दौड़ी कबड्डी की गड्डी

kabaddiमाना जा रहा है कि कारोबारी पैकेजिंग और ग्लैमर के तड़के ने कबड्डी के इस नए उभार में अहम भूमिका निभाई है. जानकारों का एक वर्ग मानता है कि भारत में कुछ को छोड़कर बाकी खेलों के प्रति लोगों का जो रवैय्या है उसे देखते हुए यह मजबूरी है कि फिल्म या मनोरंजन जगत के सितारों को कबड्डी से जोड़ा जाए. एक साक्षात्कार में चर्चित कमेंटेटर और प्रो कबड्डी लीग करवा रही संस्था मशाल स्पोर्ट्स के प्रबंध निदेशक चारु शर्मा कहते हैं, ‘ऐसा नहीं है कि ग्लैमर के आ जाने से खेल बदल जाता है. मगर ग्लैमर के आने से यह खेल उनका भी ध्यान खींचने लगता है जिनकी पसंद में यह नहीं होता. सितारों की वजह से कुछ लोग आकर खेल देखना शुरू कर देते हैं. तो कबड्डी ऐसा क्यों न करे?’ प्रो कबड्डी लीग के मैचों का सीधा प्रसारण कर रहे मीडिया समूह स्टार इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी उदय शंकर का मानना है कि मानसिक और शारीरिक ताकत का मेल कबड्डी में हर वह खासियत है जो इसे एक लोकप्रिय खेल के रूप में उभार सकता है. वर्ल्ड कबड्डी लीग के चेयरमैन और पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल के मुताबिक कबड्डी का स्तर उठाने और उसे एक पेशेवर खेल के रूप में उभारने वाला उनका आयोजन आने वाले दिनों में और भी बड़ा और बेहतर होगा.

कई लोग हैं जो मानते हैं कि कबड्डी में प्रोफेशनल लीग शुरू होने से इस खेल को उसका जायज हक मिलेगा. खिलाड़ियों की पूछ बढ़ेगी, खेल का दायरा बढ़ेगा और ओलंपिक में इसे शामिल करवाने की मुहिम को ताकत मिलेगी. अपने एक आलेख में वरिष्ठ पत्रकार गोविंद सिंह मानते हैं कि इस तरह के आयोजनों से एक देशज खेल बड़े फलक पर स्थापित होगा. अंतरराष्ट्रीय कबड्डी फेडरेशन के अध्यक्ष जे एस गहलोत का मानना है कि कबड्डी में प्रोफेशनल लीग के आने से इस खेल को सही पहचान मिलेगी. एक वेबसाइट से बातचीत में गहलोत कहते हैं, ‘इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अगर इस खेल को सही तरीके से हाइलाइट करेगा तो निश्चित तौर से बच्चों में इसके प्रति दिलचस्पी और बढ़ेगी. इसमें क्रिकेट के युवराज सिंह की तरह खिलाड़ियों की 14 करोड़ रुपये की बोली तो नहीं लग सकती, लेकिन 14-15 लाख रुपये की बोली लगना सही शुरुआत है.’

गहलोत राकेश कुमार की बात कर रहे हैं जिनके खाते में भारतीय कबड्डी टीम की कप्तानी, दो विश्व कप और अर्जुन पुरस्कार जैसी उपलब्धियां दर्ज हैं. हाल में उनका नाम तब सुर्खियों में आया जब प्रो कबड्डी लीग के लिए पटना फ्रेंचाइजी ने उन्हें 12.8 लाख रुपये में खरीदा.  विदेशी खिलाड़ियों में सबसे महंगी बोली ईरान के मुस्तफा नौदेही की लगी. उन्हें 6.6 लाख रुपये में पुनेरी पल्टन ने खरीदा.

मिट्टी से मैट और टीवी चैट तक आ चुकी कबड्डी में एक नई जान आती दिख रही है. खिलाड़ी इससे बहुत खुश हैं. तहलका से बातचीत में राकेश कुमार कहते हैं, ‘स्कूल के दिनों में जब हम दिल्ली और हरियाणा के लोकल टूर्नामेंटों में जाते थे तो जीतने पर प्लेट या चम्मच मिलते थे. बहुत हुआ तो टीम को एक-दो हजार रुपये मिल गए. तब हमने सोचा भी नहीं था कि एक दिन यहां पहुंचेंगे. उन दिनों तो नाते-रिश्तेदार घर वालों को समझाते थे कि िफजूल में वक्त बर्बाद कर रहा है तुम्हारा लड़का, यही खेल रह गया है क्या? लेकिन हमें तो जो मिला इसकी वजह से ही मिला. आज तो और भी खुशी होती है जब स्टेडियम फुल होता है. टीवी पर मैच आता है, लोग ऑटोग्राफ मांगते हैं और मीडिया वाले फोन करते रहते हैं.’ वे आगे कहते हैं, ‘किसने सोचा था कि एक दिन अमिताभ बच्चन या सचिन तेंदुलकर जैसे सितारे कबड्डी का मैच देख रहे होंगे.’

तो क्या मान लिया जाए कि कबड्डी का भविष्य अब सुनहरा है? इस सवाल के ठीक-ठीक जवाब के लिए थोड़ा इंतजार करना होगा. हॉकी और बैडमिंटन को लेकर शुरू हुई लीगें तमाम शोर-शराबे के बावजूद फुस्स होती दिखी हैं. उम्मीद करनी चाहिए कि कबड्डी के साथ ऐसा न हो.

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