जल सत्याग्रह: ‘लड़ेंगे-मरेंगे, जमीन नहीं छोड़ेंगे’

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इससे पहले वर्ष 2012 में भी राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले एवं पुनर्वास नीति को नजरअंदाज करते हुए बांध को 189 से बढ़ाकर 193 मीटर तक भरने का निर्णय लिया था जिससे 1000 एकड़ जमीन और 60 गांव डूबने की कगार पर आ चुके थे. इसके विरोध में इसी घोघलगांव में 51 पुरुष और महिलाएं जल सत्याग्रह करने लगे जिनके समर्थन में वहां 250 गांवों के करीब 5000 लोग जुड़ गए थे. आंदोलन 17 दिनों तक चला और सरकार द्वारा जमीन के बदले जमीन देने और बांध के जलस्तर को 189 मीटर पर नियंत्रित रखने के आदेश के बाद आंदोलन समाप्त हुआ था.

अब एक बार फिर वही कहानी दोहराई जा रही है लेकिन इस बार सरकार किसानों और प्रभावितों की बात ही सुनने को तैयार नहीं दिखाई पड़ती है, अभी तक कोई भी सरकारी नुमाइंदा उनकी बात सुनने नहीं आया है. उलटे राज्य सरकार के नर्मदा घाटी विकास राज्यमंत्री लाल सिंह आर्य ने इस आंदोलन का आधारहीन करार देते हुए कहा है, ‘महज कुछ लोग ही जलस्तर बढ़ाने का विरोध कर रहे हैं… ओंकारेश्वर नहर से हजारों किसानों को सिंचाई का लाभ देने का विरोध समझ से परे है.’ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने भी कहा, ‘निमाड़ अंचल के किसानों की समृद्घि के लिए ओंकारेश्वर बांध की ऊंचाई 191 मीटर तक करना जरूरी है इसलिए जो लोग भ्रम में आकर जल सत्याग्रह कर रहे हैं वे तत्काल इसे समाप्तकर उत्सव मनाएं.’ वहीं नर्मदा बचाओ आंदोलन के वरिष्ठ कार्यकर्ता और आप के प्रदेश संयोजक आलोक अग्रवाल का कहना है कि किसी के दर्द पर विकास का उत्सव नहीं मनाया जाना चाहिए. उनका आरोप है कि विस्थापितों को बंजर और अतिक्रमित जमीन देकर धोखा दिया गया और आज तक एक भी प्रभावित को सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार सिंचित और उपजाऊ जमीन नहीं दी गई है.
ओंकारेश्वर बांध से प्रभावित रमेश कडवाजी जैसे किसान सत्याग्रह जारी रखे हुए हैं. उनकी 4.5 एकड़ जमीन डूब में आ रही है. शीर्ष अदालत के आदेश के बाद शिकायत निवारण प्राधिकरण ने कहा था कि वे 5 एकड़ जमीन के पात्र हैं. आदेश के अनुसार रमेश ने मुआवजे के मिले 3 लाख रुपये वापस कर दिए. इसके बदले में उन्हें अतिक्रमित व गैर उपजाऊ जमीन दिखाई गई, जिसे उन्होंने लेने से इंकार कर दिया. अभी तक उन्हें कोई दूसरी जमीन नहीं दिखाई गई है. अब उन जैसे सैकड़ों किसान अपने पैरों को सड़ाकर अपना प्रतिरोध जताने को मजबूर है.

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