आग का ‘झरिया’

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पुनर्वास के बाद का दूसरा सवाल ये उठता है कि क्या आग से शहर को बचा लेना एकदम असंभव-सा था. यह सवाल इसलिए भी था कि अधिकांश लोग ऐसा मानते हैं कि इस आग का फैलाव रोकना संभव था, अगर इच्छाशक्ति होती. भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने 2002 में झरिया आकर कहा था कि अभी बात बन सकती है, बस कोशिशें तेज हों और सही दिशा में प्रयास हो. लेकिन कलाम की बात भी और पुरानी तमाम बातों की तरह बात बनकर ही रह गई.

‘यह जो उजड़ता हुआ शहर देख रहे हैं, जिसे झरिया कहते हैं, इसी के कारण धनबाद जैसा शहर बस सका. इस शहर ने देश भर के लोगों को रोजगार दिया’

झरिया लौटने पर रहनिहार नवल ओझा से मुलाकात होती है. वे बताते हैं, ‘हम और हमारे लोग पिछले 100 साल से ये आग और लोगों को अपनी जमीन से उखड़कर भटकते हुए देख रहे हैं. यह जो उजड़ता हुआ शहर देख रहे हैं, जिसे झरिया कहते हैं, इसी के कारण धनबाद जैसा शहर बस सका जिसे लघु भारत भी कहते हैं. इस शहर ने देश भर के लोगों को रोजगार दिया. यह कभी रंगीन शहर था. बिहार का पहला सिनेमा हाॅल यहां खुला. इस शहर पर कई लोकगीत रचे गए.’ नवल आगे बताते हैं, ‘1916 में पहली बार भौरा की एक कोयला खदान में आग लगी थी. इसके बाद एक-एक कर नए इलाकों में आग फैलती चली गई. अब 70 जगहों पर आग ही आग नजर आती है. भौरा के बाद 1941 में जोगता में, 1951 में ईस्ट कतरास में, 1952 में नदखुरकी मंें, 1956 में राजापुर में, 1957 में वेस्ट मोदीडीह में, 1965 में जोगीडीह एवं कोयरीडीह में आग लगी.’ वे आगे कहते हैं, ‘जिस वक्त पहली बार आग का पता चला, उस समय तक निजी कंपनियों द्वारा कोयला खनन का चलन था. निजी कंपनियां किसी तरह कोयला चाहती थीं, उन्हें इससे मतलब नहीं था कि कोयला निकाल लेने के बाद इलाका भी बचे तो उसके लिए क्या हो. 1971 में तब आस जगी जब कोयला उद्योग का राष्ट्रीयकरण हुआ. तब लगा कि अब शायद सरकारी तंत्र इस पर ध्यान देगा, गंभीरता से लेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. या यूं कहिए कि उसके बाद से समस्या और बढ़ती ही चली गई.’

आग को फैलने से रोकने के लिए सबसे पहले 1954 में मेहता कमेटी बनी. उसकी बातों को दफन कर दिया गया. फिर और बातें होती रहीं लेकिन पहली बार उम्मीद तब जगी जब 1978 में झरिया के पुनरुत्थान की एक बड़ी योजना बनी. इस योजना को मूर्त रूप देने के लिए पोलैंड से विशेषज्ञों की टीम आई थी. पुनर्वास के लिए बनी टीम में बीसीसीएल के भी 40 अधिकारी शामिल थे. कोयले के उत्पादन और नए शहर के निर्माण के लिए 20 अरब 85 करोड़ रुपये की लागत वाली इस योजना में सात अरब रुपये सिर्फ सात छोटे शहरों के निर्माण पर खर्च होने वाले थे. योजना के अनुसार उजड़ने वाले लोगों को न्यू झरिया सिटी के तहत झरिया के उत्तरी किनारे, धनबाद के कोयला नगर, भूली नगर, मुनीडीह, बस्ताकोला, राजगंज तथा कुमार मंगलम सिटी के तहत दामोदर नदी के दक्षिण किनारे पर बसाया जाना था. जाहिर-सी बात है कि इस योजना की बातें जब सार्वजनिक तौर पर प्रचारित होनी शुरू हुई थीं तो यह माहौल बना था कि अब सब कुछ ठीक हो जाएगा. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो सका. पोलैंड से आया विशेषज्ञों का दल उसी वर्ष लौट गया. सब ठंडे बस्ते में चला गया. 1983 में इस योजना की लागत बढ़कर 50 अरब 80 करोड़ रुपये हो गई. केंद्र सरकार, राज्य सरकार और बीसीसीएल के बीच इस योजना के कार्यान्वयन को लेकर फिर बातचीत हुई. उस दौरान राज्य सरकार से 25 प्रतिशत और केंद्र सरकार से 50 प्रतिशत धनराशि देने को कहा गया लेकिन दोनों सरकारों ने वित्तीय संकट का सवाल उठा दिया. इसी ऊहापोह में 1985 में योजना की लागत बढ़कर 90 अरब 73 करोड़ रुपये हो गई, जिसमें से सिर्फ पुनर्वास पर 30 अरब रुपये खर्च होते. हालांकि पुनरुत्थान का यह मामला उलझता गया और एक जीवंत शहर किस्तों में मरता रहा.

सच यही है कि इस इलाके में आग फैली थी, अपने स्वाभाविक गुण के कारण. हवा के संपर्क में आने के बाद कोयले का जल उठना स्वाभाविक गुण है लेकिन जमीन के अंदर उसे हवा मिले, वह और जले और फैले, यह सब खुद-ब-खुद नहीं हुआ, ऐसा किया गया. ओझा सवाल उठाते हैं, ‘जाकर पूछिए बीसीसीएल प्रबंधन से कि क्या सच में आग से शहर को नहीं बचाया सकता था. जाकर पूछिए झरिया के नाम पर राजनीति करने वालों से कि क्या सच में वे झरिया को बचाने और लोगों को सही जगह पर बसाने की राजनीति कर रहे हैं.’

ओझा जिन सवालों को छोड़ते हैं, उन्हीं सवालों को लेकर हम धनबाद आते हैं. ऐसा कहा जाता है कि ‘झरिया बचाओ’ की राजनीति करने वाले बड़ी हस्ती बन गए हैं. उनकी राजनीति क्या होती है? जवाब सबके मिलते हैं. कुछ बताते हैं कि सबसे दिलचस्प यह है कि जो झरिया बचाने की राजनीति करते हैं, उनमें से अधिकांश झरिया जाते भी नहीं. रहते भी नहीं. धनबाद रहते हैं. और उसमें भी अधिकांश वैसे हैं, जो जल्दी से जल्दी झरिया को वीरान होते देखना चाहते हैं ताकि कोयला अधिक से अधिक निकल सके. झरिया को उजाड़ने से और आग को फैलाने से ही अरबों का कारोबार होगा, सारा खेला बस यही है.

झरिया वाले जान चुके हैं कि उन्हें अपनी जमीन से उखड़ना होगा. शहर में रहते धुएं और धूल से तमाम किस्म की बीमारियों से गुजरकर मरना होगा

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बीसीसीएल खनन का अधिकांश काम अब आउटसोर्सिंग के जरिए कर रही है. आउटसोर्सिंग कंपनियों का अपना गणित है. उन्हें किसी भी कीमत पर कोयला चाहिए, वे सुलगती खदानों से भी कोयला निकाल लेते हैं

तस्दीक करने पर मालूम होता है कि झरिया के नाम पर ऐसे कई लोग हैं, जो दिन में तो नारे लगाते हैं कि झरिया को बचाना है, दिखावे के लिए यह भी बोलते हैं कि झरिया के लोगों को जहां-तहां नहीं बसाने देंगे लेकिन शाम ढलते ही वे झरिया के वीरानगी में डूबते जाने का जश्न भी मनाते हैं. लोग बताते हैं कि यहां राजनीति के अपने मकसद हैं. कोल माफिया इसलिए पुनर्वास का विरोध कर रहा है कि जब खदानों में बेगारी करने वाले लोगों का पुनर्वास यहां से कहीं और हो जाएगा तो फिर उनके लिए दिन-रात एक कर कोयले की चोरी कौन करेगा. कौन मजदूरी करेगा? जो चुनावी राजनीति में हैं, उनकी चिंता यह है कि झरिया से पूरी आबादी ही चली जाएगी तो फिर वे चुनाव में कैसे जीतेंगे, क्योंकि ये वही मजदूर हैं जो वर्षों पहले बिहार-पूर्वी उत्तर प्रदेश आदि जगहों से लाकर यहां बसाए गए थे ताकि कोयले से कमाई के साथ अपनी राजनीतिक जमीन भी तैयार की जा सके.

अमेरिका की पिट्सबर्ग कंपनी की एक रिपोर्ट के अनुसार, झरिया का इलाका इस कदर खतरनाक मुहाने पर पहुंच चुका है कि अगर दस वर्षों के अंदर इसे खाली नहीं कराया गया तो कभी भी दुनिया की सबसे बड़ी भू-धंसान की घटना घट सकती है. झरिया में रह रहे तमाम लोग इस बात को जानते हैं. उनके अनुसार, यहां धरती का सबसे बेहतर कोयला है और उस कोयले को निकालने के लिए लोगों को यहां से हटाना जरूरी है. लोग सीधे हटेंगे नहीं, इसलिए आग का फैलना जरूरी है. आंकड़े भी बताते हैं कि झरिया की जमीन में दुनिया का बेहतरीन कोयला दबा हुआ है. पिछले सौ सालों में तीन करोड़ 17 लाख टन जलकर राख हो जाने के बावजूद एक अरब 86 करोड़ टन बचा हुआ है.

सवाल अपनी जगह बना रहता है कि क्या वाकई यह आग बुझाई नहीं जा सकती थी या कोई रास्ता नहीं निकल सकता था. इसे विषय पर साउथ ईस्टर्न कोल लिमिटेड के पूर्व कार्यकारी निदेशक एनके सिंह से वर्षों पहले बात हुई थी. इसे लेकर उनका गहरा अध्ययन रहा है. उन्होंने कहा था कि ट्रेंच कटिंग कर आग से निपटने का रास्ता निकाला जाता रहा है. हालांकि यह कोई रास्ता नहीं है, क्योंकि एक ओर ट्रेंच कटिंग होगी तो दूसरी ओर आग बढ़ेगी. यह सही भी है. ट्रेंच कटिंग के अलावा नाइट्रोजन छिड़काव से लेकर दूसरे और कई किस्म के प्रयोग किए जाते रहे हैं. कोई उपाय कारगर नहीं हो सका है. और सवाल यह है कि अब यह आग बुझा पाना क्या संभव या इतना आसान रह गया है. जवाब है नहीं, क्योंकि अब मामला एक जगह आगलगी का नहीं है. देश भर की नौ कोयला कंपनियों के भूमिगत आग वाले 158 क्षेत्रों में से 70 सिर्फ बीसीसीएल के झरिया कोयला क्षेत्र में हैं.

आग के खेल को समझने के लिए जितने लोगों से बात होती है, सब अलग तरीके की बात करते हैं. बीसीसीएल के लोग कहते हैं कि कोयला निकाल लेने से सारा झंझट ही खत्म हो जाएगा लेकिन असल खेल कोयला निकालने का ही है और झरिया के पास जो कोयला है, उस पर बड़ी निगाहें टिकी हुई हैं. जानकार बताते हैं कि देश में घरेलू कोयले का भंडार 93 बिलियन टन है जिसका 13 फीसदी भाग ही कोकिंग कोल है बाकि थर्मल कोल है. इसमें से 28 फीसदी प्राइम कोकिंग कोल और शेष मीडियम कोकिंग कोल है. भारतीय इस्पात उद्योग के विकास में सबसे बड़ी बाधा प्राइम कोकिंग कोल की अनुपलब्धता है. फिलहाल इसका उत्पादन आठ मिलियन टन है जिसे 2024-25 तक 18 मिलियन टन करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है जबकि इस्पात उद्योग की मांग 97 मिलियन टन हो जाएगी.

खुद बीसीसीएल के ही एक अधिकारी बताते हैं कि बीसीसीएल की यह योजना आगे को देखकर ही है. अगर इतने कोयले की मांग पूरी करनी है तो झरिया वालों को अपनी जमीन से उजड़ना ही होगा. लोग हटेंगे तभी खनन होगा. लोग सीधे निकलेंगे नहीं इसलिए आग का फैलता रहना जरूरी है. झरिया के लोग बताते हैं, ‘देखते रहिए कि कैसे लोगों को झरिया छोड़ने पर मजबूर किया जाता है. एक-एक कर सारी सुविधाएं शहर से छीन ली जाएंगी तो तब आज जिद पर अड़े झरिया वाले मजबूरी में यहां से विदा हो जाएंगे.’

झरिया में आग नाम की किताब लिख चुके अमित राजा कहते हैं, ‘पहले रेल को खतरे में बताकर झरिया में रेल परिचालन बंद किया गया लेकिन जैसे ही रेल बंद हुआ दनादन उससे कोयला निकाल लिया गया. बीच-बीच में राष्ट्रीय राजमार्ग पर खतरे की बात कही जा रही है. वहां भी ऐसे ही होगा. सारा खेल कोयले के लिए है. पुनर्वासित करना प्राथमिकता में नहीं, कोयला निकले, बस यही प्राथमिकता है. ये बातें सच लगती हैं. झरिया में घूमते हुए और वहां से बेलगढ़िया में बसा दिए गए लोगों से बात करते हुए साफ होता है कि पुनर्वास करना बीसीसीएल की प्राथमिकता नहीं बल्कि कोयला प्राथमिकता में है.’

बीसीसीएल खनन का अधिकांश काम अब आउटसोर्सिंग के जरिए कर रही है. आउटसोर्सिंग कंपनियों का अपना गणित है. उन्हें किसी भी कीमत पर कोयला चाहिए, अधिक से अधिक कोयला. वे सुलगते कोयले को भी खदान से निकाल लेते हैं. उन्हें कोयले खनन में कोई बाधा नहीं चाहिए इसलिए वे आग के बढ़ते रहने की भी कामना करते हैं ताकि आग का भय हो तो लोग जल्दी भागें अौर अधिक से अधिक खनन हो. झरिया के लोग बताते हैं कि आउटसोर्सिंग कंपनियों में कई कंपनियां ऐसी रही हैं जिसमें प्रमुख के तौर पर बीसीसीएल के वरिष्ठ अधिकारी ही रहे हैं. वे बीसीसीएल से रिटायर होते ही आउटसोर्सिंग कंपनियों के प्रमुख बन जाते रहे हैं. यानी साफ है कि वे अपने पद पर रहते हुए आउटसोर्सिंग कंपनियों को ठेका दिलवाने या दोहन करने की छूट देने में मदद करते रहे हैं या कि खुद ही आउटसोर्सिंग कंपनी में साझेदार बनते रहे हैं, इसलिए रिटायरमेंट के बाद कई अधिकारी कंपनियों में प्रमुख पद पाते रहे हैं. खेल इतना ही नहीं है, आउटसोर्सिंग कंपनियों का चेन फिक्स होता है. बीसीसीएल से लेकर पुलिस और अपराधियों तक से. कोयले में अपराध की मिलावट के बिना काम नहीं होता. और चूंकि पूरा चेन बना होता है इसलिए आउटसोर्सिंग कंपनियां वैज्ञानिक तरीके से खनन नहीं करतीं. वे अपने हिसाब से खदानों में विस्फोट करती हैं और कोयला निकालती हैं. आग न फैले, यह उनके एजेंडे में नहीं होता. हां, यह जरूर एजेंडे में होता है कि आग की वजह से जल्दी से जल्दी ज्यादातर इलाके खाली हों ताकि आगे खाली इलाके में खनन का अधिक से अधिक खेल हो सके.

कोयला खनन और लोगों के पुनर्वास की स्थितियों के संबंध में बात करने पर बीसीसीएल के सीएमडी कार्यालय से संपर्क करने पर जरेडा में बात करने को कहा जाता है. कुल मिलाकर अलग-अलग महकमों पर जिम्मेदारी टाली जाती है. इतनी बड़ी पुनर्वास योजना के लिए पैसे कहां से आएंगे, इसके जवाब में बीसीसीएल का एक पुराना डाटा पकड़ा दिया जाता है, जिसका सार कुछ इस तरह  है- बीसीसीएल की होल्डिंग कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड गत तीन वर्षों से अपनी लाभजनक इकाइयों से प्रति टन छह रुपये वसूलती है, जिस मद से कार्य को पूरा किया जाएगा. इससे हर साल बीसीसीएल को 400 करोड़ रुपये का कलेक्शन होता है. हर तरह के कोयले (कोकिंग और नाॅन-कोकिंग कोल) पर उत्पाद शुल्क 10  रुपये किया गया है, जो पहले 3.5 रुपये प्रति टन नॉन-कोकिंग और 4.25 रुपये कोकिंग कोल पर था. इससे प्रति वर्ष और 240 करोड़ रुपये जमा होने का अनुमान है. इसी तरह पैसा जमा करके नया झरिया बसा दिया जाएगा.

यह सारा खेल झरिया वाले और बेलगढ़िया वाले जानते हैं. पुनर्वास क्यों और किसलिए यह भी. वे जान चुके हैं कि उन्हें अपनी जमीन से उखड़ना होगा. शहर में रहते धुएं, धूल और गैस की वजह से तमाम किस्म की बीमारियों से गुजरकर मरना होगा या फिर शहर छोड़ देने पर बेलगढ़िया जैसे इलाके में बसकर अवसाद से.