बाबा, बवाल और जरूरी सवाल

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अविमुक्तेश्वरानंद वहां पहुंचे तो पुलिस से बात बढ़ी. लाठीचार्ज शुरू हुआ और बवाल मच गया. अविमुक्तेश्वरानंद समेत कई लोग घायल हुए. प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र होने पर भी मोदी ने पुलिसिया लाठीचार्ज पर कुछ नहीं बोला. इससे भाजपा कार्यकर्ता नाराज हुए. भाजपा के करीब 300 कार्यकर्ताओं ने इस्तीफा दे दिया. यह एक आश्चर्यजनक बात थी क्योंकि बनारस में यह सब जानते हैं कि भाजपा और अविमुक्तेश्वरानंद में छत्तीस का आंकड़ा रहा है. उन्हीं अविमुक्तेश्वरानंद के लिए भाजपाइयों के दिल में प्यार उपजा, जो इस घटना के कुछ दिनों पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के न आने के बाद बीएचयू के नवनिर्मित ट्रॉमा सेंटर का उद्घाटन नारियल फोड़ खुद कर आए थे. यह कहते हुए कि पीएम नहीं आ रहे हैं तो क्या गरीबों के लिए बने इस अस्पताल का उद्घाटन रुका रहेगा!

Akhilesh Yadav web

अविमुक्तेश्वरानंद घायल हुए तो उन्होंने ऐलान किया कि नासिक कुंभ के बाद पांच अक्टूबर को बनारस में संतों का जमावड़ा होगा और अन्याय प्रतिकार यात्रा निकलेगी. प्रशासन सचेत हो गया. लाठीचार्ज के बाद पुलिस को भी लग गया कि गलत जगह पर उसने हाथ डाल दिया है और अब बवाल मचेगा. प्रशासन ने दूसरा रास्ता अपनाया. बनारस में संतों में फूट डाली, जिसकी स्वाभाविक संभावना हमेशा बनी रहती है. अविमुक्तेश्वरानंद के दो घोर विरोधी संतों को अपने पाले में किया गया. उन दोनों का संघ से गहरा जुड़ाव माना जाता है. गंगा महासभा से जुड़े स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती और विहिप के सौजन्य से शंकराचार्य बने स्वामी नरेंद्रानंद ने प्रशासन के लाठीचार्ज कार्रवाई को गैरवाजिब नहीं बताया. हालांकि दोनों की बात का कोई खास असर नहीं हुआ. इसी बीच बनारस में राज्य के डीजीपी जगमोहन यादव का आना हुआ. उनसे पूछा गया कि लाठीचार्ज की जो घटना हुई और जिसकी वजह से शहर अंदर ही अंदर जल रहा है, उस पर आप क्या कर रहे हैं. डीजीपी ने जवाब दिया, ‘जिसने लाठीचार्ज किया है, उनसे पूछिए, मैं कुछ नहीं जानता.’ डीजीपी के बयान से बात और बिगड़ गई. मामला संभालने के लिए राज्य के पर्यटन मंत्री ओमप्रकाश सिंह भी सरकार का दूत बनकर अविमुक्तेश्वरानंद से मिलने पहुंच गए. फिर शिवपाल यादव ने भी बात की लेकिन बात बनी नहीं. तब तक अन्याय प्रतिकार यात्रा निकालने का समय आ गया और देखते ही देखते नजारा बदल गया. विहिप और दूसरे हिंदूवादी संगठन जो अविमुक्तेश्वरानंद का कांग्रेसी एजेंट कहकर विरोध करते थे, वे भी यात्रा में शामिल हुए. साध्वी प्राची जैसी फायर ब्रांड नेता भी पहुंच गई. प्रदर्शन शुरू हुआ. भीड़ में संतों और समर्थकों की संख्या बढ़ी तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अविमुक्तेश्वरानंद से बात करने की कोशिश की तब स्वामीजी ने मना कर दिया और उसके बाद जो हुआ वो सबके सामने है. बात यह हो रही है कि बनारस में डेढ़ दशक बाद कर्फ्यू लगा. घटना का दूसरा पक्ष यह है कि ढाई दशक बाद कांग्रेस और भाजपा के खेमे में बंटे रहने वाले संत एक हुए. ये नरेंद्र मोदी के लिए कम और अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव के लिए ज्यादा खतरे की घंटी है. ऊपरी तौर पर यह बताया जा रहा है कि नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस में यह सब मोदी के सांसद बनने के बाद हो रहा है लेकिन बनारसवाले जानते हैं कि यह अखिलेश सरकार के लिए नया जख्म बनने जा रहा है. अविमुक्तेश्वरानंद कहते हैं, ‘लॉ एंड ऑर्डर केंद्र का नहीं, राज्य का मसला है. हमारा विरोध राज्य सरकार से है. इस बहाने बनारस में इतिहास बना, आपसी विरोध के सारे बंधन टूट गए, सनातन समाज के नाम पर सबमें एका हो गया है, इसका असर देखने को मिलेगा.

अब आगे कौन, कैसा आंदोलन करेगा, ये तो संत ही जानें लेकिन इसके संकेत मिल गए हैं. साथ ही कुछ हलको में यह संदेश चला भी गया है कि विहिप और संघ परिवार ने इस घटना के जरिये अविमुक्तेश्वरानंद का समर्थन कर एक बड़ी चाल चली है. देश में स्वामी स्वरूपानंद ही भाजपा विरोधी मुखर संत माने जाते हैं, जो इतने बड़े ओहदे यानी दो पीठों के शंकराचार्य हैं. स्वामी स्वरूपानंद का उत्तराधिकारी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ही माना जाता है. अगर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को संघ या विहिप या फिर भाजपा ने साध लिया तो फिर देश में संतों के जरिये राजनीति करने में उनके लिए राह आसान होगी. आज नहीं लेकिन एक समय के बाद भाजपा के लिए संभावनाओं के नए द्वार खुलेंगे.

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