आरटीआई:सूचना! पूछ ना

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सूचना अधिकार को लेकर लंबी लड़ाई लड़ चुके अधिकांश आंदोलनकारी और कार्यकर्ता इसे प्रशासनिक भ्रष्टाचार से लेकर राजनेताओं तथा नौकरशाहों के बीच सांठ-गांठ तक उन तमाम कारणों से जोड़ते हैं जो वर्तमान व्यवस्था को इस कदर पंगु बनाने के लिए जिम्मेदार रहे हैं.

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जाने-माने सूचना अधिकार कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल के मुताबिक सरकार तथा उसे चलाने वाले अधिकारियों की मिलीभगत इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है. उनके मुताबिक सूचना देने के लिए जिम्मेदार अधिकारी आवेदक से इतनी मशक्कत इसलिए करवाते हैं ताकि वह थक हारकर बैठ जाए और प्रशासन में व्याप्त अनियमितताएं सामने न आ सकें. वे कहते हैं, ‘जब भी किसी गंभीर गड़बड़ी की आशंका वाले मामले को लेकर सूचना मांगी जाती है तो आवेदक को या तो कागजों का भारी-भरकम पुलिंदा पकड़ा दिया जाता है या फिर उसके आवेदन को कई-कई विभागों को भेज दिया जाता है. इसके बाद उन सभी विभागों से आवेदक को अलग-अलग भाषा विन्यास वाले ऐसे–ऐसे जवाब मिलते हैं जिनको समझने में ही आवेदक चकरा जाता है और सूचना पाने का उसका उद्देश्य बुरी तरह प्रभावित हो जाता है.’ अग्रवाल की मानें तो यह सीधे-सीधे सूचना अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 6 (3) का खुला दुरुपयोग है. वे कहते हैं, ‘कई बार आवेदक को मालूम नहीं होता कि उसे सूचना किस विभाग से मिलेगी. इस बात को समझते हुए आरटीआई एक्ट 2005 की धारा 6 (3) में प्रावधान बनाया गया कि यदि किसी लोक सूचना अधिकारी को लगता है कि मांगी गई सूचना किसी दूसरे विभाग से संबंधित है तो उसका दायित्व है कि वह उस आवेदन को संबंधित विभाग को भेज दे.’ देखा जाए तो यह प्रावधान जनता की सहूलियत के लिए बनाया गया है. लेकिन कई बार अधिकारी धारा 6 (3) का सहारा लेकर आवेदन को सिर्फ इसलिए अलग-अलग विभागों को भेज देते हैं ताकि सूचना छिपाई जा सके. इस तरह अधिकारी सूचना नहीं देने के जुर्म से भी बच जाते हैं और आवेदक को सही सूचना भी नहीं मिल पाती.

अपने खुद के अनुभवों का जिक्र करते हुए अग्रवाल कहते हैं, ‘कुछ समय पहले मेरे एक आवेदन को सीपीडब्ल्यूडी ने अपने 200 कार्यालयों को अंतरित (भेज) कर दिया था. इन विभागों की तरफ से बेतरतीब संख्या में मुझे मिलनेवाली चिट्ठियों का सिलसिला अभी तक बरकरार है. इसके अलावा कई केंद्रीय विभागों के साथ मेरे इस तरह के बहुत से अनुभव रहे हैं जब मेरे आवेदनों को सैकड़ों विभागों को अंतरित कर दिया गया. इसके चलते उन विभागों से आनेवाले जवाबी पत्रों की संख्या ही कई बार 1000 के भी पार हो जाती है. कल्पना की जा सकती है कि हजार चिट्ठियों को लिखने और भेजने में कितना समय और सरकारी धन बेवजह बर्बाद होता होगा.’

अग्रवाल की इन बातों से एक ऐसा महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है जो सूचना देने में देर लगानेवाले एक बड़े तर्क को कटघरे में खड़ा करता नजर आता है. दरअसल कई बार ऐसा भी देखा गया है कि कई विभाग कर्मचारियों की कमी का बहाना बनाकर ‘सूचना एकत्रित की जा रही है’ जैसे जवाबों के सहारे अनावश्यक रूप से जवाब देने में देरी करते हैं. लेकिन सवाल यह है कि जब अग्रवाल के एक आवेदन के जवाब में अनावश्यक रूप से ताबड़तोड़ चिट्ठियां भेजने के लिए विभागों के पास कर्मचारियों की इतनी अधिक भरमार है तो फिर जरूरी सवालों का जवाब देने के लिए उनके पास कर्मचारियों का टोटा कैसे हो जाता है. इस सवाल का जवाब देते हुए खुद अग्रवाल कहते हैं, ‘यह मामला कर्मचारियों की कमी का नहीं बल्कि इच्छाशक्ति की कमी का है.’

लेकिन आरटीआई के तहत लगाये जानेवाले आवेदनों के ऐसे हश्र के लिए क्या सिर्फ यही कारण जिम्मेदार है? पूर्व सूचना आयुक्त शैलेश गांधी इस बात से इंकार करते हैं. उनके मुताबिक अनियमितताओं को छुपाने के लिए इस तरह के हथकंडे अपनाए जाने के अलावा और भी बहुत से कारण हैं जिनके चलते लोगों को सूचना के लिए इतनी जद्दोजहद करनी पड़ रही है. गांधी के मुताबिक सरकारी विभागों में सूचना देने के लिए अधिकृत किए गए अधिकारियों का इस काम में पारंगत न होना भी इसका एक बड़ा कारण है. वे कहते हैं, ‘तमाम सरकारी विभागों में सूचना अधिकारी के रूप में नियुक्त किए गए अधिकतर कर्मचारियों की आरटीआई एक्ट को लेकर जानकारी बेहद कम है. ये कर्मचारी कई बार इतना तक नहीं जानते कि किसी फाइल का कौन-सा पन्ना सूचना है और कौन-सा नहीं. यह भी एक बड़ी वजह है कि अपने सर की बला टालने के लिए वे आवेदक को पूरी की पूरी फाइल ही पकड़ा देते हैं.’

अधिकार पर वार

1. एक साल के दौरान तहलका ने केंद्र और राज्यों के कई अहम विभागों में 50 से ज्यादा आरटीआई आवेदन लगाए
2. छह मामलों के अलावा किसी में भी पहली बार में सूचना नहीं मिल सकी
3. एक आवेदन तो इसलिए अमान्य हो गया कि इसमें क्यों, कैसे और कितने जैसे प्रश्नावाचक शब्दों का प्रयोग किया गया था
4. एक ही तरह के सवालों को लेकर अलग-अलग राज्यों के सरकारी विभागों का अलग-अलग रवैय्या और जवाब देखने को मिला

गांधी की यह बात देहरादून के आरटीओ कार्यालय की एक करामात से समझी जा सकती है. कुछ साल पहले इस कार्यालय के लोक सूचना अधिकारी ने एक आवेदक को चार बिंदुओं की सूचना के जवाब में 20 हजार रुपये की मोटी फीस लेकर 10 हजार पेज का भारी-भरकम पुलिंदा थमा दिया था. ताज्जुब की बात यह थी कि आटो में भरकर घर तक लाए गए कागजों के इस ढेर को खंगालने पर आवेदक को केवल 40 पन्नों में ही वह सब सूचना मिल गई जो उसे चाहिए थी. इस तरह जो सूचना उसे सिर्फ 80 रुपये में मिलनी चाहिए थी उसके लिए उसे 10 हजार रुपये चुकाने पड़े.

अनावश्यक रूप से कागजों के गट्ठर पकड़ाकर सूचना के नाम पर खानापूर्ति करने का यह सिर्फ एक उदाहरण है. आरटीआई कानून और आम आदमी के साथ किए जानेवाले मजाक के देश-भर में इतने मामले हैं कि उनको लेकर एक पूरा ग्रंथ लिखा जा सकता है. पिछले साल आरटीआई एक्ट के आठ साल पूरे होने पर नई दिल्ली में हुए एक सम्मेलन में भी इस तरह की बातें सामने आईं थी. केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा आयोजित किए गए उस सम्मेलन में बहुत से राज्यों के सूचना आयुक्तों ने इस बात को स्वीकार किया था कि उनके पास ऐसे बहुत से मामले आते हैं जिनमें कई सूचना अधिकारी इस बात को स्वीकार करते हुए कम से कम जुर्माना लगाने की मांग करते हैं कि उन्हें एक्ट के नियमों की पूरी जानकारी नहीं थी. गांधी कहते हैं, ‘सरकारों को चाहिए कि वे सूचना देने के लिए अधिकृत किए गए अपने अधिकारियों को प्रशिक्षण दें ताकि आम जनता को सटीक और समयबद्ध सूचना मिल सके, लेकिन संकट यह है कि सरकारें ऐसा करना ही नहीं चाहतीं क्योंकि ऐसा होने पर उन्हें खुद के काले कारनामों के उजागर रहने का डर रहता है.’

5 COMMENTS

  1. अच्छा लेख. धन्यवाद। प्रदीप जी वास्तविकता यह की कानून बनने के बाद सूचना मांगने वालो की हत्याएं हुई उनकी सुरछा के लिए कोई व्यवस्था नहीं, दूसरा सूचनाये अधिकतर सिस्टम के भ्रस्टाचार से सम्बंधित होती जिसे देने में विभाग सहयोग नहीं करते तीसरा भ्रस्टाचार से जुडी सूचनाये मीडिया में आसानी से छपती नहीं है, स्थानीय मीडिया को पता भी होता है किन्तु अज्ञात कारणों से उसके वक्त पर छापा नहीं जाता उदहारण के लिए के लिए बता दू तहलका में राहुल कोटियाल जी ने “चिन्ह पर प्रश्न चिन्ह” नाम से एक विस्तृत खबर छापी थी जो मुख्यतः जनसूचना अधिनियम के द्वारा ही प्रकाश में आयी थी. हमने शुरू से ही अनियमिततवो के बारे में मीडिया को बताना शुरू किया किन्तु सब जानते हुए काफी दिनों तक चुप रहे. यहाँ तक की रूपये के प्रतीक चिन्ह के प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी किसी विद्वान पत्रकार ने (नाम अब तक अज्ञात) यह बात उठाई किन्तु रहस्यमई तरीके से यह बात दबा दी गयी थी. हालाँकि तहलका के संज्ञान में आने पर छापी गयी. यदि लोकमहत्व के विषय मीडिया में वक्त पर आ जाये तो अदालत की दहलीज पर माथा क्यों पटका जाता अंत में कोर्ट ने जो आदेश किया आज भी जिंतनी प्रतीक चिन्ह प्रतियोगिताएँ हो रही है उनका पालन नहीं किया जा रहा है, कब तक आप लड़ेंगे? इन्ही सब वजहों से नागरिक का विश्वास हौसला टूट जाता है बरबस उसे “होहिहै वही जो राम रचि रखा” मानकर संतोष करना पड़ता है. दरअसल इन दिनों आवेदको में डर मिश्रित निराशा घर कर गयी है. अच्छा होता लोकमहत्व के विषयो को उठाने वालो को सम्मानित पुरस्कृत किया जाये मीडिया में “जनसूचना” की खबरों विशेष पत्रकार और सेल नियुक्त किये जाये। तभी यह अपने उद्देश्यों को प्राप्त कर सकेगा अन्यथा ” समय, ऊर्जा और धन की बर्बादी का” आधार बता कर इस अधिनियम को दफ़न कर दिया जायेगा, और आवेदक “बरबस सती” होता रहेगा। “सती प्रथा” की तरह ही “सूचना प्रथा” कहा जाने लगेगा यह फिर हो जायेगा प्रतिबन्ध, और अर्जुन की तरह नागरिको को मिला यह गाण्डीव निस्तेज हो जायेगा। आपने/तहलका ने इस मुद्दे पर तथ्यपरक लेख लिखा पुनः हार्दिक धन्यवाद।

  2. Unique Identification Authority of India (आधार कार्ड) की वेबसाइट ने एक बहुत अच्छा सरहनीय कार्य किया है, यह की जनसूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत जितने भी आवेदको ने उनसे सूचना मांगी उन सभी आवेदको के आवेदन पत्र और उस पर दी गयी सूचना का पी० डी० एफ० बनाकर अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित/अपलोड कर दिया है. मै उसका लिंक भी आपसे साझा कर रहा हूँ कृपया देखे और और ऐसी ही व्यवस्था हेतु समस्त सरकारी संस्थानों को लिखे सोशल मीडिया पर अभियान चलाये। इस व्यवस्था से कोई भी आवेदक “सुचना की पुनरावृति” नहीं करेगा और आवेदक का पैसा /संस्थान की ऊर्जा और समय बचेगी साथ ही पारदर्शिता की आँधी भी चल पड़ेगी । धन्यवाद।
    http://uidai.gov.in/rti/rti-requests.html?view=details

  3. बेहतरीन आलेख भाई, पहले प्रिंट संस्करण में भी पढ़ चुका था, आज ई संस्करण फिर से पढ़ा, अब तक काफी और कड़वे अनुभव हो चुके हैं, इस पर कम करते हुए…..

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