फिर बारूद पर बस्तर

25 मई 2013 को नक्सलियों ने जगदलपुर के पास झीरम घाटी में घात लगाकर महेंद्र कर्मा समेत 27 कांग्रेस नेताओं की हत्या कर दी. महेंद्र कर्मा सलवा जुडूम शुरू करने के बाद से ही नक्सलियों की हिट लिस्ट में थे. उन पर इसके पहले भी कई बार जानलेवा हमला हो चुका था, हर बार वे बच निकले थे. लेकिन झीरम में उनकी बर्बरतापूर्वक हत्या कर दी गई. सलवा जुडूम बंद होने के बाद उसके कई नेता मारे गए. उनके नामों की सूची बहुत लंबी है. बाकी बचे हुए नेता या तो शहरों में शरण लिए हुए हैं, या फिर बंदूकों के साए में जीने को मजबूर हैं.

अब यही सारे लोग फिर से बस्तर संघर्ष समिति के बैनर तले मजबूत होना चाहते हैं. सलवा जुडूम के पुराने नेताओं ने कर्मा परिवार के साथ मिलकर एक बार फिर नक्सलियों के खिलाफ आंदोलन छेड़ने का ऐलान कर दिया है. 25 मई 2015 को महेंद्र कर्मा की दूसरी पुण्यतिथि के मौके पर आंदोलन की रणनीति तय की जानी है.

आंदोलन का ऐलान होते ही नक्सलियों के दंडकारण्य जोनल कमेटी के प्रवक्ता गुडसा उसेंडी ने विज्ञप्ति जारीकर छविंद्र कर्मा से आंदोलन वापस लेने की चेतावनी भी दे दी है. नक्सलियों ने छविंद्र को मारने की धमकी भी दी है. वहीं दिंवगत नेता महेंद्र कर्मा के पुत्र छविंद्र कर्मा कहते हैं, ‘सलवा जुडूम बंद नहीं होता तो कम से कम दक्षिण बस्तर से नक्सलवाद को हम खत्म कर चुके होते. लेकिन दुर्भाग्यवश सलवा जुडूम ही बंद कर दिया गया और इस कारण महेंद्र कर्मा समेत हमारे कई बड़े नेता मारे गए. अब हम फिर एकजुट हो रहे हैं. नक्सलियों का बयान यह साबित करता है कि वे हमसे डर गए हैं.’

छविंद्र कर्मा, कांग्रेस के भी नेता हैं लेकिन उनकी ही पार्टी उनके इस अभियान का विरोध करती नजर आ रही है. छत्तीसगढ़ के नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव ने साफ कर दिया है कि आंदोलन से कांग्रेस का कोई लेना-देना नहीं है. वहीं भाजपा ठीक 2005 ही की तरह कर्मा परिवार की इस कवायद का स्वागत कर रही है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष धरमलाल कौशिक कहते हैं, ‘इसमें गलत क्या है. गांववाले एक बार फिर नक्सलियों का विरोध कर रहे हैं. हम इस आंदोलन का समर्थन करते हैं.’

इन सब के बीच छत्तीसगढ़ पुलिस ने मौन धारण कर रखा है. राज्य के पुलिस महानिदेशक एनएन उपाध्याय इस विषय पर बात नहीं करना चाहते. हालांकि हकीकत ये भी है कि बस्तर में पिछले कुछ सालों में नक्सल गतिविधियों में तेजी आई है. आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2005 से अप्रैल 2015 तक छत्तीसगढ़ में 2232 लोगों की हत्या नक्सलियों के हमले में हुई है. इस हिसाब से राज्य में नक्सल हमले में औसतन दो दिनों में एक मौत हुई है. 11 सालों में 896 सुरक्षा बल के जवान, 667 आम नागरिकों की मौत हुई है तो दूसरी तरफ पुलिस द्वारा 709 नक्सलियों को मार गिराने का दावा किया गया है. सर्वाधिक मौत का आंकड़ा 2006 में दर्ज है. इस साल 361 की मौत हुई थी. 2007 में 350, 2009 में 345 और 2010 में 327 लोगों की मौत हुई थी. 2015 में ही पांच महीनों में अभी तक 30 लोगों की मौत हुई है, जिनमें 17 सुरक्षा बल के जवान, नौ नागरिक व दो नक्सली शामिल हैं. 11 सालों में नक्सली हमले में 2232 झारखंड में 1344, आंध्र प्रदेश में 712, ओडिशा में 612 एवं महाराष्ट्र में 424 लोगों की मौत हो चुकी है.

बहरहाल अविभाजित मध्य प्रदेश से अलग हुए छत्तीसगढ़ को नक्सलवाद विरासत में मिला है. सलवा जुडूम जैसा आंदोलन भी छिटपुट रूप से नब्बे के दशक में आकार लेने लगा था. भले ही 2005 में यह व्यापक रूप में सामने आया. सलवा जुडूम के दौरान बस्तर के आदिवासियों ने मौत का नंगा देखा है. दोनों तरफ से चलती बंदूकों के बीच फंसा निर्दोष आदिवासी एक बार फिर चिंतित है कि वह किसके पाले में जाए और किससे दूर रहे क्योंकि मरना तो उसे दोनों तरफ से है. उसे तो बस यह
चुनने की आजादी मिली है कि वह किसकी गोली से मरना चाहता है.

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