महाराष्ट्र: घोटालों की पाठशाला

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पिछले आठ वर्षों से यहां काम कर रहे एक अस्थायी कर्मचारी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘मोटी तनख्वाह मिलने के बावजूद भी स्थायी कर्मचारी ड्यूटी पर नहीं आते, कानूनन उन्हें तीन साल तक एक आश्रमशाला में काम करना पड़ता है, लेकिन वह एक-डेढ़ साल काम करके यहां से निकल जाते हैं. इन शिक्षकों का इस तरह का रवैया बच्चों की पढ़ाई के लिए बहुत नुकसानदेह है.’

गौरतलब है कि आश्रमशाला में कार्यरत स्थायी शिक्षकों को 35,000 से 56,000 रुपये प्रति माह तक वेतन मिलता है, वहीं दूसरी ओर अस्थायी शिक्षकों को एक दिहाड़ी मजदूर की तरह घंटे के हिसाब से वेतन दिया जाता है, इन शिक्षकों को 56 रुपये प्रति घंटे के

हिसाब से पैसे मिलते हैं और आम तौर पर ये अस्थायी शिक्षक पांच घण्टे काम करते हैं.

मोलगी गांव की पश्चिम खानदेश भील सेवा मंडल प्राथमिक व माध्यमिक आश्रमशाला का दफ्तर तो अच्छा नजर आता है, यहां पर बच्चों की संख्या 504 है, एक कंप्यूटर सेंटर भी है लेकिन बच्चों के रहने की व्यवस्था यहां भी दहेल और सरी की तरह ही दयनीय है. सरकारी सहायता प्राप्त यह आश्रमशाला इलाके के प्रभावशाली नेता सुहास नटावडकर के निजी ट्रस्ट द्वारा संचालित होती है. यहां के प्रधानाध्यापक वीएच चौधरी ने बताया कि उन्हें सरकार से सालाना 33 लाख रुपये की आर्थिक मदद मिलती है, यह बेहद कम है. वे कहते हैं, ‘आश्रमशाला को सुचारु रूप से चलाने के लिए और पैसे की जरुरत है.’ जब उनसे आश्रमशाला की दयनीय अवस्था के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘नए भवन का निर्माण करने की योजना चल रही है लेकिन कुछ कानूनी कारणों से काम शुरू नहीं हो पा रहा है.’

स्थायी शिक्षकों को 35,000 से 56,000 रुपये प्रति माह वेतन मिलता है, जबकि अस्थायी शिक्षकों को दिहाड़ी मजदूर की तरह 56 रुपये प्रति घंटे के हिसाब से पैसा मिलता है

नंदुरबार की शहादा तहसील की शासकीय आश्रमशाला भी मोलगी गांव की आश्रमशाला से मेल खाती है, फर्क इतना भर है कि इसके अगल बगल का माहौल थोड़ा शहरी है. शाला की रसोई के पास कूड़े का ढेर और गंदगी का साम्राज्य नजर आता है. पढ़ाई का आलम यह है कि यहां दसवीं कक्षा के बच्चे अंग्रेजी के मामूली शब्द जैसे शुगर और एलीफेंट जैसे सामान्य शब्द भी नहीं पढ़ सकते. यह तब है जबकि अंग्रेजी भाषा आश्रमशालाओं के पाठ्यक्रम का हिस्सा है. यहां के प्रधान अध्यापक आरओ भरारी कहते हैं, ‘हमारी आश्रमशाला निर्माणाधीन है इसलिए अभी आश्रमशाला किराये की इमारत में चल रही है. इसी वजह से यहां की हालत ऐसी है, पैसों की कमी के चलते हम पिछले छह महीनों से किराया भी नहीं दे पाये हैं.’

लोक संघर्ष मोर्चा की महासचिव प्रतिभा शिंदे पिछले 21 वर्षों से नंदुरबार जिले में आदिवासियों के विकास और उनके हक की लड़ाई लड़ रही हैं. वे बताती हैं, ‘सरकारी आश्रमशालाओं का कोई बुनियादी ढांचा नहीं है. शिक्षक सिर्फ नाम के लिए यहां पढ़ाने आते हैं और स्थायी शिक्षक जिनकी मोटी तनख्वाह है वह तो ड्यूटी से अक्सर नदारद ही रहते हैं.’ वे आगे बताती हैं, ‘सरकारी सहायता प्राप्त आश्रमशालाएं अधिकतर नेताओं और उनके रिश्तेदारों की जागीर बन चुकी है. ये नेता सभी पार्टियों से आते हैं. इनके लिए आश्रमशालाएं एक व्यवसाय हैं. शालाओं में जितने बच्चे होते उससे ज्यादा बच्चे इनके रजिस्टर में दर्ज होते हैं. ये गलत आंकड़े दिखाकर सरकार से पैसा ऐंठते हैं.’

फोटोः प्रतीक गोयल
फोटोः प्रतीक गोयल

शिंदे के मुताबिक बच्चों की सुरक्षा इन आश्रमशालाओं की प्राथमिकता में कहीं नहीं आता. कई बार तो ऐसा होता है कि रात को अधीक्षक बच्चों को बाहर से बंद करके अपने घर चले जाते हैं, छोटे बच्चे जिनको रात को शौच जाना होता है बाहर नहीं जा पाते और कमरों में शौच कर देते हैं और अगले दिन जब अधीक्षक आता है तो ना सिर्फ वह बच्चों को मारता-पीटता है बल्कि उन्हीं से सफाई भी करवाता है. आश्रमशालाओं में शौचालयों के अभाव के चलते जब लड़कियां नहाने के लिए नदियों पर जाती हैं तो अक्सर गांव के मनचले उन्हें परेशान करते हैं.

लोक संघर्ष मोर्चा के एक सर्वेक्षण का हवाला देते हुए शिंदे बताती हैं कि तलोदा, अक्कलकुवा, धाडगांव और शहादा, नंदुरबार जिले की चार तहसीलें हैं. इनमें से शहादा को छोड़कर बाकी तीन कुपोषित इलाकों की श्रेणी में आती हैं. हर साल इन तहसीलों के गांवों की 70 प्रतिशत आबादी (बच्चों सहित ) काम और भोजन की तलाश में दूसरे शहरों में जाती है. ये लोग छह से सात महीने दूसरे शहरों में रहते हैं. जब इतने लम्बे समय के लिए इतनी बड़ी आबादी बाहर रहती है तो फिर कैसे इन आश्रमशालाओं में 400-500 बच्चे पूरा-पूरा साल पढ़ रहे हैं. इन शालाओं के अधिकारी और नेता बच्चों के गलत आंकड़े दिखाकर सरकार से अनुदान ले रहे हैं. वे कहती हैं, ‘इन शालाओं में भ्रष्टाचार चरम पर है, उत्तर महाराष्ट्र की सभी आश्रमशालाओं को बंद कराने के लिए जल्द ही हम एक आंदोलन करने वाले हैं.’

एक स्थानीय आदिवासी कार्यकर्ता सुमित्रा वसावे ने बताती हैं कि  पिछले साल धड़गांव तहसील के रोशमाल गांव की एक आश्रमशाला का दसवीं कक्षा का परिणाम शून्य प्रतिशत आया था, सभी विद्यार्थी फेल हो गए थे. उन्होंने बताया कि इस आश्रमशाला के अगल बगल शराब की बहुत सारी भट्टियां हैं और शिक्षक भी शाला में शराब पीकर पहुंच जाते थे.

जब तहलका ने आदिवासी विकास विभाग प्रकल्प अधिकारी शुक्राचार्य दुधाड़ से उनके तलोदा स्थित दफ्तर में बात की तो उन्होंने बताया, ‘तलोदा में 62 आश्रमशालाएं हैं, जिसमें से 40 सरकारी हैं और बाकी सरकारी सहायता प्राप्त (निजी संस्थाओं द्वारा संचालित ). औसतन एक आश्रमशाला पर सालाना एक करोड़ रुपये खर्च किये जाते हैं. आदिवासी विकास विभाग आश्रमशालाओं को बेहतर बनाने का प्रयास कर रहा हैं. बाकी प्रदेशों के मुकाबले हमारा काम अच्छा है.’

महाराष्ट्र में आदिवासी विकास विभाग के 24 प्रकल्प हैं, जिनमे से 11 प्रकल्पों को संवेदनशील बताया गया है. इन संवेदनशील प्रकल्पों में तलोदा, जवाहर, पांढरकवड़ा, अहेरी, गढ़चिरोली, भामरागढ़, नासिक, कलवन, डहाणु, धारणी और किनवट का नाम आता है. विभाग के नियमों के अनुसार इन इलाकों में प्रकल्प अधिकारी आईएएस दर्जे का होना चाहिए और उसका कार्यकाल कम से कम तीन वर्ष का होना चाहिए. लेकिन प्लानिंग कमीशन के पूर्व सदस्य जयंत पाटिल की समिति की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1982 से लेकर अब तक इन संवेदनशील क्षेत्रों में सिर्फ पांच आईएएस अधिकारियों की पोस्टिंग हुई और इन पांचों का कुल कार्यकाल मिलाकर भी तीन वर्षों से कम रहा है. जयंत पाटिल समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में छह से 14 वर्ष की आयुवर्ग में 19 प्रतिशत आदिवासी बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं, इनमें से सात प्रतिशत बच्चे महाराष्ट्र से हैं.

प्रदेश में आश्रमशालाओं की दयनीय स्थिति को देखते हुए कुछ सामाजिक कार्यकर्ता इनको बंद कराने की मांग कर रहे हैं. नागपुर में सक्रिय विदर्भ जन आंदोलन समिति के नेता किशोर तिवारी उनमें से एक हैं. साल 2012 में तिवारी द्वारा मुंबई हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एमएस शाह को प्रदेश में आश्रमशालाओं की जर्जर स्थिति पर लिखा गया पत्र जनहित याचिका में तब्दील हो गया था. इसके आधार पर कोर्ट ने तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार को आश्रमशालाओं की स्थिति पर हलफनामा पेश करने का नोटिस जारी कर दिया था.

तिवारी कहते है, ‘आश्रमशालाओं के नाम पर राजनेता करोड़ों रुपये खा रहे हैं, जबकि बच्चों का कुछ भला नहीं हो रहा है इसलिए इन आश्रमशालाओं को बंद कर देना चाहिए. इसकी बजाय सरकार को आधुनिक सुविधाओं से लैस हॉस्टल इन आदिवासी बच्चों के लिए हर तहसील में खोलने चाहिए. इन आदिवासी बच्चों को दूसरे बच्चों के साथ अच्छे स्कूलों में तालीम मिलनी चाहिए जिससे इनका भविष्य सुरक्षित हो सके.’ तिवारी के अनुसार इस समस्या का मूल कारण है आदिवासी विकास के लिए घोषित निधि का दूसरे विभागों में बंट जाना.

फोटोः प्रतीक गोयल
फोटोः प्रतीक गोयल

इस पूरे गड़बड़झाले पर तहलका ने आदिवासी विकास विभाग आयुक्त संजीव कुमार से बात की तो उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र में कुल 1108 आश्रमशालाएं हैं. इनमें से 552 सरकारी हैं और बाकी सरकारी सहायता प्राप्त हैं. कुमार कहते हैं, ‘हमें पता है कि आश्रमशालाओं की हालत खराब है लेकिन हम इसे ठीक करने का भरसक प्रयास कर रहे हैं. शालाओं में शिक्षकों की कमी है इसलिए हम 647 नए शिक्षकों की भर्ती कर रहे हैं जो कि अगले एक-दो हफ्ते में प्रदेश भर की आश्रमशालाओं में नियुक्त कर दिए जाएंगे.’

एक रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र से 1794 कंप्यूटर, 299 प्रिंटर और 299 टेबलों के लिए दस करोड़ रुपये की मंजूरी के बावजूद सिर्फ 166 कंप्यूटर ही आश्रमशालाओं के लिए खरीदे गए

आश्रमशालाओं के लिए सरकार ने लगभग 300 करोड़ रुपये का सालाना बजट तय किया है. कुमार मानते हैं कि यह बजट पर्याप्त है लेकिन इस बजट का दो-तिहाई हिस्सा नई आश्रमशालाओं के निर्माण में खर्च किया जा रहा है जिसकी वजह से पुरानी शालाओं के संचालन में रुराकवटें आ रही हैं. आदिवासी विकास विभाग के मुताबिक आदिवासियों के विकास के लिए आदिवासी उप योजना के तहत 4968 करोड़ रुपये के बजट का प्रावधान है. इसमें से छह प्रतिशत हिस्सा आश्रमशालाओं के लिए निर्धारित है.

फरवरी 2014 में हेमानंद बिस्वाल के नेतृत्व में स्टैंडिंग कमिटी ऑन सोशल जस्टिस एंड एम्पावरमेंट ने लोकसभा में अपनी एक रिपोर्ट पेश की थी. इस रिपोर्ट के तहत साल 2001 से 2013 के दौरान महाराष्ट्र में चल रही आश्रमशालाओं में 793 बच्चों की सांप-बिच्छू के काटने और मामूली बिमारियों के चलते मौत हुई थी. नासिक संभाग में सबसे ज्यादा 393 मौतों का मामला सामने आया था. इनमें से 116 बच्चों की मौत नंदुरबार जिले की तलोदा तहसील में हुई थी.

आश्रमशाला योजना के नियमों के अनुसार मृत बच्चों के परिजनों को मुआवजे के तौर पर 15,000 रुपये मिलने चाहिए, लेकिन कमेटी के अनुसार 340 परिवारों को कोई मुआवजा नहीं दिया गया. नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की 2013 की रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र में आश्रमशालाओं के निरीक्षण में कमियां थी और ऑडिट रिपोर्ट में भी इन खामियों की तरफ इशारा किया गया था. इसके पूर्व 2005 में बनी परफॉरमेंस ऑडिट की रिपोर्ट में कहा गया है कि महाराष्ट्र सरकार ने 1953-54 में शुरू हुई आश्रमशाला योजना का कभी कोई मूल्यांकन नहीं किया. 2005 में आई इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि 1999 से 2004 तक किसी भी आश्रमशाला में बच्चों की चिकित्सकीय जांच भी नहीं हुई. जबकि नियमानुसार एक साल में ऐसी चार जांचें होनी चाहिए थीं. रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र से 1794 कंप्यूटर, 299 प्रिंटर और 299 टेबलों के लिए दस करोड़ रुपये की मंजूरी के बावजूद 166 कंप्यूटर ही आश्रमशालाओं के लिए खरीदे गए.

गढ़चिरोली जिले में आदिवासियों के हित की लड़ाई लड़नेवाले लालसू सोमा कहते हैं, ‘शिक्षक इस इलाके की आश्रमशालाओं में आदिवासी बच्चों को पढ़ाना नहीं चाहते. आश्रमशालाओं में बुनियादी ढांचा भी नहीं है, एक ही शिक्षक सारे विषय पढ़ाता है, यह किस तरह की पाठशाला  है.’ सोमा बिनागुंडा गांव (महाराष्ट्र की सीमा से लगे अबूझमाड़ इलाके का एक गांव ) का उदाहरण देते हुए कहते हैं, ‘इस इलाके के बच्चे आश्रमशाला में सिर्फ दो रोटी खाने के लिए जाते हैं, क्योंकि यहां कुपोषण बड़ी समस्या है.’

जब तहलका ने महाराष्ट्र के आदिवासी विकास मंत्री विष्णु सावरा से इन तमाम मुद्दों पर चर्चा की तो वे बोले, ‘मुझे आश्रमशाला की समस्याओं का अंदाजा है. अगले हफ्ते मैं इसका पूरा जायजा लूंगा और इससे संबंधित समस्याओं को सुलझाने के लिए ठोस कदम उठाऊंगा.’ आदिवासी विकास मंत्री के रूप में यह सावरा का दूसरा कार्यकाल है, इसके पूर्व वे सेना-भाजपा सरकार में भी मंत्री रह चुके हैं.

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