतीश की दिक्कत है कि उन्हें लगता है कि सबकी बात सुनेंगे तो वह छोटे नेता हो जाएंगे.

चुनावी राजनीति से संन्यास ले चुके तिवारी इन दिनों आत्मकथा लिख रहे हैं. फोटो: प्रशांत रवि
चुनावी राजनीति से संन्यास ले चुके तिवारी इन दिनों आत्मकथा लिख रहे हैं.फोटो: प्रशांत रवि

क्या नीतीश का शुरू से ही ऐसा स्वभाव रहा है?
शुरू से क्या रहेगा. 1994 में जब वह लालू प्रसाद से अलग हुए और समता पार्टी बनी, लोगों की भीड़ आनी शुरू हुई, तो नीतीश में अचानक बदलाव हुआ और उन्हें लगने लगा कि वह बड़े नेता हैं. वरना नीतीश तो बहुत दब्बू नेता थे. नीतीश के करियर में बिहार में हुई कुर्मी चेतना रैली अहम रही है. उसी से नीतीश कुमार की राजनीति बदली. उसमें वह जाना चाहते थे, लेकिन लालू यादव नहीं चाहते थे कि नीतीश जाएं. मैंने नीतीश पर लगातार दबाव बनाया और अपनी गाड़ी से लेकर गया. वह तो समता पार्टी बनी, तो नीतीश कुमार पहली सभा में आरा-बक्सर गए. कई सीनियर नेता भी साथ थे. अब्दुल गफूर साहब, सैयद शहाबुद्दीन साहब, हरिकिशोर सिंह वगैरह-वगैरह. अचानक भीड़ देख लेने के बाद नीतीश ने इनसे ठीक से बात करना भी छोड़ दिया, तो हमने भी डांटा कि क्या हो गया है आपको. ये सीनियर लोग हैं, इनकी तो इज्जत होनी चाहिए.

और लालू प्रसाद यादव. उनको भी तो आपने शुरू से देखा है?
यह तो लालू प्रसाद भी जानते हैं और बार-बार कहते भी रहे हैं कि उनके राजनीतिक जीवन में मोड़ पटना विश्वविद्यालय चुनाव से आया. 1970 में पटना विश्वविद्यालय में छात्र संघ के महासचिव के चुनाव में मैं साथ नहीं होता, तो लालू प्रसाद कहां होते पता भी नहीं चलता. हुआ यह था कि उस साल पटना विश्वविद्यालय में छात्र संघ का चुनाव सीधे-सीधे हो रहा था. सीधे मतदान से. वहां दबंगों का कब्जा था. मुझे कोई रुचि नहीं थी. मैं तो दूसरी राजनीति कर रहा था. विश्वविद्यालय में दबंगों का वह समूह मिल गया. मैंने कहा कि यार, पहली बार सीधे चुनाव हो रहा है, लड़ने दो बच्चों को. उन लोगों से बहस हो गई. मैंने पैनल बनाया कि अब तो इस चुनाव में सक्रिय भूमिका निभानी है. लालू प्रसाद महासचिव पद के प्रत्याशी थे. बिना लालू से मिले उनका प्रचार करने लगा. लालू बाद में एक दिन मिले, तो सहमे-सहमे उन्होंने कहा िक बाबा, मैं जहां जाता हूं, वहां लोग कहते हैं कि आपके लिए वोट मांगने बाबा आए थे. उसी समय शंकराचार्य पर केस करके मैं चर्चा में आ गया था. पुरी के शंकराचार्य ने पटना की एक सभा में कहा था कि दलित तो जन्म से ही अछूत होते हैं. इसी पर केस किया था. पटना का एक अखबार आर्यावर्त तब ब्राह्मणों का गढ़ था. वह शंकराचार्य का पक्ष ले रहा था. उसके विरोध में मैंने एक मार्च आयोजित किया. यह उसी समय की बात है, जब पटना विश्वविद्यालय का चुनाव हो रहा था. विरोध जुलूस में मैंने लालू को बुलाया कि आओ और सड़क पर उतरकर जिंदाबाद-मुर्दाबाद करो. लालू पहली बार किसी सभा में शामिल हुए थे तब. रामविलास पासवान उस केस में हमारी ओर से गवाह बने थे. लालू 70 में महासचिव बने, 74 में विश्वविद्यालय के अध्यक्ष, 77 में एमपी और बाद में बिहार के मुख्यमंत्री. 70 में वह हार गए होते, तो कहा नहीं जा सकता कि आज कहां होते. लेकिन फर्क यह है कि लालू आज भी इस बात को मानते हैं और मान देते हैं.

नीतीश ने सही समय का चयन नहीं किया. 2010 के चुनाव के पहले ही अगर वह भाजपा का साथ छोड़ देते, तो वह बिहार में इतनी बड़ी पार्टी नहीं बन पाती

जब लालू से इतना गहरा रिश्ता था, तो छोड़ते क्यों रहे बीच-बीच में उनको? आपने उनके विरोध में समता पार्टी के निर्माण में भी योगदान दिया.
हमने छोड़ा कि लालू ने छोड़ा हमको? यह तो उनसे भी पूछा जाना चाहिए. वैसे समता पार्टी के बनने की कहानी अलग है. लालू और नीतीश दोनों सामाजिक न्याय और आंदोलन को उभारनेवाले नेता थे. 1990 में सत्ता संभालने के कुछ सालों बाद ही लगने लगा था कि लालू प्रसाद से ज्यादा योग्य नीतीश कुमार हैं. नीतीश को कहा जाने लगा कि अलग राह अपना लो, लेकिन नीतीश यहां भी साहस नहीं दिखा रहे थे.

लेकिन नीतीश को आगे बढ़ाने में, समता के गठन में जॉर्ज फर्नांडिस की भी भूमिका रही थी और नीतीश ने उनको भी दरकिनार कर दिया.
नीतीश को हर उस व्यक्ति से परेशानी है, जो बोलता हो. जॉर्ज भी बेचारे बिहार की राजनीति पर कम ही बोलते थे, लेकिन बाद में बोलने लगे, तो परेशानी होने लगी. दूसरी परेशानी यह हुई कि जॉर्ज पर स्व. दिग्विजय सिंह का प्रभाव ज्यादा था. नीतीश को लगता था कि जॉर्ज और दिग्विजय की ज्यादा बनती है और दिग्विजय काफी तेज तर्रार नेता थे, तो नीतीश ने दोनों का पत्ता काटा. दिग्विजय का पत्ता काटना तो सबको हैरत में डालनेवाला था. मैंने भी नीतीश से पूछा तो उन्होंने कहा कि हम नहीं जानते, शरद यादव जानते हैं. दरअसल जॉर्ज को किनारेकर उन्होंने शरद का नेतृत्व इसीलिए स्वीकार किया कि जब-जब मनमानी करनी होगी, शरद को सामने लाएंगे, क्योंकि शरद को साधना आसान था.

समता पार्टी ही क्यों, चारा घोटाले का केस करवाने में भी आप आगे रहे.
हां, वह तो अभी भी है. अभी भी लालू से ज्यादा सरोकारी संबंध है. कहा न कि लालू से राजनीतिक संबंध भर नहीं है. बैठकी वाला रिश्ता है. वह मेरे घर आते हैं, मैं उनके घर जाता हूं. रही बात चारा घोटाला केस की, तो उसकी अपनी कहानी है. जब चारा घोटाले का केस होना था, तो रविशंकर प्रसाद, सुशील मोदी, सरयू राय आदि सक्रिय थे. उस समय समता पार्टी और भाजपा में होड़ थी कि कौन इसका श्रेय ले, लेकिन नीतीश कुमार इस मामले में पड़ना ही नहीं चाहते थे. न जाने क्यों, वह वकालतनामे पर दस्तखत से भी इंकार कर गए. साहस ही नहीं जुटा पा रहे थे. ऐसे में जॉर्ज साहब ने मुझसे दिल्ली में कहा कि जहाज का टिकट कटवा रहे हैं, जाइए और साइन कीजिए और मैं भागा-भागा पटना पहुंचा था. नीतीश तो यही पूछते थे कि कागज-पत्तर है या सब हवा में है. बाद में जब चारा घोटाले का जिन्न बाहर निकला और बोलने की सहूलियत हो गई, तो नीतीश इसे अपना मसला बनाने लगे, वरना वह तो वकालतनामे पर साइन तक करने का साहस नहीं जुटा पाए थे.

आपको बैकरूम पॉलिटिशियन क्यों कहा जाता है?
कौन कहता है? इंटर पास करने के बाद रांची गए थे पढ़ने, तब से सड़कों पर ही राजनीति करते रहे. सीधे-सीधे चंद्रशेखर जी की चुनौती स्वीकार करके मैंने चुनाव लड़ा, हार गया. बिंदेश्वरी दुबे, जो बिहार के मुख्यमंत्री हुए, के खिलाफ मैंने चुनाव लड़ा था, हार गया था. हार-जीत अपनी जगह है. 56 साल की उम्र में पहली बार विधायक बना, लेकिन कभी सड़क नहीं छोड़ा. यह कहता कौन है, यह तो बताइए.

‘चारा घोटाले में नीतीश कुमार वकालतनामे पर दस्तखत से पीछे हट गए, तब जॉर्ज साहब ने मुझे दिल्ली से इस पर दस्तखत करने के लिए भेजा था’

दूसरी बात करते हैं. लालू-नीतीश का अब विलय हो रहा है तो आप किस तरह की मुश्किलें देखते हैं?
मुश्किलें तो होंगी, लेकिन दोनों मिलेंगे, क्योंकि दोनों की मजबूरी है और दोनों अपनी औकात देख चुके हैं. लालू प्रसाद मुस्लिम-यादव समीकरण को ही मूल आधार मान बैठे थे, वह टूट चुका है और नीतीश कुमार भी बैठकर विकास का प्रतिशत, अतिपिछड़ा का प्रतिशत, महादलित का और महिलाओं का प्रतिशत जोड़ते रह गए. लोकसभा चुनाव में दोनों देख चुके हैं कि घर में बैठकर जोड़ने से कुछ नहीं होगा. इसलिए दोनों की मजबूरी है कि अब मिलें. वे देख रहे हैं कि जातियों की राजनीति पर कब्जा करना होगा. धर्मनिरपेक्षता की बात करेंगे, लेकिन मेरा मानना है कि जो जातिनिरपेक्ष नहीं हो सकता, वह धर्मनिरपेक्ष तो कतई नहीं हो सकता.

और अब तो एक छोर जीतन राम मांझी भी हैं!
बेचारे नीतीश कुमार ने तो मांझीजी के इस रूप की कल्पना भी नहीं की होगी. उन्होंने सोचा होगा कि पहले वाले ही मांझी रहेंगे, जब चाहेंगे, जैसे चाहेंगे, इस्तेमाल करेंगे. लेकिन आज हकीकत यह है कि मांझी देशभर में चर्चित नेता हो चुके हैं और उन्होंने नीतीश-लालू से अलग अपना एक खास समूह तैयार किया है. आपने देखा होगा कि पिछले माह पटना के मिलर हाई स्कूल में महादलितों का एक सम्मेलन हुआ था. नीतीश भी थे और मांझी भी. नीतीश ने बोलना शुरू किया, तो महादलितों ने विरोध शुरू कर दिया. मांझी मुस्कुराते रहे. उन्होंने एक बार भी मना नहीं किया कि हल्ला क्यों कर रहे हो. दरअसल मांझी दिखाना चाहते थे नीतीश को कि भ्रम में मत रहिए. हमारा अपना आधार है, जिसमें अब आप स्वीकार्य नेता नहीं हैं. अब लालू मिलें या नीतीश मिलें, लेकिन बड़ा सवाल यह हो गया है कि क्या मांझी के बजाय किसी दूसरे के नेतृत्व में चुनाव होगा, तो मांझी के समर्थक उसे स्वीकार करेंगे? मुझे ऐसा नहीं लगता.

क्या ऐसा नहीं लगता कि मांझी के उभार से बिहार की राजनीति उत्तर प्रदेश की राह पर है, जहां पिछड़े और दलित की राजनीति दो ध्रुवों में बंटेगी? एक ओर नीतीश-लालू होंगे तो दूसरी ओर मांझी?
यह कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन एक बात साफ है कि नीतीश या लालू के नेतृत्व में चुनाव होगा, तो वे फिर हारेंगे और बुरी तरह से हारेंगे, क्योंकि वे पहले से ही परास्त सेनापति हैं. और यह कहीं से समझदारी नहीं होगी कि परास्त सेनापति को फिर से नेतृत्व देकर सैनिकों को लड़ाई लड़ने के लिए कहा जाए. बेहतर होगा कि मांझी ही नेतृत्व करें.

आखिरी सवाल. माना जा रहा है कि मांझी भाजपा के साथ भी जा सकते हैं.
यह नहीं कह सकता. लेकिन यह जो मिलन और विलय हो रहा है, उससे कुछ नहीं होगा. राजनीति मांझी के इर्द-गिर्द घूमेगी और वह एक अहम छोर बने रहेंगे. उन्हें कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता.

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