पुल तले पाठशाला

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[box]‘देश में ऐसे बच्चों की संख्या बहुत है जो पढ़-लिख नहीं पाते, तो ऐसी हालत में अगर हम कुछेक बच्चों को थोड़ा-बहुत पढ़ा देते हैं तो इसमें कोई बड़ी बात नहीं है’[/box]

साल भर पहले स्कूल को एक और शिक्षक मिला. ये थे बिहार के नालंदा से दिल्ली आए लक्ष्मी चंद्रा. लक्ष्मी विज्ञान में स्नातकोत्तर हैं और दिल्ली में अपने परिवार के साथ रहते हैं. रोजी-रोटी के लिए वे प्राइवेट ट्यूशन लेते हैं. वे बताते हैं, ‘एक दिन  ट्यूशन के लिए जाते वक्त मैंने देखा कि पुल के नीचे बच्चे बैठे हैं और एक आदमी उन्हें पढ़ा रहा है. उस दिन तो मैं निकल गया क्योंकि मेरी क्लास का समय हो रहा था. अगली सुबह उत्सुकता के साथ जब मैं यहां पहुंचा तो पता चला कि राजेश गरीब बच्चों को फ्री में पढ़ाते हैं. मुझे लगा कि  इस नेक काम में इनका साथ देना चाहिए. बस तभी से मैं स्कूल से जुड़ गया.’

आगे की योजनाओं के बारे में पूछने पर राजेश कहते हैं, ‘देखिए, हमें यह मुगालता नहीं है कि हम कोई बहुत बड़ा काम कर रहे हैं. इस देश में ऐसे बच्चों की संख्या बहुत है जो पढ़-लिख नहीं पाते तो ऐसी हालत में अगर हम कुछेक बच्चों को  थोड़ा-बहुत पढ़ा देते हैं तो इसमें कोई बड़ी बात नहीं है. दूसरी बात यह भी है कि हमारी सीमा भी यहीं तक है. लाख चाहकर भी हम दोनों इस देश के हर बच्चे को नहीं पढ़ा-लिखा सकते. रही बात भविष्य की तो जब तक बन सकेगा इसी तरह से पढ़ाते-लिखाते रहेंगे और एक समय के बाद इन्हें सरकारी स्कूल में भेजते रहेंगे. क्योंकि असल चीज जो है डिग्री, वह तो इन्हें वहीं से मिलेगी.’

इस अनूठे स्कूल की तरफ कई गैरसरकारी संगठनों ने भी हाथ बढ़ाया. लेकिन राजेश और लक्ष्मी चंद्रा कहते हैं कि वे अपने  मिशन को कमाई का जरिया नहीं बनाना चाहते. राजेश कहते हैं, ‘देखिए, ऐसा तो है नहीं कि हमारे परिवार का पेट नहीं पल रहा है. अपने लिए कमाई का जरिया है ही हमारे पास.’ इतना कहकर राजेश चुप हो जाते हैं और अपने छात्रों को कुछ बताने-समझाने में लग जाते हैं. स्कूल के भविष्य और इससे जुड़ी मुश्किलों से जुड़े सवालों का जवाब देते वक्त राजेश के चेहरे पर आत्मविश्वास की झलक दिखती है. मानो कह रहे हों कि अगर भविष्य और मुश्किलों के बारे में सोचा होता तो मेट्रो के पुल तले यह पाठशाला शुरू ही नहीं हो पाती.

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