आईएस: समस्याजनक समाधान

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चिंता उस नीति से भी उपजती है जो अमेरिका दुनिया भर के अस्थिर इलाकों में लंबे समय से इस्तेमाल करता रहा है. यानी विरोधी को निपटाने के लिए उसके विरोधियों के हाथ मजबूत कर दो. लेकिन इससे समस्या और विकराल हुई है. जैसे  फ्री सीरियन आर्मी को अमेरिका ने भी जमकर हथियार दिए. बाद में जब यह संगठन बिखरने लगा तो इसके सदस्यों की एक बड़ी संख्या आईएस में शामिल हो गई. बगदादी के बारे में तो कहा जा रहा है कि उसे अमेरिका की मिलीभगत से इजरायली जासूसी एजेंसी मोसाद ने ट्रेनिंग दी थी. यानी पश्चिम ने खुद अपने लिए एक भस्मासुर पैदा किया है. अमेरिका की इस रणनीति का परिणाम अक्सर यही रहा कि एक आतंकी संगठन खत्म हुआ तो दूसरा पैदा हो गया. एक लेख में सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी लिखते हैं, ‘ अफगानिस्तान में सोवियत सेनाओं का मुकाबला करने के लिए रीगन प्रशासन ने खुलेआम इस्लाम का हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया. 1985 में व्हाइट हाउस में अफगान मुजाहिदीनों के सम्मान में आयोजित कार्यक्रम में रोनाल्ड रीगन ने कहा था कि नैतिकता में ये भद्रपुरुष अमेरिका की स्थापना करने वाले महापुरुषों जैसे हैं. बाद में ये ही भद्रपुरुष अलकायदा के कर्णधार बने जिन्होंने अपने आतंक से दुनिया को थर्रा दिया. अफगान युद्ध के लड़ाकों में आईएस का स्वयंभू खलीफा अबू बकर अल बगदादी भी शामिल था.’

दोस्त हुआ दुश्मन: एक फाइल फोटो में अमेरिकी सीनेटि जॉन मैकेन (सबसे दाएं) के साथ बगदादी (सबसे बाएं)
दोस्त हुआ दुश्मन: एक फाइल फोटो में अमेरिकी सीनेटि जॉन मैकेन (सबसे दाएं) के साथ बगदादी (सबसे बाएं)

आईएस से लड़ना इसलिए भी बनिस्बत पेचीदा है क्योंकि दूसरे आतंकी संगठनों के उलट वह कहीं छिपा हुआ नहीं है. अपने कब्जे में आ चुके ब्रिटेन जितने बड़े इलाके  में वह व्यवस्थित तरीके से शासन चला रहा है. कई शहरों में बिजली-पानी, यातायात, बैंकों, अदालतों और स्कूलों को संभालने के लिए उसने एक तंत्र खड़ा कर लिया है. तेल की कई इकाइयां उसके कब्जे में हैं और अलग-अलग रिपोर्टों के मुताबिक तेल की बिक्री और बंधकों को छोड़ने के एवज में वसूली जैसे कामों के चलते उसकी रोज की कमाई करीब तीस लाख डॉलर के बराबर है. स्वाभाविक ही है कि वह अपने नियंत्रणवाला इलाका एक दिन चीन और यूरोप तक फैलाने के सपने देख रहा है.

सवाल है कि ऐसे में क्या किया जाए. माना जा रहा है कि इस्लामिक स्टेट को हवाई हमलों से कमजोर तो किया जा सकता है लेकिन उसे हराया तभी जा सकेगा जब उसके सुन्नी समर्थक उसके खिलाफ हो जाएं. इसके लिए जरूरी है कि सीरिया और इराक में ऐसी जिम्मेदार सरकारें बनें जो सभी धड़ों को साथ लेकर चलें. जानकार मानते हैं कि इराकी प्रधानमंत्री नूरी अल मलिकी तो हट गए लेकिन इससे समस्या नहीं सुलझेगी. यह बस इराक में ऐसी सरकार स्थापित करने की दिशा में पहला कदम हो सकता है जिसमें सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व हो. माना जा रहा है कि नूरी अल मालिकी की पक्षपाती नीतियों के कारण आईएस को पनपने का मौका मिला. यानी नए प्रधानमंत्री हैदर अल-अबादी में प्रतिद्वंदी धड़ों शिया, सुन्नी और कुर्दों को साथ लेकर चलने की कितनी क्षमता है, इस पर भी यह निर्भर करेगा कि आईएस से लड़ाई का भविष्य क्या होता है.

आईएस को हराने के लिए जरूरी है कि सीरिया और इराक में ऐसी जिम्मेदार सरकारें बनें जो शिया, सुन्नी और कुर्द, सभी धड़ों को साथ लेकर चलें

एक वर्ग का यह भी मानना है कि अमेरिका और ईरान मिलकर काम करें तो आईएस को खत्म किया जा सकता है. एक समाचार वेबसाइट से बातचीत में ईरानी राजनीतिक विश्लेषक मोहम्मद अली शबानी  कहते हैं, ‘ईरान और अमेरिका के बीच बहुत सारे मुद्दों पर मतभेद हंै, लेकिन जब बात आईएस की आती है तो उनका एक ही लक्ष्य है.’ शबानी मानते हैं कि ईरान और अमरीका के बीच मैदान-ए-जंग बनने की बजाय पुल बनने का इराक को कहीं ज्यादा फायदा होगा. विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अगर इराकी और कुर्द बल एकजुट होकर काम करें और उन्हें ईरान और अमेरिका से मदद मिले तो आईएस के खिलाफ हमले कहीं ज्यादा कारगर होंगे. इसके बाद आईएस के स्थानीय और क्षेत्रीय समर्थकों को कमजोर किया जा सकता है. अहम यह भी है कि सीरिया के संकट को सुलझाया जाए. गौरतलब है कि आईएस के लड़ाकों की एक बड़ी संख्या सीरिया से भी आती है.

अमेरिकी थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रैटजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज से जुड़े एंथनी कॉर्डसमैन का मानना है कि आईएस से सैन्य नहीं बल्कि राजनीतिक तरीके से निपटा जा सकता है. इराक की नई सरकार को सुन्नी और कुर्दों को साथ लेकर चलना होगा, उन्हें विश्वास दिलाना होगा कि संप्रदाय के आधार पर भेदभाव नहीं होगा और देश की राजनीतिक शक्ति और तेल संपदा पर सबका हक है. पश्चिमी देश इस काम में बस मदद कर सकते हैं, लेकिन इस लड़ाई में मुख्य भूमिका उस जमीन के बाशिंदों की ही होनी चाहिए.

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