शत्रु संपत्ति : मुल्क अपना, जमीन पराई!

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जब इस विधेयक के पास होने की कम संभावनाएं हैं, इसके बावजूद सरकार इससे संबंधित अध्यादेश क्यों लाई थी? इस पर लोकेंद्र सिंह कहते हैं, ‘अध्यादेश का मकसद कई बार सांकेतिक भी होता है. सरकार संकेत देना चाहती है कि वह क्या करने की इच्छा रखती है. भले ही यह कानून न बने पर सरकार यह संदेश देने में तो सफल हो ही जाएगी कि वह पाकिस्तान गए लोगों की संपत्ति को अपने अधीन रखना चाहती है. चुनावों में इसका फायदा हो सकता है.’ पर मो. अदीब मानते हैं कि सरकार का इसके पीछे छिपा मंसूबा है.

वे बताते हैं, ‘सरकार को पता था कि राज्यसभा में अड़चनें आएंगी. इसलिए इन्होंने सीईपी को हिदायत दे दी थी कि अध्यादेश पारित होने के साथ ही जितनी भी शत्रु संपत्ति है उसे संरक्षण में ले लो. इसके परिणामस्वरूप कस्टोडियन ने तब से ही ऐसी संपत्ति को देश भर में चिहि्नत करना और कब्जे में लेना शुरू कर दिया है. अगर विधेयक कानून नहीं बनता तो भी सारी संपत्ति सीईपी के पास आ जाएगी और अध्यादेश के प्रभावी रहने तक उसे कौड़ियों के भाव नीलाम कर दिया जाएगा. जिस वक्त पहला अध्यादेश आया था, तब भी यही किया गया था. जामा मस्जिद के मेरे पास नौ मामले आए थे. अध्यादेश के आने के तुरंत बाद ही सीईपी के लोग पहुंचे और संपत्ति की मार्किंग शुरू कर दी थी. एक-एक घर की तलाशी ली गई. जांच की गई कि कहीं कोई पाकिस्तान तो नहीं गया था. मैंने उन सबको सोनिया गांधी से मिलवाया था.’ वे आगे बताते हैं, ‘दोनों ही दलों के कुछ नेताओं के इसमें निजी हित तो रहे ही हैं. साथ ही मुस्लिम समुदाय को दलितों से भी नीचे ले जाकर पटकने की साजिश है. आरक्षण की बदौलत आज दलित जागरूक हो गया. वह अब इनकी गुलामी नहीं सहता. अब उसकी जगह इनको कोई तो चाहिए. इसलिए मुस्लिमों को दूसरा दलित बनाना चाहते हैं. क्योंकि अब यही एक दबा-कुचला समुदाय देश में बचा है. इसलिए जो भी मुस्लिमों के अतीत के गौरव रहे हैं, उन्हें खत्म कर दो. दौलत और संपत्ति छीनकर अस्तित्वहीन बना दो. वर्तमान सरकार इससे भी आगे निकल गई है. उसकी नजर मुस्लिमों की संपत्ति पर तो है ही, साथ में उनके शिक्षण संस्थानों पर प्रहार कर उन्हें शिक्षित होने से भी रोकना चाहती है. कानून की आड़ में वह आरएसएस का एजेंडा भी साध रही है. आरएसएस तो मानती ही नहीं है कि एक इंच जमीन भी देश में हमारी है. उसका मानना है कि जो जमीन है वो सब हिंदुओं की है. मुसलमानों ने इस पर कब्जा कर लिया था. हम 1200 साल के बाद भी अपने ही मुल्क में पराये हैं. विभाजन के समय हमने धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में भारत का चुनाव किया. अब अगर इनका एजेंडा हिंदू राष्ट्र बनाने का है तो हम तो ठगे गए हैं.’

‘वे मुस्लिमों को दूसरा दलित बनाना चाहते हैं. इसलिए जो भी मुस्लिमों के अतीत के गौरव रहे हैं, उन्हें खत्म कर दो. दौलत और संपत्ति छीन अस्तित्वहीन बना दो’

वैसे इस कानून में शामिल ‘शत्रु’ की परिभाषा पर भी विवाद है. पूर्व राज्यसभा सांसद अजीज पाशा कहते हैं, ‘जो संपत्ति का वारिस है, वो कानूनन है. वो देश का नागरिक है. जब वो भारत का नागरिक है तो उसे इस आधार पर शत्रु कहना कि उसके बाप-दादा पाकिस्तान चले गए थे, अन्याय है. अगर पूरा खानदान ही पाकिस्तान चला गया होता और फिर वापस आकर संपत्ति पर दावा करता तो उसे शत्रु कह सकते थे, लेकिन जो भारत का नागरिक है, यहीं रह रहा है. उसे शत्रु की संज्ञा देकर उसकी संपत्ति पर नजर गड़ाना तो गलत है.’ मो. अदीब कहते हैं, ‘सीतापुर के डॉ. ताज फारूकी उन स्वर्गीय एमएम किदवई साहब के दामाद हैं, जो कांग्रेस के एक बहुत बड़े नेता थे. डॉक्टर साहब के चाचा पाकिस्तान चले गए थे पर उनके बाप नहीं गए थे और वो भी नहीं गए थे. उनकी संपत्ति सरकार ने जब्त कर ली. संपत्ति कस्टोडियन के पास है पर लगान वही जमा करते हैं. लगान की जो रसीद मिलती है उस पर इनके नाम के आगे शत्रु लिखा होता है. हम शत्रु हैं. अपने देश का दामन थामना शत्रुता की श्रेणी में आता है. अपने ही घर में परायों जैसा सलूक क्यों? दिल दुखता है. लेकिन कर भी क्या सकते हैं. जहां गांधी के हत्यारे का मंदिर बनाकर उसे पूजने की बात हो, वहां हमारी कौन सुनेगा.’ पूर्व केंद्रीय मंत्री और लोकसभा सांसद शशि थरूर को भी ‘शत्रु नागरिक’ की परिभाषा से आपत्ति है. वे कहते हैं, ‘हम एक ऐसे विधेयक को पास करने पर विचार कर रहे हैं जो अपने ही देश के कुछ लोगों को शत्रु बताता है. इससे लाखों लोगों के हित प्रभावित होंगे. यह भारतीय नागरिकता को दो भागों में विभाजित करता है, हम भारतीय नागरिकता के विचार को ही विभाजित कर रहे हैं.’

जगदीश छवानी एक अहम सवाल उठाते हुए कहते हैं, ‘एक ओर हम पाकिस्तान से मित्रता बढ़ाने की बात करते हैं, अखंड भारत की स्मृतियां संजोते हैं तो दूसरी ओर पाकिस्तान बस गए लोगों को शत्रु की श्रेणी में रखते हैं. यह कैसी नीतिगत असमानता है? अपने ही देश के उन मुसलमानों को जिनके रिश्तेदार पाकिस्तान चले गए, शत्रु कहा जाता है. जबकि वो भारत के नागरिक हैं.’ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सचिव शमीम फैजी मानते हैं, ‘जो भी भारत में है और उसका नागरिक है, उसे शत्रु नहीं कहा जा सकता.’

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‘सुप्रीम कोर्ट अध्यादेश के खिलाफ फैसला सुनाता है तो सरकार द्वारा लाया गया विधेयक वहीं खत्म हो जाएगा’

‘घर बचाओ संघर्ष समिति’  के बैनर तले भोपाल में शत्रु संपत्ति के कई मामले देख रहे जबलपुर हाई कोर्ट के वकील जगदीश छवानी से बातचीत

विधेयक के कानून बनने के बाद क्या भोपाल के नवाब सहित दूसरे लोगों की संपत्तियां जिनसे संबंधित मामले अदालत में चल रहे हैं, वे अपने आप कस्टोडियन की हो जाएंगी और मुकदमे बंद हो जाएंगे?

हां, ऐसा प्रावधान संशोधित विधेयक में है. अभी यह विधेयक लोकसभा से पास हो चुका है. अब राज्यसभा से पास होगा फिर राष्ट्रपति से अनुमोदन होगा. उसके बाद कस्टोडियन उन अदालतों में याचिका लगाकर, जिनमें शत्रु संपत्ति से संबंधित मामले चल रहे हैं, मांग करेगा कि नया कानून बन चुका है, लिहाजा अब ये मामले बंद किए जाएं. केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह का भी साफ कहना है कि जो भी मुकदमे अदालत में हैं, उन्हें ही खत्म करने के लिए इसे लाया जा रहा है.

क्या नए कानून के बाद पीड़ितों के लिए अदालत जाने के दरवाजे बंद हो जाते हैं?

सिविल कोर्ट न जाने का प्रावधान विधेयक में रखा गया है पर अपने संविधान प्रदत्त अधिकार अनुच्छेद 19 और 21 के तहत हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं. वैसे भी सिविल कोर्ट को यह निश्चित करने का अधिकार है िक कोई संपत्ति िकसी व्यक्ति की है या नहीं! पर यह निश्चित करने का अधिकार नहीं है कि कौन-सी संपत्ति शत्रु संपत्ति है, क्योंकि यह मुद्दा केंद्र सरकार से संबंधित है. सिविल कोर्ट घरेलू मुद्दों पर फैसला कर सकता है पर यह दो मुल्कों का मसला है.

क्या विधेयक को अदालत में चुनौती दी जा सकती है?

हां, अध्यादेश जो आया था उसे राजा महमूदाबाद ने पहले से ही चुनौती दे रखी है. वही अध्यादेश तो विधेयक में बदला है, तो चुनौती तो पहले से ही दी जा चुकी है.

अगर यह विधेयक संसदीय प्रक्रिया से गुजरकर कानून बन जाता है तो भी क्या उसे अदालत में चुनौती दे सकते हैं?

हां, अगर कोई कानून तर्कसंगत नहीं है तो उसकी समीक्षा के लिए अदालत से गुहार लगाई जा सकती है. ऐसे बहुत उदाहरण हैं. हालिया उदाहरण राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का है, जहां सरकार के मंसूबों पर सुप्रीम कोर्ट ने पानी फेर दिया.

राजा महमूदाबाद ने इस विधेयक से संबंधित अध्यादेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रखी है. वह मामला विचाराधीन है. उस पर फैसला नहीं आया है, तब तक यह विधेयक पास हो गया. क्या विधेयक पर इसका कोई असर पड़ेगा? नए हालात में उस मामले का क्या होगा?

यह एक ऐसी स्थिति है कि एक तरफ सरकार अपने अधिकारों का प्रयोग कर कानून ला रही है तो दूसरी तरफ न्यायालय भी उस कानून पर विचार कर रहा है. टकराव वाली स्थिति है. मान लीजिए कि अगर सरकार यह कानून संसद से बनवाने में सफल हो जाती है और दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट अध्यादेश के खिलाफ फैसला सुनाता है तो सरकार द्वारा लाया कानून वहीं खत्म हो जाएगा. संविधान में तीन स्तंभ हैं; विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका. एक कानून बनाता है, एक की जिम्मेदारी उसे लागू करने की है और एक उसकी समीक्षा करता है. वो न्यायपालिका देखेगी कि इस कानून का क्या भविष्य होगा.

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नए संशोधनों के समर्थन में यह तर्क दिया जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट का राजा महमूदाबाद के पक्ष में फैसला आने के बाद से शत्रु संपत्तियों को पाने के कई फर्जी दावे सामने आए, जो आज भी अदालतों में लंबित हैं. अब इस कानून के बाद शत्रु संपत्ति पर नजर गड़ाए बैठे कई फर्जी लोगों के मंसूबों पर पानी फिर जाएगा.

इस पर नावेद हमीद कहते हैं, ‘क्या सरकार फर्जी दस्तावेज पहचानने में अक्षम है? सरकार के पास सारे दस्तावेज मौजूद हैं. अगर एक-दो प्रतिशत ऐसे फर्जी दावे भी हैं तो सरकार उनकी सत्यता की पुष्टि करे. इन फर्जी मामलों के कारण दूसरों को उनके हक से वंचित करना कहां तक जायज है?’ शमीम फैजी कहते हैं, ‘हमारा मानना है कि जो कानूनन वारिस हैं उनका संपत्ति पर हक है. अगर आप फर्जी दस्तावेज वालों का पता नहीं लगा सकते तो आपकी सरकार किस बात की? इनके निहित स्वार्थ हैं. वे विभाजन के बाद बहुत संपत्ति जब्त कर चुके हैं. ये लोग बड़ी संख्या में लोगों की संपत्तियां शत्रु संपत्ति के नाम पर जब्त कर चुके हैं, जो उनके वारिसों को मिलनी चाहिए. वह ये नहीं लौटाना चाहते.’

जुमलाना के अनुसार, इस कानून की मूल भावना थी पाकिस्तान जा बसे लोगों की संपत्तियों का अस्थायी संरक्षण, प्रबंधन और नियंत्रण. वे कहते हैं, ‘मान लीजिए एक व्यक्ति उस देश जा बसा जिससे हमारा युद्ध चल रहा हो. वह यहां अपनी जायदाद छोड़ गया. उस जायदाद से उसे आय हो रही है और वह आय शत्रु देश पहुंच रही है और उसका प्रयोग हमारे ही खिलाफ युद्ध में हो रहा है. इसलिए ऐसे लोगों की संपत्तियों को अस्थायी रूप से संरक्षण में रखने के लिए यह कानून लाया गया था. युद्ध के समय इस प्रकार का कानून हर देश लेकर आया है और यह सही भी है. युद्ध खत्म, कानून खत्म. पर हमारे यहां उल्टा हो रहा है, इसे स्थायी रूप दिया जा रहा है.’ मो. अदीब कहते हैं, ‘शाहबानो केस में जब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को संसद में कानून बनाकर निष्प्रभावी कर दिया गया तो मुसलमानों को कहा गया कि आप देश का कानून नहीं मानते, चारों ओर बदनाम किया गया. और अब आप भी तो वही कर रहे हैं. संसद से कानून बनाकर हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना कर रहे हैं. जबकि सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि जो भारतीय नागरिक है उसे उसकी विरासत से दूर नहीं किया जा सकता.’

नावेद हमीद कुछ सवाल उठाते हैं, ‘जिन्होंने पाकिस्तान को नहीं, भारत को अपना मुल्क माना, भारत में रुके, मातृभूमि को नहीं छोड़ा. जबकि उनके ऊपर दबाव था. उन लोगों का क्या कुसूर है? नौ में से अगर एक चला गया है और आठ रह गए हैं तो आप कहोगे कि आप क्यों रह गए? अगर खानदान का एक व्यक्ति कहीं चला गया है, जाने को तो बहुत लोग अलग-अलग देशों में चले गए हैं. लेकिन अगर पाकिस्तान चला गया है तो वह शत्रु है और जिन्होंने भारत में रहने का विकल्प चुना, उन्हें देशभक्त क्यों नहीं कहा जाता?’

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