रोजे बिना इफ्तार कैसा!

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धर्मनिरपेक्षता लोकतंत्र से नाभि-नाल जुड़ा हुआ एक बड़ा और आधुनिक विचार है जिसे भारतीय नेताओं ने अवसरवाद की ट्रिक या जुगाड़ में बदल दिया है. इस विरोधाभास पर गौर किया जाना चाहिए कि जो राजनीति में धर्म के दखल के खिलाफ हैं वे मुस्लिम धार्मिक प्रतीकों से खुद को नत्थी करने के लिए करोड़ों फूंक रहे हैं. भ्रष्टाचार के पैसे से वंशानुगत आधार पर पार्टियां चलाने, चुनाव लड़ने वाले अपराधी मिजाज के नेता सत्ता में भागीदारी, सरकार गिराने, गठबंधन बनाने-तोड़ने समेत सारे काम देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने की रक्षा करने के नाम पर करते हैं. धर्मनिरपेक्ष होना बहुत आसान है उसके लिए बस कुछ प्रतीकों की जरूरत पड़ती है जिनमें से टोपी लगाकर इफ्तार पार्टियों में जीमना भी एक है. कोई ताज्जुब नहीं है कि इन दिनों छद्म धर्मनिरपेक्षता एक ज्यादा वजनी शब्द हो गया है. मुसलमानों को मुख्यधारा में लाने, उनकी हिफाजत करने का दावा करने वालों की विश्वसनीयता बुरी तरह गिरी है क्योंकि वे तिकड़मों से देश में सतत सांप्रदायिक तनाव और अगर वह मंदा पड़ने लगे तो दंगों की जरूरत को बनाए रखना चाहते हैं ताकि उनकी पूछ बनी रहे. पिछले लोकसभा चुनाव में गोधरा का कलंक माथे पर होने के बावजूद मोदी को जो धमाकेदार जीत मिली उसका कारण सिर्फ कांग्रेस का कुशासन ही नहीं सेकुलरों की तिकड़मों का बेनकाब हो जाना भी है.

गनीमत है कि मुसलमानों की नई पीढ़ी इस नौटंकी को समझने लगी है. मुसलमान नौजवान पूछ रहे हैं कि जो रोजा नहीं रखते वे इफ्तार क्यों करते हैं?

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