न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज

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उनका यह भी तर्क है कि न्यायपालिका और कार्यपालिका को संविधान की धारा 50 के मुताबिक स्पष्ट रूप से अलग-अलग किया गया है और इससे न्यायप्रणाली को स्वतंत्र होकर कार्य करने की ताकत मिलती है. याचिकाओं के मुताबिक संविधान में राज्य के नीति निर्देशक प्रावधानों के तहत यह अनुच्छेद निचली अदालतों के साथ-साथ ऊपरी अदालतों तक बराबरी से लागू होता है.

याचिकाकर्ताओं में से एक भट्टचार्य का कहना है कि संविधान भारत के मुख्य न्यायाधीश को सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति का अधिकार देता है. वे तर्क देते हैं, ‘ अब यह अधिकार एनजेएसी को दिया जा रहा है. आयोग में शामिल चीफ जस्टिस और उनके साथ दो और जस्टिसों की राय को कानून मंत्री वीटो पावर के इस्तेमाल से कभी-भी नकार सकते हैं. इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता बाधित होती है और यह संविधान की उस मूल भावना, जिसके तहत न्यायपालिका को अलग से अधिकार दिए गए हैं, के खिलाफ है.’

राज्य सभा में बीते 14 अगस्त को ही 121वें संविधान संशोधन और एनजेएसी विधेयक को पारित किया है और इससे एक दिन पहले यह लोकसभा में पारित हुआ था.

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