कर्ज में झारखंड, बढ़ता विधायक फंड

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Photo : Amit Das

बात फरवरी महीने की है. झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास एक आयोजन में मुंबई गए थे. उस आयोजन में प्रधानमंत्री मोदी भी शिरकत कर रहे थे. कार्यक्रम में उन्होंने रघुबर दास का परिचय कराया, ‘ये हैं हमारे सबसे अमीर राज्य के मुख्यमंत्री.’ इस पर रघुबर दास फूले नहीं समाए. कुछ ही देर में यह बात सोशल मीडिया से होकर मुंबई से झारखंड पहुंच गई. भाजपा के नेता भी गर्व-गौरव के साथ बताने लगे कि देखा, प्रधानमंत्री ने कैसे हमारे मुख्यमंत्री की प्रशंसा की. इस बात पर झारखंड में पार्टी-शार्टी जैसा माहौल तैयार हो गया.

झारखंड सबसे अमीर राज्य है कि नित नए संकटों में फंसता हुआ राज्य यह बहस का विषय है. वैसे प्रधानमंत्री ने जब रघुबर सरकार को सबसे अमीर राज्य का मुख्यमंत्री बताया तब शायद मोदी को यह मालूम नहीं था कि वे उस राज्य के मुख्यमंत्री की तारीफ कर रहे हैं जो 45 हजार करोड़ रुपये के कर्ज में फंसा हुआ है. तमाम संपदाओं और संभावनाओं के बावजूद एक ऐसा राज्य जहां पैदा होते ही बच्चे के सिर पर बिना कर्ज लिए तकरीबन 1400 रुपये का कर्ज चढ़ जाता है. खैर, प्रधानमंत्री इस बात को जानते हैं या नहीं यह तो नहीं मालूम लेकिन रघुबर दास को शायद प्रधानमंत्री का यह अंदाज पसंद आया. सबसे अमीर राज्य का मुख्यमंत्री कहलाना पसंद आया और उन्होंने इस बात को गुरुमंत्र मान तुरंत इसे साबित करने की भी कोशिश की.

मुंबई से लौटे तो झारखंड में बजट पेश करने का समय आया. 19 फरवरी को बजट पेश हुआ. बजट में घोषणाओं की झड़ी लगी और तमाम घोषणाओं के बीच एक और विचित्र घोषणा हुई. विधायकों के फंड से लेकर वेतन-सुविधा आदि बढ़ाने की घोषणा. सदन में तालियां बजीं. कुछ लोगों ने कहा कि लीजिए, रघुबर दास ने इसे साबित किया कि झारखंड देश में वाकई सबसे अमीर राज्य है और वे उस अमीर राज्य के मुख्यमंत्री हैं.

झारखंड में विधायक फंड और विधायकों के वेतन आदि का एक बार फिर से बढ़ना आश्चर्यजनक था. इस पर वाद-विवाद की गुंजाइश थी. बहस होने की उम्मीद की जा रही थी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. तालियां बजीं, प्रस्ताव पारित हुआ. झारखंड में विधायक फंड को तीन करोड़ से चार करोड़ रुपये कर दिया गया है. विधायक फंड में हुई इस बढ़ोतरी के बाद झारखंड विधायक फंड के मामले में दिल्ली को भी पछाड़कर देश का अव्वल राज्य बन गया है.

विधायक फंड की इस बढ़ोतरी पर परंपरागत तौर पर सभी दलों ने चुप्पी साधे रखी तो यह आश्चर्यजनक नहीं था. उससे ज्यादा आश्चर्यजनक घटना दो दिन बाद दिखी. बजट के दो दिन बाद सरकार ने जब राज्य के सभी प्रमुख दैनिक अखबारों में बजट के समर्थन में कसीदे पढ़ते हुए कवर विज्ञापन छापे तो चर्चित बुद्धिजीवी प्रगतिशील लोगों ने भी ‘पेड आर्टिकल’ लिखकर सरकार के बजट की दिल खोलकर तारीफ की.

झारखंड में सरकारों के बदलने का जो दौर चला, उसमें प्रायः  सभी सरकारों ने अपने-अपने तरीके से विधायक फंड को बढ़ाया और विधायकों के वेतन भी बढ़ाए. यह इस गति से बढ़ा जो कीर्तिमान जैसा है

झारखंड में विधायक फंड की फंडेबाजी समझने से कई बातें साफ होती हैं. परत-दर-परत कई तथ्य भी सामने आते हैं, जो यह बताते हैं कि क्यों एक-दूसरे को पानी पी-पीकर कोसने वाले और एक-दूसरे से भिड़ने को तैयार रहने वाले दल भी विधायक फंड बढ़ा दिए जाने वाले मसले पर मौन साध लेते हैं. झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री व झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता हेमंत सोरेन से बात होती है तो वे कहते हैं कि विधायक फंड का बढ़ना, न बढ़ना एक बात है, असली सवाल यह है कि काम सिस्टम से होगा या नहीं. हेमंत कहते हैं, ‘जहां तक विधायक फंड की बात है तो यह सब जानते हैं कि जनता के बीच सबसे करीब विधायक ही होते हैं. त्वरित राहत देने का काम वही करते हैं. वे वही काम करते हैं जो सरकार के दूसरे विभागों के जरिए होना होता है लेकिन सरकार के विभाग से जो काम होते हैं, उस प्रक्रिया में एक फाइल को हजार लोगों से होकर गुजरना होता है, तब जाकर काम होता है. एक शौचालय बनवाना हो तो उसके लिए विभाग है लेकिन उस सरकारी विभाग को शौचालय बनवाने में पांच माह लग जाते हैं जबकि विधायक पांच दिन में बनवा देते हैं. इसलिए जनता को जो फौरी सहयोग चाहिए, फौरी तौर पर राहत चाहिए, उसके लिए विधायक फंड का बढ़ना जरूरी ही होता है.’ हेमंत जो बात कहते हैं उसे और विस्तार से भाजपा विधायक डॉ. जीतू चरण राम कहते हैं. जीतू कहते हैं, ‘आज झारखंड की जो स्थिति है, जिस तरह से हर चीज की कीमत बढ़ रही है, उसमें विधायक फंड का बढ़ना जरूरी ही था. हम लोगों ने तो पांच करोड़ की मांग की थी लेकिन अभी चार करोड़ रुपये ही हो सका है. अभी झारखंड में स्थायी सरकार बनी है, लोगों की अपेक्षा बढ़ी है, वे तुरंत विकास चाहते हैं और तुरंत विकास का काम विधायक ही कर सकते हैं, इसलिए उनका फंड तो बढ़ना ही चाहिए. विधायक सरकार और जनता के बीच की कड़ी होता है. उसे दवाई की जरूरत होती है, इंजेक्शन की जरूरत होती है, उसके लिए तो विशेष इंतजाम करने ही होंगे.’ यह पूछने पर कि भाजपा शासित दूसरे प्रदेशों में तो काफी कम विधायक फंड है, जीतू कहते हैं, ‘वहां वर्षों से स्थायी सरकार है, इसलिए वहां विकास की गति वर्षों से ठीक है. झारखंड में पहली बार स्थायी सरकार बनी है तो देख लीजिए डेढ़ साल में काम की गति कितनी तेज है. अगर राज्य बनने के बाद से ही यहां स्थायी सरकार बनी रहती तो विधायक फंड कम रहने से भी काम चलता.’

विरोधी दल झामुमो के हेमंत सोरेन हों या सत्ताधारी दल भाजपा के जीतू चरण, लगभग एक जैसी ही बातें करते हैं. यही दोनों नहीं, अलग-अलग पार्टियों के कई लोगों से बात होती है तो वे भी इसी लब्बोलुआब के साथ बात करते हैं. इन सबके बीच भाजपा के ही एक विधायक शिवशंकर उरांव होते हैं जो डंके की चोट पर अपनी ही सरकार की बखिया उधेड़ते हुए सच और फंड की फंडेबाजी के गणित के बारे में बताते हैं. बकौल शिवशंकर, ‘झारखंड में विकास के नाम पर जितने किस्म के फंड एलॉट होते हैं, उनमें 59 प्रतिशत राशि तो कमीशन में ही चली जाती है. यहां के विधायक हों या सांसद, किसी को संस्थागत भ्रष्टाचार की चिंता नहीं. जूनियर इंजीनियर, बड़ा बाबू से लेकर पत्रकार और नेता सबने अपना कमीशन तय कर लिया है इसलिए अधिक फंड बढ़े या योजनाओं के लिए अधिक राशि का प्रावधान हो, विकास की योजनाएं धरातल पर नहीं उतरने वालीं.’

शिवशंकर उरांव साहस के साथ अपनी बात रखते हैं. हालांकि यह भी सच है कि ऐसा सिर्फ रघुबर दास की सरकार ने नहीं किया, बल्कि झारखंड में सरकारों के बदलने का जो दौर चला, उसमें प्रायः सभी सरकारों ने अपने-अपने तरीके से विधायक फंड को बढ़ाया और विधायकों के वेतन भी बढ़ाए. और यह इस गति से बढ़ा कि झारखंड ने देश में कीर्तिमान कायम कर लिया. राज्य बनने के बाद से झारखंड में विधायकों के वेतन नौ बार बढ़ा दिए गए हैं और विधायक फंड में आठ गुना बढ़ोतरी हो गई है. जब से इस बढ़ोतरी की परंपरा शुरू हुई है तब से इक्का-दुक्का लोगों ने ही इसका विरोध भी किया है. पहले भाकपा माले के विधायक रहे कॉमरेड महेंद्र सिंह इस बढ़ोतरी का विरोध अपने समय में करते थे और बाद में उनके बेटे विनोद सिंह जब विधायक बने तब उन्होंने भी खुलकर इस बढ़ोतरी का विरोध किया. कॉमरेड विनोद सिंह कहते हैं, ‘हम इस तरह की वित्तीय अराजकता और मनमानेपन के खिलाफ हमेशा लड़ते रहे हैं और अपना विरोध जताते रहे हैं लेकिन सभी दल इस पर सहमत हो जाते हैं. इस वजह से जिन-जिन सरकारों ने विधायक फंड को बढ़ाया, वे कभी फंसे नहीं. चूंकि कभी फंसे नहीं, इसलिए इसे जब जी में आया, मनमर्जी से वेतन बढ़ाना आसान रहा.’ विनोद सिंह बात सही कहते हैं कि कभी सरकारें फंसी नहीं लेकिन सदन में विरोधियों द्वारा नहीं फंसने का मामला अलग है. महेंद्र सिंह-विनोद सिंह को छोड़ दें तो इस विधायक फंड के खेल पर कई बार एजी (अकाउंटेंट जनरल) ने आपत्ति दर्ज कराई है. एजी ने कहा है कि राज्य बनने के बाद से अब तक विधायक फंड के 600 करोड़ रुपये का कोई हिसाब-किताब ही नहीं हो सका है. खैर, झारखंड में सरकारें एजी और कोर्ट की फटकार सुनने की अभ्यस्त रही हैं, इसलिए इस आपत्ति की परवाह किए बगैर अपने तरीके से फैसले लिए जाते रहे हैं. विधायक फंड और विधायकों के वेतन बढ़ाए जाते रहे हैं.

झारखंड में विधायक फंड बढ़ने से क्या परेशानी बढ़ेगी? तमाम संपदाओं और संभावनाओं के बावजूद कर्ज के गणित से चल रहे राज्य में किस किस्म का संकट सामने आएगा, इसे समझने के पहले झारखंड में विधायक फंड से विधायकों को होने वाली पौ बारह के बारे में जान लेना जरूरी है. झारखंड में यह धारणा है कि ईमानदार से ईमानदार विधायक भी, कुछ अपवादों को छोड़कर, अपने घर पर भी बैठा रहे तो विधायक फंड से 20-25 प्रतिशत राशि ‘कट मनी’ के रूप में उसके पास पहुंच जाती है. इस बात को लेकर कई बार अखबारों में सवाल उठते रहे, उसका कभी किसी विधायक की ओर से खंडन नहीं हुआ, इसलिए यह धारणा पुष्ट हुई कि विधायकों के पास 20-25 प्रतिशत कट मनी पहुंचने वाली बात में कोई शक नहीं. इस तरह देखें तो अब जबकि झारखंड में चार करोड़ रुपये का विधायक फंड निर्धारित हो गया है तो कम से कम लगभग एक करोड़ रुपये की कमाई हर साल विधायकों को घर बैठे होगी, बिना हाथ-पांव हिलाए. सिर्फ विधायक फंड के कागज पर हस्ताक्षर करके. विधायक फंड पहले झारखंड में तीन करोड़ रुपये का था लेकिन कई विधायक इस तीन करोड़ रुपये की राशि से संतुष्ट नहीं थे. अपने क्षेत्र में विकास का वास्ता देकर वे लगातार विधायक फंड को बढ़ाने का दबाव सदन में दे रहे थे. विधायकों की मांग इसे पांच करोड़ रुपये कर देने की थी, फिलहाल चार करोड़ रुपये पर लाकर रोका गया है. मजेदार यह है कि इसके पहले जब हेमंत सोरेन राज्य के मुख्यमंत्री थे तो उन पर भी यह दबाव था लेकिन हेमंत ने इस मांग को परे रखा था. यहां पर यह जान लेना दिलचस्प है कि झारखंड में विधायक फंड की ताबड़तोड़ बढ़ोतरी होती रही है. जब राज्य बना था यानी वर्ष 2000 में तो यह 50 लाख रुपये था. फिर पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के कार्यकाल में इसे एक करोड़ रुपये किया गया था. फिर अर्जुन मुंडा की सरकार बनी तो उन्होंने इसे दो करोड़ रुपये कर दिया. बहुचर्चित मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की बारी आई तो उन्होंने तीन करोड़ रुपये कर दिया था. रघुबर के पहले हेमंत सोरेन की सरकार रही. वे इस पर चुप्पी साधे रहे लेकिन राज्य में विकास के प्रति प्रतिबद्ध भाजपा सरकार ने इसे आसानी से चार करोड़ रुपये कर दिया. बिना इस बात पर विचार किए कि इस बढ़ोतरी से हर साल 82 करोड़ रुपये का जो बोझ राज्य के खजाने पर बढ़ेगा, उसकी भरपाई कहां से होगी. खैर! यह तो विधायक फंड की बात हुई. विधायकों के वेतन-भत्ते वाले पक्ष को देखें तो इसका खेल और भी मजेदार या शर्मनाक नजर आता है. उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य से तुलना करें या झारखंड के ही पड़ोसी राज्य ओडिशा से तो झारखंड के विधायकों का वेतन, भत्ता, सुविधा मद में मिलने वाली राशि आदि तीन गुना ज्यादा है. अगर एक और पड़ोसी पश्चिम बंगाल से तुलना करें तो बंगाल में विधायकों को जितना वेतन-भत्ता आदि मिलता है, उतना वेतन झारखंड में विधायकों के निजी सहायकों को मिलता है.

वरिष्ठ पत्रकार आनंद मोहन कहते हैं, ‘विधायक फंड या वेतन भत्ता आदि का बढ़ जाना कोई बड़ा मसला नहीं. सवाल दूसरा है. विधायक यह दलील देते रहते हैं कि योजना मद की राशि बढ़ती जा रही है इसलिए विधायक फंड का बढ़ना स्वाभाविक है लेकिन वह खर्च कैसे होता है और कहां होता है, यह जानने से लगता है कि झारखंड के विधायकों के लिए फंड बेतहाशा क्यों बढ़ाया जाए.’ आनंद कहते हैं, ‘एजी ऑफिस 600 करोड़ रुपये का हिसाब अब तक मांग रहा है, वह नहीं दिया जा रहा है. अब होता यह है कि विधायक फंड की राशि को विधायक पहले ही उप विकास आयुक्त के पास निकलवाकर रख देते हैं और फिर अपने हिसाब से उसे खर्च करवाते रहते हैं. यह तो अजीब बात है. विधायक फंड की राशि अगर खर्च होगी तो ग्राम सभा से भी योजनाओं पर सहमति ली जाएगी. लेकिन झारखंड में ऐसा नहीं होता. विधायक बस फंड की फंडेबाजी अलग-अलग विभागों से मिलकर कर लेते हैं और फंड के अधिकांश हिस्से का पता ही नहीं चलता कि वह किस-किसके विकास में गया.’ आनंद मोहन जैसी बात कई लोग करते हैं. लेकिन ऐसी बात करने वाले बाहर के लोग होते हैं. सदन के लोग नहीं. जो सदन में माननीय विधायक हैं, वे अब चार करोड़ रुपये के बाद पांच करोड़ रुपये की मांग वाले अभियान को शुरू करने का मन बना रहे हैं.