क्या वजह है कि देश में मकान मालिक और किराएदार का संबंध सनातन बैरी जैसा हो गया है?

साल 2005 में भारत सरकार ने शहरी क्षेत्रों के विकास के लिए ‘जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन’ (जेएनएनयूआरएम) शुरू किया था. शहरी क्षेत्रों के विकास के लिए इतना बड़ा अभियान इससे पहले पूरे विश्व में कहीं नहीं चलाया गया था. इस मिशन के तहत शहरी क्षेत्रों में सात आवश्यक सुधार तय किए गए थे. इनमें से एक किराया नियंत्रण कानूनों में सुधार करना भी था. जेएनएनयूआरएम के अंतर्गत प्रत्येक राज्य का केंद्र सरकार के साथ एक अनुबंध हुआ था. इस अनुबंध में वह समय सीमा भी तय की गई थी जिसके अंदर राज्यों को अपने किराया कानूनों को सुधारना था. इस अनुबंध के कुछ समय बाद सरकार ने कहा कि देश के 12 राज्यों ने किराया कानूनों में जरूरी बदलाव कर लिए हैं. दिल्ली की एक स्वयं सेवी संस्था ‘पीआईएल वाच ग्रुप’ ने इस मिशन और इसके तहत हुए किराया कानूनों की अलग से पड़ताल करके एक रिपोर्ट प्रकाशित की है. इस रिपोर्ट में बताया गया कि जेएनएनयूआरएम के शुरू होने के बाद से किसी एक भी राज्य में किराया कानूनों में सुधार नहीं हुआ है. इस रिर्पोर्ट के अनुसार ‘पांच राज्यों में कभी किराया नियंत्रण कानून थे ही नहीं. पश्चिम बंगाल, राजस्थान और कर्नाटक में जेएनएनयूआरएम के अस्तित्व में आने से पहले ही किराया नियंत्रण कानूनों में सुधार हो चुका था. 20 राज्यों ने इन कानूनों में सुधार का वादा किया गया था लेकिन वे सभी इसमें विफल रहे. अन्य तीन राज्यों ने सुधार का वादा तक नहीं किया. इनमें से एक दिल्ली भी था.’

फास्ट फूड चेन केएफसी 5000 वर्ग फुट जगह का किराया 10 लाख से ज्यादा देता है वहीं अलाइड मोटर्स 8,800 वर्ग फुट का मात्र 1800 रुपये ही देता है

संस्था की संस्थापक सदस्य शोभा अग्रवाल बताती हैं, ‘जेएनएनयूआरएम के तहत अरबों रुपये बांटे गए. अनुबंध में यह साफ लिखा था कि राज्यों को पैसों की अगली किस्त तभी दी जाएगी जब वे अपने कानूनों में निर्धारित सुधार कर लेंगे. किसी भी राज्य ने यह शर्त पूरी नहीं की. इसके बावजूद भी उन्हें पैसा दिया गया. हमने इस संबंध में सभी संबंधित अधिकारियों को शिकायत भेजी थी.’

शोभा अग्रवाल ने दिल्ली किराया अधिनियम 1958 की संवैधानिक मान्यता को चुनौती देते हुए एक याचिका भी दाखिल की है. तीन जुलाई को इस याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय में अंतिम बहस होनी है. ‘यह कानून संविधान के अनुछेद 14, अनुछेद 19(1) (जी) और अनुछेद 21 में दिए गए मौलिक अधिकारों का हनन करता है. दिल्ली में इस संबंध में तीन अलग-अलग कानून हैं. कानून सबके लिए एक समान होने चाहिए’ शोभा अग्रवाल बताती हैं, ‘इस कानून के अंतर्गत वे ही लोग आते हैं जिनका किराया 3500 रुपये से कम है. यह पैमाना आज खरा नहीं है. इससे यह भी सुनिश्चित नहीं होता कि किराएदार गरीब व्यक्ति है. कई करोड़पति भी इस पैमाने के कारण किराया नियंत्रण का दुरूपयोग कर रहे हैं.’

शोभा अग्रवाल ने किराया कानून को चुनौती देने वाली यह याचिका 2010 में दाखिल की थी. वे बताती हैं कि उस वक्त दिल्ली उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने उनकी याचिका को एक लंबित मामले से जोड़ते हुए अपने न्यायालय में पेश करने को कहा. इस पर उन्हें कुछ संदेह हुआ. उन्होंने न्यायाधीश के बारे में जानकारी जुटाना शुरू किया. इसमें उन्होंने पाया कि वह न्यायाधीश स्वयं भी एक ऐसी संपत्ति में किराएदार हैं जो कि किराया नियंत्रण कानून के अंतर्गत आती है. अपनी जानकारियों को मजबूत करने के बाद उन्होंने न्यायालय से अपील की कि यह मामला किसी अन्य न्यायाधीश के सामने रखा जाए ताकि मामले में निष्पक्ष सुनवाई हो. इसके बाद यह याचिका एक अन्य न्यायाधीश की अदालत में पेश की गई.

बीस साल पहले जिस कानून को समाप्त करने का फैसला संसद ने लिया था वह आज तक जीवित क्यों है इस सवाल पर शोभा अग्रवाल बताती हैं, ‘इस कानून के समाप्त होने पर निश्चित तौर से वे लोग विरोध करेंगे जो इतने साल से इसका नाजायज फायदा उठा रहे हैं.’ किराया नियंत्रण कानून का समर्थन करने वाले अधिकतर लोग यह तर्क देते हैं कि यदि यह कानून समाप्त हुआ तो लाखों लोगों को अपने घर या व्यवसाय से बेदखल कर दिया जाएगा. इसके जवाब में शोभा कहती हैं, ‘यह एक भ्रमित करने वाला तर्क है. आज स्थिति ऐसी है कि अधिकतर किराएदार संपन्न हैं. इस कानून को समाप्त करने की मांग इसलिए नहीं है कि किराएदारों को बेघर किया जा सके. हमारी मांग सिर्फ यह है कि कम से कम मकान के असली हकदारों को उनकी सही कीमत तो मिले. आज कई मकान मालिक ऐसे भी हैं जिनकी माली हालत बहुत खराब है और उनकी करोड़ों की संपत्ति किराया नियंत्रण की भेंट चढ़ रही है.’ पुरानी दिल्ली के प्रवीण चंद जैन उन्हीं में से एक हैं. प्रवीण चंद की उम्र 69 साल है. उनके जवान बेटे की मौत हो चुकी है और अब वे अकेले ही रहते हैं. करोल बाग के पास गौशाला मार्ग पर उनकी पुश्तैनी इमारत है जिसमें लगभग 40 किराएदार रहते हैं. प्रवीण बताते हैं, ‘मेरे 40 किराएदारों का कुल मिलाकर महीने का 450 रुपये किराया है. वो भी लेने जाओ तो मुझसे भिखारियों जैसा बर्ताव करते हैं.’

‘उन्हें इस साल पांच करोड़ रुपये टैक्स जमा करने का नोटिस आया है. लेकिन किराएदारों में से कोई तीन सौ रुपया किराया देता है तो कोई चार सौ’

दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम से जूझ रहे लोगों की समस्या के समाधान पर जब भी दोनों पक्षों में बात होती है ‘पगड़ी’ के मुद्दे पर विवाद फंस जाता है. किराएदारों का कहना है कि आज से कई साल पहले जब वे मकान या दुकान में रहने आए थे तो उन्होंने मकान मालिक को ‘पगड़ी’ दी थी. ‘पगड़ी’ उस रकम को कहा जाता था जो किराएदार एकमुश्त मकान मालिक को देता था. उनके अनुसार यदि ‘पगड़ी’ में दी गई रकम की तुलना आज से करें तो वो लगभग संपत्ति की कीमत के बराबर ही होती है. लेकिन ‘पगड़ी’ देने का कोई भी सबूत किसी भी किराएदार के पास नहीं है. शोभा अग्रवाल कहती हैं, ‘कई संपत्तियां सरकारी विभागों के पास किराए पर हैं. यदि ‘पगड़ी’ देकर ही मकान या दुकान दी जाती थी तो ये विभाग किराएदार कैसे बन गए. सरकारी विभाग तो अवैध ‘पगड़ी’ देकर किराएदार नहीं बन सकता.’ शोभा आगे बताती हैं कि उस जमाने में भी संपत्ति दो तरीकों से बेचीं जाती थीं. एक सेल डीड के माध्यम से और दूसरा पॉवर ऑफ अटॉर्नी के माध्यम से. यदि ‘पगड़ी’ की रकम संपत्ति के बराबर ही थी तो इनमें से कुछ भी क्यों नहीं किया गया.

सदर बाजार व्यापारी संघ के अध्यक्ष प्रवीण कुमार आनंद पगड़ी के बारे कहते हैं, ‘यदि कुछ लोगों ने पगड़ी दी भी थी तो इतने सालों से नाम-मात्र का किराया देकर वे लोग पगड़ी की रकम भी वसूल कर चुके हैं. ये साफ दिखाई देता है कि जो किराया वे आज दे रहे हैं वह नाजायज है. कानून में बदलाव होना चाहिए. पुराने किराएदारों को खाली करने को न कहा जाए लेकिन किराया तो बाजार के हिसाब से बढ़ना ही चाहिए.’ आम तौर पर किराएदारों के पक्ष में रहने वाले बंगाली मार्केट व्यापारी संघ के महासचिव प्रमोद गुप्ता बताते हैं, ‘इस कानून को तो समाप्त होना ही चाहिए. ये तो साफ तौर से मकान मालिकों के साथ नाइंसाफी है. लेकिन नए कानून में किराएदारों के हित भी ध्यान में रखे जाएं. इन लोगों ने ये दुकानें तब किराए पर ली थी जब आस-पास सब जंगल था. इन्हीं की मेहनत से बाजार बना और संपत्ति की कीमत बढ़ी है. तो किराया बढ़ाया जाए लेकिन पुराने किराएदारों के लिए इसे बाजार के भाव से कम ही तय किया जाए.’

chhanu-mal-ki-haweli-in-oldकुछ राज्यों में किराया नियंत्रण कानूनों को सुधारने की दिशा में काम हुए भी हैं. अधिवक्ता अमित सेठी बताते हैं, ‘महाराष्ट्र में कानून में संशोधन हो चुका है. इसके बाद से यदि कहीं भी सरकारी विभाग किराए पर थे तो उन्हें इस कानून की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है. साथ ही यह भी फैसला लिया गया है कि यदि कोई निजी कंपनी किराएदार है और उसकी पेड अप कैपिटल एक करोड़ या उससे ज्यादा है तो वह किराया नियंत्रण कानून के अंतर्गत नहीं आएगी.’

महाराष्ट्र में हुए इन बदलावों से अधिवक्ता अमित सेठी तो संतुष्ट नजर आते हैं लेकिन शोभा अग्रवाल का नजरिया अलग है. उनका मानना है कि किराया नियंत्रण कानून होना ही नहीं चाहिए. ‘हर क्षेत्र का उदारीकारण हुआ है. आज चीनी और तेल के दाम भी बाजार तय करता है. इन पर सरकार कोई नियंत्रण नहीं रखती. और किराया नियंत्रण के नाम पर लोगों की निजी संपत्तियों को नियंत्रित करती है’ शोभा आगे बताती हैं, ‘कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को पूरा करने के लिए सरकार को अपने नागरिकों की हर व्यवस्था का ध्यान रखना चाहिए. लेकिन कुछ नागरिकों का भला करने के लिए कुछ अन्य नागरिकों का शोषण नहीं किया जा सकता. सरकार को यदि किराए में छूट देनी है तो सरकारी भवनों पर छूट दे. एक नागरिक की निजी संपत्ति पर सरकार किस अधिकार से किसी को भी छूट दे सकती है?’

किराएदार और मकान मालिक की इस सालों पुरानी लड़ाई का एक सबसे घातक पहलू और भी है. ऐसी विवादास्पद इमारतों की मरम्मत न तो किराएदार करता है और न ही मकान मालिक. देश भर में ऐसी इमारतों के गिरने और उनसें कई लोगों के जान गंवाने की खबरें कई बार सुनने को मिलती हैं. लेकिन कुछ लोगों ने इसमें भी समस्या का समाधान ढूंढ लिया है. विवादास्पद इमारतों की आसानी से अच्छी कीमत नहीं मिलती. ऐसे में कई मकान मालिक भूमाफियाओं को अपनी इमारत बेच देते हैं. यहां से उन्हें तुलनात्मक रूप में बेहतर दाम मिल जाते हैं. ये भूमाफिया पहले से ही जर्जर इमारतों को जबरन तुड़वा देते हैं और जमीन पर नए भवन बना लेते हैं. कुछ मकान मालिकों ने इससे थोड़ा अलग तरीका भी अपनाया है. वे अपनी इमारत को बैंक में गिरवी रख देते हैं. फिर जानबूझ कर बैंक के पैसे नहीं चुकाते. इस पर बैंक इमारत को अपने कब्जे में ले लेता है. इसके बाद कई बार जब बैंक किराएदारों को बेदखल कर बिल्डिंग की नीलामी करवाते हैं तो असली मालिक ही अपने लोगों के जरिए वापस इसे खरीद लेते हैं.

दिल्ली के जनपथ इलाके में एलआईसी 346 रुपये और यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस 733 रुपये किराया देकर हजारों वर्ग फुट जगह पर कब्जा किए हुए हैं

विश्व के लगभग 40 देशों में किराया नियंत्रण कानून मौजूद हैं. हालांकि इनका स्वरुप सभी देशों में अलग है लेकिन इसके दुष्परिणाम लगभग सभी जगह देखे गए हैं. स्वीडन के प्रख्यात अर्थशास्त्री असर लिंडबेक ने इसीलिए किराया नियंत्रण के बारे में कहा है कि ‘किसी शहर को बर्बाद करने के लिए बमबारी के अलावा यदि कोई दूसरा काबिल तरीका है तो वह किराये का नियंत्रण है.’

4 COMMENTS

  1. Bahut mahtwapoorna lekh hai
    Bharat men agar koi kanoon bahut anyaypoorna tatha ektarfa hai to woh kirayadari kanoon hai jisme koi tarksangat sanshodhan nahin kiya gaya.desh ke har pradesh ke har gaon, kasbe, shahar men lakhon makaan aise hain jo kirayedaron ke kabje men hain aur makan malik bechare lachar hain.aisa bhi hai ki kirayedar us zagah se hazaron rupaya kama raha hai aur makan malik roti ko mohtaz hai.Adalaton se koi rahat nahin milti.
    Atah is sandarbh men kuchh aiya jana jaroori hai.

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