आंकड़ों की खेती सवालों की फसल!

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मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान किसानों की बर्बाद फसल का जायजा लेते हुए.

पिछले तीन सालों के दौरान देश के कृषि मानचित्र में मध्य प्रदेश का तेजी से उभार हुआ है. ‘बीमारू’ की श्रेणी में आनेवाला यह राज्य देश में सबसे अधिक कृषि विकास दर के साथ आगे बढ़ रहा है. राज्य की कृषि विकास दर वित्त वर्ष 2011-12 में 18.90  फीसदी और वित्त वर्ष 2012-13 में 20.44 फीसदी रही. इस विकास दर को देखते हुए मध्य प्रदेश को लगातार दो बार केंद्र सरकार का कृषि कर्मठ पुरस्कार भी प्राप्त हुआ. इन दो सालों में प्रदेश का मौसम तो औसत रहा लेकिन कृषि उत्पादन लगातार बढ़ता रहा.

यहां तक सबकुछ ठीक चल रहा था किंतु वित्त वर्ष 2013-14 में इंद्रदेव देश के इस हृदयस्थल पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो गए. जून से शुरू हुआ बारिश का सिलसिला इस साल फरवरी तक चलता रहा. पिछली बार राज्य में जून से सितंबर के दौरान ही सामान्य से तकरीबन 18 फीसदी ज्यादा बारिश हुई. उसके बाद आगे चार महीने बारिश होती रही. इतना ही नहीं फरवरी, 2014 के दौरान तो अतिवृष्टि के साथ ही ओलावृष्टि भी हुई. इस भारी बारिश और ओलावृष्टि के चलते राज्य में खरीफ (जिन फसलों की बुवाई मॉनसून में होती है) और रबी (ठंड के मौसम में बोई जानेवाली फसलें) दोनों सीजन की फसलों को भारी नुकसान हुआ. राज्य सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार खरीफ में 28 जिलों और रबी में सभी 51 जिलों में फसलों को नुकसान हुआ. इन स्थितियों के बाद भी चमत्कार यह कि राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश की कृषि और उससे संबंधित पशुपालन क्षेत्र की विकास दर 24.99 फीसदी तक पहुंच गई. इसमें से यदि पशुपालन को हटा दिया जाए तो केवल कृषि क्षेत्र की विकास दर 24 फीसदी होती है. यानी लगातार तीसरे साल कृषि विकास दर में बढोत्तरी. और वह भी बीते साल की तुलना में साढ़े तीन फीसदी ज्यादा !

राज्य सरकार के इन आंकड़ों ने सभी को चौंका दिया है. खुद किसानों से लेकर विशेषज्ञ तक इस नतीजे पर हैरानी जता रहे हैं. इस संदेह का कारण खुद सरकार द्वारा दिए आंकड़ों का विरोधाभास है. इनके हिसाब से दोनों सीजनों में फसलों को भारी नुकसान तो हुआ लेकिन कुल उत्पादन पिछले सालों की तुलना में बढ़ गया है. तो क्या ये दोनों स्थितियां एक साथ संभव हैं? राज्य सरकार तो इस सवाल पर पहले ही अपना पक्ष साफ कर चुकी है लेकिन विशेषज्ञों से बातचीत और उत्पादन-नुकसान के आंकड़ों का हमारा आकलन इस संभावना पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है.

चूंकि यहां सारे दावे और उनपर सवाल आंकड़ों पर आधारित हैं तो पहले इन्हीं को अलग-अलग कर देखते हैं. पहले खरीफ की फसल की बात करते हैं. मध्य प्रदेश में इस सीजन की मुख्य फसलें, सोयाबीन, धान, ज्वार और मक्का हैं. बीते खरीफ के सीजन में हुई भारी बारिश से सभी मुख्य फसलों को भारी नुकसान हुआ. सोयाबीन का रकबा अपेक्षाकृत बहुत ज्यादा होता है और इसकी फसल ही सबसे ज्यादा बर्बाद हुई. प्रदेश के 28 जिलों में 9.24 लाख हेक्टेयर में फसलों को नुकसान हुआ. इसमें 5.62 लाख हेक्टेयर क्षेत्र ऐसा रहा जहां पर फसलों का नुकसान 50  फीसदी से अधिक था. राज्य सरकार ने खरीफ सीजन में फसलों के नुकसान का जो आकलन किया है वह 4,640 करोड़ रुपये का है. राज्य सरकार भी उत्पादन आंकड़ों के आधार पर इसे स्वीकार करती है. वर्ष 2012 में खरीफ का कुल कृषि उत्पादन करीब 165  लाख टन था, जो वर्ष 2013 में घटकर 128 लाख टन रह गया. हालांकि कुल बुआई क्षेत्रफल वर्ष 2012 के 119.40 लाख हेक्टेयर की तुलना में वर्ष 2013 में बढ़कर 124 लाख हेक्टेयर हो गया था.

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gaurishankar_bisen-BK2013-14 में दोनों सीजन की फसलों को काफी नुकसान हुआ लेकिन मुख्य फसल के स्थान पर दूसरी फसलों की उपज बढ़ने से नुकसान की भरपाई हो गई’

गौरीशंकर बिसेन कृषि मंत्री, मप्र

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जैसा हमने पहले बताया है कि राज्य सरकार खरीफ सीजन में तो नुकसान स्वीकार कर रही है. लेकिन रबी सीजन के उत्पादन में वह काफी बढ़ोतरी दिखा रही है. जबकि इस सीजन में बारिश और ओलावृष्टि से खरीफ की तुलना में ज्यादा क्षेत्रफल में नुकसान हुआ था. अब यदि हम बुवाई क्षेत्रफल और उत्पादकता के सरकारी आंकड़ों को आधार मानें तो इससे भी साबित हो जाता है कि उत्पादन सरकारी अनुमान से काफी कम है. रबी सीजन में बारिश और ओलावृष्टि से नुकसान के बारे में सरकार कहती है कि कुल 37 लाख हेक्टेयर में नुकसान हुआ है. इसमें से करीब 11 लाख हेक्टेयर ऐसा क्षेत्र है जहां पर फसल का नुकसान पचास फीसदी से ज्यादा है. सरकारी प्रावधानों के मुताबिक यदि फसल का नुकसान 30 फीसदी से अधिक होता है तभी सरकार उसे नुकसान मानती है और उसका मुआवजा तय करती है. इस आधार पर माना जा सकता है कि 26 लाख हेक्टेयर में नुकसान कम से कम 30 फीसदी हुआ होगा और 11 लाख हेक्टेयर में कम से कम 50 फीसदी. रबी सीजन का कुल बुवाई क्षेत्रफल 112 लाख हेक्टेयर है. इसमें से 37 लाख हेक्टेयर को हटा दिया जाए तो करीब 75 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कोई नुकसान नहीं हुआ. मध्य प्रदेश में रबी की उत्पादकता लगभग 2.10 टन प्रति हेक्टेयर बताई गई है. इस तरह से 75 लाख हेक्टेयर में कुल उत्पादन करीब 157.50 लाख टन हुआ. नुकसान वाले 26 लाख हेक्टेयर में उत्पादन 38 लाख टन और शेष 11 लाख हेक्टेयर में तकरीबन 11.50 लाख टन होना चाहिए.  इस तरह से 2013 की रबी फसल का कुल उत्पादन करीब 207  लाख टन होता है. हमारा अनुमान नुकसान के न्यूनतम आकलन पर आधारित है जबकि राज्य सरकार उत्पादन 238 लाख टन बता रही है. यहां उत्पादन में लगभग 31 लाख टन की बढ़ोतरी मामूली नहीं मानी जा सकती. एक  कृषि विशेषज्ञ नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘ खरीफ सीजन में उत्पादन में कमी खुद सरकार स्वीकार कर रही है. दूसरी ओर यदि रबी उत्पादन के आंकड़ों को सही भी मान लें तब भी विकास दर में 24 फीसदी की बढ़ोत्तरी संभव नहीं है. वैसे भी रबी में ज्यादा उत्पादन की बात को सही नहीं माना जा सकता’  वित्त वर्ष 2012-13 में जब औसत मौसम था तब रबी का कुल उत्पादन 221.15 लाख टन हुआ था, जो वित्त वर्ष 2013-14 में खराब मौसम के बावजूद बढ़कर 238 लाख टन हो गया. इस सीजन की सबसे प्रमुख फसल गेहूं होती है, जिसका उत्पादन 161 लाख टन से बढ़कर 178 लाख टन हो गया है.  इन आंकडों पर कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा कहते हैं, ‘ जो भी आंकड़े राज्य सरकार ने प्रस्तुत किए हैं  उन पर पूरी तरह विश्वास करना मुश्किल है. उत्पादकता में भारी बढ़ोतरी हो रही होती तो दोनों ही स्थितियां एक साथ संभव थीं पर ऐसा नहीं हुआ.’

मध्य प्रदेश की कृषि विकास दर में सबसे ज्यादा योगदान सोयाबीन और गेहूं का होता है. सरकार के दावे को आधार बनाकर इन्हीं दोनों के उत्पादन आंकड़ों पर प्रश्न चिन्ह खड़ा किया जा रहा है.

सोयाबीन हुआ तो गया कहां?
मध्य प्रदेश सबसे ज्यादा सोयाबीन (देश के कुल सोयाबीन उत्पादन में 55 फीसदी योगदान) उत्पादन करनेवाला राज्य है. सबसे ज्यादा सोयाबीन प्रोसेसिंग  प्लांट भी यहीं पर हैं. इसी कारण यहां से सबसे ज्यादा सोयामील (सोयाबीन की खली) का निर्यात भी होता है. सोया उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि राज्य सरकार सोयाबीन उत्पादन के जो आंकड़े प्रस्तुत कर रही है वे जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते. सरकार ने वित्त वर्ष 2013-14 में सोयाबीन का उत्पादन लगभग 47 लाख टन बताया है जो पिछले साल के 83 लाख टन से काफी कम है. लेकिन इस हिसाब से भी प्लांटों के लिए बाजार में सोयाबीन अपेक्षानुसार उपलब्धता नहीं है. इसी का परिणाम है कि इस वर्ष सोयामील निर्यात में भारी गिरावट आई है. सोयाबीन की फसल अक्टूबर से मंडियों में आने लगती है. आंकड़े बताते हैं कि अक्टूबर, 2013 से लेकर जुलाई, 2014 तक सोयामील का निर्यात लगातार कम हुआ है.

पिछले तीन सालों के दौरान मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों में गेहूं की सरकारी खरीद 50 फीसदी से लेकर दोगुना तक बढ़ी और घटी है

इंदौर की सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन (सोपा) के आंकड़ों के अनुसार जुलाई, 2014 के दौरान देश से सोयामील का निर्यात 6,682 टन हुआ है, जबकि जुलाई, 2013 में यह निर्यात 1.07 लाख टन था. इसी तरह अक्टूबर, 2013 से जुलाई, 2014 के दौरान कुल निर्यात 20.58 लाख टन हुआ है जबकि पिछले तेल वर्ष (अक्टूबर, 2012 से सितंबर, 2013 तक) में निर्यात 31.15 लाख टन था. सोपा के प्रवक्ता राजेश अग्रवाल बताते हैं, ‘ निर्यात में जो कमी आई है उसकी मुख्य वजह सोयाबीन की उपलब्धता का अभाव है. बाजार में सरकार के अनुमान के हिसाब से सोयाबीन नहीं है. इसके चलते दाम भी काफी ऊंचे हंै. वास्तविक उत्पादन सरकारी अनुमान से कहीं कम है.’

गेहूं का गोलमाल
राज्य सरकार का दावा है कि गेहूं का उत्पादन वर्ष 2012 के 161.25 लाख टन की तुलना में वर्ष 2013 में 174.78 लाख टन हुआ है. इसके लिए सरकार गेहूं की सरकारी खरीद को आधार बता रही है. उसका कहना है कि पिछले वर्ष की तुलना में इस साल अधिक उत्पादन की वजह से सरकारी खरीद में बढ़ोत्तरी हुई है. इसके विपरीत जानकारों का कहना है कि राज्य में गेहूं की सरकारी खरीद में एक बड़ा हिस्सा पड़ोसी राज्यों से आई गेहूं का है. असल में मध्य प्रदेश में गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर 150 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस होता है इस वजह से अन्य राज्यों के किसानों ने काफी मात्रा में यहां गेहूं बेचा है.  यही वजह है कि गेहूं ‘उत्पादन’ में मध्य प्रदेश भारी बढ़ोतरी दर्ज कर रहा है.

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फोटो: विकास कुमार

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सवाल और भी हैं…

2013-14 का उत्पादन ज्यादा कैसे?
मध्य प्रदेश सरकार के उत्पादन आंकडे़ बताते हैं कि वर्ष 2012-13 में खरीफ का कुल उत्पादन करीब 165  लाख टन और रबी का 221 लाख टन था. इस साल उद्यानिकी में उत्पादन तकरीबन 228 लाख टन रहा. यानी वर्ष 2012-13 में कुल उत्पादन करीब 614 लाख टन है. अब हम यही आंकड़े वर्ष 2013-14 के लिए लेते हैं. इस साल खरीफ का उत्पादन 128 लाख टन, रबी का 238 लाख टन और उद्यानिकी में 234.55 लाख टन का उत्पादन हुआ है. यानी कुल उत्पादन तकरीबन 600.50 लाख टन हुआ. यह पिछले वित्त वर्ष से 14 लाख टन कम है ऐसे में सरकार कृषि वृद्धि दर में बढ़ोत्तरी का दावा कैसे कर सकती है?

मंडी आवक नकारात्मक
मध्य प्रदेश सरकार द्वारा उत्पादन में बढ़ोत्तरी का दावा मंडियों में आवक से पुष्ट नहीं होता है. वित्त वर्ष 2012-13 में मंडियों की कुल आवक 250.82 लाख टन थी, जो वित्त वर्ष 2013-14 में कम होकर 249.39 रह गई है. हालांकि यह गिरावट मामूली है किन्तु जब उत्पादन में करीब 24 फीसदी की बढ़ोत्तरी हो रही है तो मंडियों की आवक में गिरावट होने के स्थान पर उसी अनुपात में बढ़नी चाहिए. इन मंडियों की आवक में वित्त वर्ष 2013-14 का गेहूं उत्पादन शामिल नहीं है, किन्तु वित्त वर्ष 2012-13 का शामिल है. यदि इस साल की आवक को जोड़ा जाए तो यह बढ़ोत्तरी बहुत ही मामूली होगी.

उद्यानिकी में नुकसान फिर भी वृद्धि
बारिश और ओलावृष्टि से दोनों सीजन में अनाजों के साथ ही उद्यानिकी फसलों को भी इससे काफी नुकसान हुआ था. फल, सब्जी और मसाले सभी पर इसका असर पड़ा. उसके बाद भी मध्य प्रदेश सरकार का दावा है कि वर्ष 2013-14 में उद्यानिकी फसलों का उत्पादन बढ़ा है. वर्ष 2013-14  में कुल 14.66 लाख हेक्टेयर में उद्यानिकी फसलों की बुआई हुई, जहां से 234.55 लाख टन का उत्पादन हुआ है. वित्त वर्ष 2012-13 में 14.26 लाख हेक्टेयर में बुआई हुई जहां से 227.71 लाख टन उत्पादन हुआ है. उद्यानिकी फसलों का सबसे ज्यादा उत्पादन मालवा (पश्चिम मध्य प्रदेश) और निमाड़ क्षेत्र (दक्षिण मध्य प्रदेश) में होता है. यहीं पर सेंधवा के एक बड़े किसान समर विजय सिंह कहते है, ‘ निमाड़ में शायद ही कोई ऐसा किसान होगा जिसको बारिश से नुकसान न हुआ हो. मेरी कुल उद्यानिकी फसल का करीब 25-30 फीसदी हिस्सा भारी बारिश की वजह से नष्ट हुआ. सबसे ज्यादा नुकसान टमाटर, संतरा, केला और मिर्च को हुआ है.’  वे आगे बताते हैं कि सरकार ने नुकसान का आकलन तो किया है और मुआवजा भी दिया है किंतु उसका आकलन वास्तविक नुकसान से काफी कम है. यही वजह है कि किसानों को नुकसान के एवज में मुआवजा काफी कम मिला.

हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि हर साल बढ़ कैसे रही है?
मध्य प्रदेश में पिछले कुछ सालों से सभी प्रमुख फसलों का बुवाई क्षेत्रफल बढ़ रहा है. इसमें उद्यानिकी फसलें भी शामिल हैं. पिछले पांच सालों के दौरान खाद्यान्नों के बुवाई क्षेत्रफल में करीब 27 लाख हेक्टेयर की वृद्धि हुई है. इसी तरह उद्यानिकी में करीब सात लाख हेक्टेयर की बढ़ोत्तरी हुई है.  वित्त वर्ष 2009-10 की तुलना में वित्त वर्ष 2013-14 में उद्यानिकी फसलों का बुआई क्षेत्रफल दोगुना बढ़कर 14.25 लाख हेक्टेयर हो गया है. इतना ही नहीं चालू वित्त वर्ष में भी सरकार ने करीब पांच लाख हेक्टेयर बुआई क्षेत्र बढ़ाने का लक्ष्य रखा है. इन सभी को शामिल कर लिया जाए तो करीब 46 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल बढ़ा है.  यहां यह संदेह पैदा होता है कि इतना बढ़ा क्षेत्र आया कहां से . राज्य में कुल सिंचित क्षेत्र करीब 25 लाख हेक्टेयर है  और बढ़ी हुई कृषिभूमि इससे भी ज्यादा है. इस बारे में केंद्रीय कृषि संस्थान, इंदौर  के एक वैज्ञानिक कहते हंै, ‘राज्य में जिस तेजी से कृषि क्षेत्र बढ़ रहा है वह समझ से परे है. एक ओर शहरीकरण बढ़ रहा है. उद्योगों के लिए भी जमीन दी जा रही है. ऐसे में इतनी सारी जमीन कहां से आई. वन क्षेत्रफल में जो कमी आई है वह उद्योगों के पास जा रही है. यही वजह है कि सरकार के आंकड़ों पर विश्वास करना मुश्किल है.’

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गेहूं खरीद के आंकड़ों में भारी उतार-चढ़ाव देखकर इस बात को और आसानी से समझा जा सकता है. पिछले तीन सालों के दौरान विभिन्न जिलों के गेहूं खरीद के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि खरीद 50 फीसदी से लेकर दोगुना तक बढ़ और घट रही है. किसी भी जिले में सामान्य स्थितियों में उत्पादन में इस तरह का उतार-चढ़ाव नहीं होता. गेहूं अनुसंधान केंद्र, इंदौर के एक कृषि वैज्ञानिक बताते हैं, ‘गेहूं की उत्पादकता में पिछले पांच सालों के औसत की तुलना में पचास फीसदी से भी ज्यादा की बढ़ोत्तरी दिखाई जा रही है. यह बढ़ोत्तरी विशेषकर तभी से हो रही है जब से बोनस की घोषणा हुई है. इसके चलते अचानक से आई उत्पादकता में बढ़ोतरी पर पूरी तरह विश्वास करना मुश्किल है. इसकी असलियत तभी पता चलेगी जब गेहूं खरीद पर बोनस  न दिया जाए.’

पड़ोसी राज्यों से गेहूं बिकने के लिए आ रहा है इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि वित्त वर्ष 2012-13 के दौरान गेहूं बिक्री के लिए जो पंजीकरण हुए  उनमें करीब 20 लाख हेक्टेयर के पंजीकरण फर्जी पाए गए थे. जांच के बाद उन्हें रद्द कर दिया गया. किसानों को गेहूं बिक्री से पहले अपनी जमीन का पंजीकरण करवाना होता है. पंजीकरण रद्द होने की वजह से उस वर्ष खरीद न केवल अनुमान से कम हुई बल्कि इसके पिछले साल की तुलना में काफी घट गई थी. हालांकि राज्य सरकार इस तरह के  आरोपों को सही नहीं मानती. मध्य प्रदेश के कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन सफाई देते हैं, ‘ राज्य में किसानों से जो खरीद की जाती है उसका पहले ऑनलाइन पंजीयन होता है. उसके बाद पंजीयन का उनके जमीन के कागजातों से मिलान किया जाता है. केवल इन्हीं के साथ खरीद की जाती है. उसके बाद खरीद का जो मूल्य होता है वह उस किसान के खाते में सीधे भेजा जाता है. इस तरह की व्यवस्था में यह कहना की बाहर से आकर लोग अपनी उपज बेच रहे है सही नहीं होगा.’

कृषि मंत्री का दावा जो भी हो लेकिन हाल के कुछ उदाहरण बताते हैं कि राज्य सरकार द्वारा बनाई गई व्यवस्था पूरी तरह कारगर नहीं है. गेहूं की सरकारी खरीद में सबसे ज्यादा उतार-चढ़ाव दूसरे राज्यों से सटे हुए जिलों में देखने को मिलता है.  इसमें उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र से लगे हुए जिले शामिल हंै. इसका यह मतलब कतई नहीं है कि दूसरे जिलों में ऐसा नहीं था. हरदा जिले (मध्य प्रदेश के दक्षिण-पूर्व का जिला) में भी उत्तर प्रदेश का गेहूं सरकार द्वारा पहले जब्त किया जा चुका है. जिलों में गेहूं खरीद में जो भारी उतार-चढ़ाव है उसका एक उदाहरण प्रस्तुत है. दतिया, उत्तर प्रदेश की सीमा से लगा मध्य प्रदेश का एक छोटा-सा जिला है. वर्ष 2011-12  में यहां गेहूं की खरीद तकरीबन 79,000  टन थी, जो वित्त वर्ष 2012-13 में बढ़कर 1,60,628 टन हो जाती है.  स्पष्ट है कि खरीद में दोगुनी बढ़ोतरी हो गई. इसके बाद वित्त वर्ष 2013-14 के दौरान यह खरीद घटकर 65,000 टन पर आ जाती है. यह वही वर्ष है जब बड़ी संख्या में पंजीकरण रद्द किए गए थे. यहां यह याद रखना होगा कि वित्त वर्ष 2013-14 में जो गेहूं खरीद हो रही है वह वित्त वर्ष 2012-13 के उत्पादन की होती है और खरीद अप्रैल से शुरू होती है. प्रदेश के पश्चिम स्थित जिले नीमच में खरीद को देखें जो वित्त वर्ष 2011-12 में 18,978 टन थी और अगले वित्त वर्ष में यह दोगुनी से ज्यादा बढ़कर 43,000 टन पहुंच जाती है. वित्त वर्ष 2013-14 में यह घटकर 18,900 टन हो जाती है. इसके बाद  2014-15 में फिर से बढ़कर 38,900 टन हो जाती है. इसी तरह की स्थिति मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह के गृह जिले और केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज के संसदीय क्षेत्र विदिशा में भी है. यहां पर वित्त वर्ष 2011-12 में गेहूं की सरकारी खरीद 1.35 लाख टन हुई, जो वर्ष 2012-13 में बढ़कर 3.25 लाख टन पहुंच गई. यह बढ़ोतरी दोगुने से भी ज्यादा है. उसके बाद अगले वित्त वर्ष में यह घटकर 2.27 लाख टन हो गई है जो करीब पचास फीसदी की कमी है. पड़ोसी राज्यों से आ रहे गेहूं के पक्ष में एक और तर्क जाता है. राज्य सरकार ने रबी सीजन में जिन जिलों में बड़े क्षेत्र में फसल का नुकसान दिखाया है, आश्चर्यजनक रूप से वहां गेहूं खरीद में भी काफी बढ़ोत्तरी हुई है.

मुमकिन है राज्य सरकार के आंकड़ों के आधार पर इसबार भी मध्य प्रदेश को कृषि कर्मण पुरस्कार मिल जाए. लेकिन इनपर उठे सवाल और गहराए तो प्रदेश का बीते दो सालों का कृषि प्रदर्शन भी संदिग्ध हो जाएगा

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