पतंग, लड़की और डोर…

पतंग को देखते-देखते वर्षों बीत गए. उसे पता ही नहीं चला कि कब वह जवान हो गई. उसे बस यह पता था कि अभी उसे अपने पैरों पर खड़ा होना है. मां-बाप का नाम रोशन करना है. और भी बहुत कुछ… कल न उसने आकाश देखा, न छत और न ही पंतग. ऐसा क्योंकर हुआ? जबकि कल उसकी तबीयत भी ठीक थी. अलबत्ता उसका मूड पूरे दिन जरूर खराब रहा. कल उसे देखने लड़के वाले आए थे. पतंग को उड़ते देख अकसर खुश होने वाली लड़की,उन्हें उड़ता देख अचानक से उदास हो गई है. तभी मां की आवाज ऊपर आई. आश्चर्य! मां की आवाज में तल्खी नहीं उल्लास है. घोर आश्चर्य! आज एक ही बार में उसने सुन लिया मां की आवाज को! अब वह नीचे उतर रही है. वह समझ गई है कि उसका रिश्ता पक्का हो गया है. कमाल है, उसने पलट कर उड़ती पतंग को नहीं देखा. ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ था!

आज घर में खुशी का माहौल है. सब खुश है. वह सबके खुश होने की वजह से खुश है या वाकई वह भी अंदर से खुश है. वह तय नहीं कर पा रही है. थोड़ी देर पहले उसने अपने पापा से एक सवाल किया था. सवाल सुन पापा बोले थे कि ये कैसा ऊटपटांग सवाल है. अभी-अभी मम्मी से उसने वही सवाल किया. मम्मी हंसकर बोल रही है कि बांस जैसी हो गई पर अकल रत्ती भर नहीं आई. उसने सोचा क्यों न यही सवाल छोटे भाई से पूछे. मगर उसने नहीं पूछा. इस डर से कि वह मुंहफट उसे पगली न कह दे.

अब वह खुद से सवाल पूछ रही है, पतंग क्या वाकई उड़ती है या सिर्फ उड़ती हुई दिखती है?

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