आंकड़ों की खेती सवालों की फसल!

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फोटो: विकास कुमार

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सवाल और भी हैं…

2013-14 का उत्पादन ज्यादा कैसे?
मध्य प्रदेश सरकार के उत्पादन आंकडे़ बताते हैं कि वर्ष 2012-13 में खरीफ का कुल उत्पादन करीब 165  लाख टन और रबी का 221 लाख टन था. इस साल उद्यानिकी में उत्पादन तकरीबन 228 लाख टन रहा. यानी वर्ष 2012-13 में कुल उत्पादन करीब 614 लाख टन है. अब हम यही आंकड़े वर्ष 2013-14 के लिए लेते हैं. इस साल खरीफ का उत्पादन 128 लाख टन, रबी का 238 लाख टन और उद्यानिकी में 234.55 लाख टन का उत्पादन हुआ है. यानी कुल उत्पादन तकरीबन 600.50 लाख टन हुआ. यह पिछले वित्त वर्ष से 14 लाख टन कम है ऐसे में सरकार कृषि वृद्धि दर में बढ़ोत्तरी का दावा कैसे कर सकती है?

मंडी आवक नकारात्मक
मध्य प्रदेश सरकार द्वारा उत्पादन में बढ़ोत्तरी का दावा मंडियों में आवक से पुष्ट नहीं होता है. वित्त वर्ष 2012-13 में मंडियों की कुल आवक 250.82 लाख टन थी, जो वित्त वर्ष 2013-14 में कम होकर 249.39 रह गई है. हालांकि यह गिरावट मामूली है किन्तु जब उत्पादन में करीब 24 फीसदी की बढ़ोत्तरी हो रही है तो मंडियों की आवक में गिरावट होने के स्थान पर उसी अनुपात में बढ़नी चाहिए. इन मंडियों की आवक में वित्त वर्ष 2013-14 का गेहूं उत्पादन शामिल नहीं है, किन्तु वित्त वर्ष 2012-13 का शामिल है. यदि इस साल की आवक को जोड़ा जाए तो यह बढ़ोत्तरी बहुत ही मामूली होगी.

उद्यानिकी में नुकसान फिर भी वृद्धि
बारिश और ओलावृष्टि से दोनों सीजन में अनाजों के साथ ही उद्यानिकी फसलों को भी इससे काफी नुकसान हुआ था. फल, सब्जी और मसाले सभी पर इसका असर पड़ा. उसके बाद भी मध्य प्रदेश सरकार का दावा है कि वर्ष 2013-14 में उद्यानिकी फसलों का उत्पादन बढ़ा है. वर्ष 2013-14  में कुल 14.66 लाख हेक्टेयर में उद्यानिकी फसलों की बुआई हुई, जहां से 234.55 लाख टन का उत्पादन हुआ है. वित्त वर्ष 2012-13 में 14.26 लाख हेक्टेयर में बुआई हुई जहां से 227.71 लाख टन उत्पादन हुआ है. उद्यानिकी फसलों का सबसे ज्यादा उत्पादन मालवा (पश्चिम मध्य प्रदेश) और निमाड़ क्षेत्र (दक्षिण मध्य प्रदेश) में होता है. यहीं पर सेंधवा के एक बड़े किसान समर विजय सिंह कहते है, ‘ निमाड़ में शायद ही कोई ऐसा किसान होगा जिसको बारिश से नुकसान न हुआ हो. मेरी कुल उद्यानिकी फसल का करीब 25-30 फीसदी हिस्सा भारी बारिश की वजह से नष्ट हुआ. सबसे ज्यादा नुकसान टमाटर, संतरा, केला और मिर्च को हुआ है.’  वे आगे बताते हैं कि सरकार ने नुकसान का आकलन तो किया है और मुआवजा भी दिया है किंतु उसका आकलन वास्तविक नुकसान से काफी कम है. यही वजह है कि किसानों को नुकसान के एवज में मुआवजा काफी कम मिला.

हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि हर साल बढ़ कैसे रही है?
मध्य प्रदेश में पिछले कुछ सालों से सभी प्रमुख फसलों का बुवाई क्षेत्रफल बढ़ रहा है. इसमें उद्यानिकी फसलें भी शामिल हैं. पिछले पांच सालों के दौरान खाद्यान्नों के बुवाई क्षेत्रफल में करीब 27 लाख हेक्टेयर की वृद्धि हुई है. इसी तरह उद्यानिकी में करीब सात लाख हेक्टेयर की बढ़ोत्तरी हुई है.  वित्त वर्ष 2009-10 की तुलना में वित्त वर्ष 2013-14 में उद्यानिकी फसलों का बुआई क्षेत्रफल दोगुना बढ़कर 14.25 लाख हेक्टेयर हो गया है. इतना ही नहीं चालू वित्त वर्ष में भी सरकार ने करीब पांच लाख हेक्टेयर बुआई क्षेत्र बढ़ाने का लक्ष्य रखा है. इन सभी को शामिल कर लिया जाए तो करीब 46 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल बढ़ा है.  यहां यह संदेह पैदा होता है कि इतना बढ़ा क्षेत्र आया कहां से . राज्य में कुल सिंचित क्षेत्र करीब 25 लाख हेक्टेयर है  और बढ़ी हुई कृषिभूमि इससे भी ज्यादा है. इस बारे में केंद्रीय कृषि संस्थान, इंदौर  के एक वैज्ञानिक कहते हंै, ‘राज्य में जिस तेजी से कृषि क्षेत्र बढ़ रहा है वह समझ से परे है. एक ओर शहरीकरण बढ़ रहा है. उद्योगों के लिए भी जमीन दी जा रही है. ऐसे में इतनी सारी जमीन कहां से आई. वन क्षेत्रफल में जो कमी आई है वह उद्योगों के पास जा रही है. यही वजह है कि सरकार के आंकड़ों पर विश्वास करना मुश्किल है.’

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गेहूं खरीद के आंकड़ों में भारी उतार-चढ़ाव देखकर इस बात को और आसानी से समझा जा सकता है. पिछले तीन सालों के दौरान विभिन्न जिलों के गेहूं खरीद के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि खरीद 50 फीसदी से लेकर दोगुना तक बढ़ और घट रही है. किसी भी जिले में सामान्य स्थितियों में उत्पादन में इस तरह का उतार-चढ़ाव नहीं होता. गेहूं अनुसंधान केंद्र, इंदौर के एक कृषि वैज्ञानिक बताते हैं, ‘गेहूं की उत्पादकता में पिछले पांच सालों के औसत की तुलना में पचास फीसदी से भी ज्यादा की बढ़ोत्तरी दिखाई जा रही है. यह बढ़ोत्तरी विशेषकर तभी से हो रही है जब से बोनस की घोषणा हुई है. इसके चलते अचानक से आई उत्पादकता में बढ़ोतरी पर पूरी तरह विश्वास करना मुश्किल है. इसकी असलियत तभी पता चलेगी जब गेहूं खरीद पर बोनस  न दिया जाए.’

पड़ोसी राज्यों से गेहूं बिकने के लिए आ रहा है इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि वित्त वर्ष 2012-13 के दौरान गेहूं बिक्री के लिए जो पंजीकरण हुए  उनमें करीब 20 लाख हेक्टेयर के पंजीकरण फर्जी पाए गए थे. जांच के बाद उन्हें रद्द कर दिया गया. किसानों को गेहूं बिक्री से पहले अपनी जमीन का पंजीकरण करवाना होता है. पंजीकरण रद्द होने की वजह से उस वर्ष खरीद न केवल अनुमान से कम हुई बल्कि इसके पिछले साल की तुलना में काफी घट गई थी. हालांकि राज्य सरकार इस तरह के  आरोपों को सही नहीं मानती. मध्य प्रदेश के कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन सफाई देते हैं, ‘ राज्य में किसानों से जो खरीद की जाती है उसका पहले ऑनलाइन पंजीयन होता है. उसके बाद पंजीयन का उनके जमीन के कागजातों से मिलान किया जाता है. केवल इन्हीं के साथ खरीद की जाती है. उसके बाद खरीद का जो मूल्य होता है वह उस किसान के खाते में सीधे भेजा जाता है. इस तरह की व्यवस्था में यह कहना की बाहर से आकर लोग अपनी उपज बेच रहे है सही नहीं होगा.’

कृषि मंत्री का दावा जो भी हो लेकिन हाल के कुछ उदाहरण बताते हैं कि राज्य सरकार द्वारा बनाई गई व्यवस्था पूरी तरह कारगर नहीं है. गेहूं की सरकारी खरीद में सबसे ज्यादा उतार-चढ़ाव दूसरे राज्यों से सटे हुए जिलों में देखने को मिलता है.  इसमें उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र से लगे हुए जिले शामिल हंै. इसका यह मतलब कतई नहीं है कि दूसरे जिलों में ऐसा नहीं था. हरदा जिले (मध्य प्रदेश के दक्षिण-पूर्व का जिला) में भी उत्तर प्रदेश का गेहूं सरकार द्वारा पहले जब्त किया जा चुका है. जिलों में गेहूं खरीद में जो भारी उतार-चढ़ाव है उसका एक उदाहरण प्रस्तुत है. दतिया, उत्तर प्रदेश की सीमा से लगा मध्य प्रदेश का एक छोटा-सा जिला है. वर्ष 2011-12  में यहां गेहूं की खरीद तकरीबन 79,000  टन थी, जो वित्त वर्ष 2012-13 में बढ़कर 1,60,628 टन हो जाती है.  स्पष्ट है कि खरीद में दोगुनी बढ़ोतरी हो गई. इसके बाद वित्त वर्ष 2013-14 के दौरान यह खरीद घटकर 65,000 टन पर आ जाती है. यह वही वर्ष है जब बड़ी संख्या में पंजीकरण रद्द किए गए थे. यहां यह याद रखना होगा कि वित्त वर्ष 2013-14 में जो गेहूं खरीद हो रही है वह वित्त वर्ष 2012-13 के उत्पादन की होती है और खरीद अप्रैल से शुरू होती है. प्रदेश के पश्चिम स्थित जिले नीमच में खरीद को देखें जो वित्त वर्ष 2011-12 में 18,978 टन थी और अगले वित्त वर्ष में यह दोगुनी से ज्यादा बढ़कर 43,000 टन पहुंच जाती है. वित्त वर्ष 2013-14 में यह घटकर 18,900 टन हो जाती है. इसके बाद  2014-15 में फिर से बढ़कर 38,900 टन हो जाती है. इसी तरह की स्थिति मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह के गृह जिले और केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज के संसदीय क्षेत्र विदिशा में भी है. यहां पर वित्त वर्ष 2011-12 में गेहूं की सरकारी खरीद 1.35 लाख टन हुई, जो वर्ष 2012-13 में बढ़कर 3.25 लाख टन पहुंच गई. यह बढ़ोतरी दोगुने से भी ज्यादा है. उसके बाद अगले वित्त वर्ष में यह घटकर 2.27 लाख टन हो गई है जो करीब पचास फीसदी की कमी है. पड़ोसी राज्यों से आ रहे गेहूं के पक्ष में एक और तर्क जाता है. राज्य सरकार ने रबी सीजन में जिन जिलों में बड़े क्षेत्र में फसल का नुकसान दिखाया है, आश्चर्यजनक रूप से वहां गेहूं खरीद में भी काफी बढ़ोत्तरी हुई है.

मुमकिन है राज्य सरकार के आंकड़ों के आधार पर इसबार भी मध्य प्रदेश को कृषि कर्मण पुरस्कार मिल जाए. लेकिन इनपर उठे सवाल और गहराए तो प्रदेश का बीते दो सालों का कृषि प्रदर्शन भी संदिग्ध हो जाएगा

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